Wednesday, September 15, 2010

गणेशजी को दूर्वा, शमीपत्र तथा मोदक चढ़ाने का रहस्य -

गणेशजी को तुलसी छोड़कर सभी पत्र-पुष्प प्रिय हैं। अतः सभी अनिषिद्ध पत्र-पुष्प इन पर चढ़ाये जा सकते हैं। तुलसीं वर्जयित्वा सर्वाण्यपि पत्रपुष्पाणि गणपतिप्रियाणि। (आचारभूषण) गणपति को दूर्वा अधिक प्रिय है। अतः इन्हें सफेद या हरी दूर्वा अवश्य चढ़ानी चाहिये। दूर्वा की फुनगी में तीन या पाँच पत्ती होनी चाहिये।

हरिताः श्वेतवर्णा वा पंचत्रिपत्रसंयुताः। दूर्वांकुरा मया दत्ता एकविंशतिसम्मिताः।। (गणेशपुराण)

भगवान् गणेशजी को 3 या 5 गांठ वाली दूर्वा (दूब-घास) अर्पण करने से वह प्रसन्न होते हैं और भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। पूजा के अवसर पर दूर्वा-युग्म अर्थात् दो दूर्वा तथा होम के अवसर पर तीन दूर्वाओं के ग्रहण का विधान तन्त्रशास्त्र में मिलता है। जीव सुख और दुःख भोगने के लिये जन्म लेता है। इस सुख और दुःख रूप द्वन्द को दूर्वा-युग्म से समर्पण किया जाता है। होम के अवसर पर तीन दूर्वाओं का ग्रहण इस तात्पर्य का अवगमक है – आवण, कार्मण और मायिक रूपी तीन मलों को भस्मीभूत करना। इसके सम्बन्ध में पुराण में एक कथा का उल्लेख मिलता है – ‘‘एक समय पृथ्वी पर अनलासुर नामक राक्षस ने भयंकर उत्पात मचा रखा था। उसका अत्याचार पृथ्वी के साथ-साथ स्वर्ग और पाताल तक फैलने लगा था। वह भगवद् भक्ति व ईश्वर आराधना करने वाले ऋषि-मुनियों और निर्दोष लागों को जिन्दा निगल जाता था। देवराज इन्द्र ने उससे कई बार युद्ध किया, लेकिन उन्हें हमेशा पराजित होना पड़ा। अनलासुर से त्रस्त होकर समस्त देवता भगवान् शिव के पास गए। उन्होंने बताया कि उसे सिर्फ गणेशजी ही खत्म कर सकते हैं, क्योंकि उनका पेट बड़ा है इसलिये वे उसको पूरा निगल लेंगे। इस पर देवताओं ने गणेश की स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया। गणेशजी ने अनलासुर का पीछा किया और उसे निगल गए। इससे उनके पेट में काफी जलन होने लगी। अनेक उपाय किए गए, लेकिन ज्वाला शांत नहीं हुई। जब कश्यप ऋषि को यह बात मालूम हुई, तो वे तुरन्त कैलाश गये और 21 दूर्वा एकत्रित कर एक गांठ तैयार कर गणेशजी को खिलाई, जिससे उनके पेट की ज्वाला तुरन्त शांत हो गई।

शमी-वृक्ष को ‘वह्निवृक्ष’ भी कहते हैं। वह्निपत्र गणपति के लिये प्रिय वस्तु है। यह शिव का द्योतक है। यहाँ ज्ञातव्य है कि भूततत्त्वरूपी गणेश का मूलाधार स्थान है। इस प्रकार जानकर वह्निपत्र से विनायक को पूजने से जीव ब्रह्मभाव को प्राप्त कर सकता है।

श्रीगणेशजी को ‘मोदकप्रिय’ कहा जाता है। वे अपने एक हाथ में मोदक पूर्ण पात्र रखते हैं। ‘मन्त्र महार्णव’ में उन्मत्त उच्छिष्टगणपति का वर्णन है - चतुर्भुजं रक्ततनुं त्रिनेत्रं पाशंकुशौ मोदकपात्रदन्तौ। करैर्दधानं सरसीरूहस्थमुन्मत्तमुच्छिष्टगणेशमीडे।।

‘मन्त्र महार्णव’ में एक ध्यान में श्रीगणेश की सूँड के अग्रभाग पर मोदक भूषित है - कवषाणाकुंशावक्षसूत्रं च पाशं दधानं करैर्मोदकं पुष्करेण। स्वपत्न्या युतं हेमभूषाम्बराढ्यं गणेशं समुद्यद्दिनेशाभमीडे।।

मोदक को महाबुद्धि का प्रतीक बताया गया है। त्रिवेन्द्रम् में स्थापित केवल गणपति मूर्ति के हाथों में अंकुश, पाश, मोदक और दाँत शोभित है। मोदक आगे के बाँये हाथ में सुशोभित है। मोदक धारी गणेश का चित्रण है - …………………………………………रूपमादधे। चतुर्भुजं महाकायं मुकुटाटोपमस्तकम्। परशुं कमलं मालां मोदकानावहत्।। (गणेशपु., उपा. 21। 22)

हिमाचल ने भगवती पार्वती को श्रीगणेश का ध्यान करने की जो विधि बतायी है, उसमें उन्होनें मोदक का उल्लेख किया है - एकदन्तं शूपकर्णं गजवक्त्रं चतुर्भुंजं।। पाशांकुशधरं देवं मोकान् बिभ्रतं करै। (गणेशपु., उपा. 49। 21-22)

पद्मपुराण के अनुसार (सृष्टिखण्ड 61। 1 से 63। 11) – एक दिन व्यासजी के शिष्य महामुनि संजय ने अपने गुरूदेव को प्रणाम करके प्रश्न किया कि गुरूदेव! आप मुझे देवताओं के पूजन का सुनिश्चित क्रम बतलाइये। प्रतिदिन की पूजा में सबसे पहले किसका पूजन करना चाहिये ? तब व्यासजी ने कहा – संजय विघ्नों को दूर करने के लिये सर्वप्रथम गणेशजी की पूजा करनी चाहिये। पूर्वकाल में पार्वती देवी को देवताओं ने अमृत से तैयार किया हुआ एक दिव्य मोदक दिया। मोदक देखकर दोनों बालक (स्कन्द तथा गणेश) माता से माँगने लगे। तब माता ने मोदक के प्रभावों का वर्णन कर कहा कि तुममें से जो धर्माचरण के द्वारा श्रेष्ठता प्राप्त करके आयेगा, उसी को मैं यह मोदक दूँगी। माता की ऐसी बात सुनकर स्कन्द मयूर पर आरूढ़ हो मुहूर्तभर में सब तीर्थों की स्न्नान कर लिया। इधर लम्बोदरधारी गणेशजी माता-पिता की परिक्रमा करके पिताजी के सम्मुख खड़े हो गये। तब पार्वतीजी ने कहा- समस्त तीर्थों में किया हुआ स्न्नान, सम्पूर्ण देवताओं को किया हुआ नमस्कार, सब यज्ञों का अनुष्ठान तथा सब प्रकार के व्रत, मन्त्र, योग और संयम का पालन- ये सभी साधन माता-पिता के पूजन के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं हो सकते। इसलिये यह गणेश सैकड़ों पुत्रों और सैकड़ों गणों से भी बढ़कर है। अतः देवताओं का बनाया हुआ यह मोदक मैं गणेश को ही अर्पण करती हूँ। माता-पिता की भक्ति के कारण ही इसकी प्रत्येक यज्ञ में सबसे पहले पूजा होगी। तत्पश्चात् महादेवजी बोले- इस गणेश के ही अग्रपूजन से सम्पूर्ण देवता प्रसन्न हों।

गणपत्यथर्वशीर्ष में लिखा है - ‘‘यो दूर्वाकुंरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति। यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति, स मेधावान् भवति। यो मोदकसहस्त्रेण यजति स वांछितफलमवाप्नोति।……………….’’ अर्थात् ‘जो दूर्वाकुंरों द्वारा यजन करता है, वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजा (धान-लाई) के द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी होता है, मेधावान् होता है। जो सहस्त्र (हजार) मोदकों के द्वारा यजन करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है।’ श्री गणपति की दूर्वाकुंर से प्रियता तथा मोदकप्रियता को प्रदर्शित करता है। देवताओं ने मोदकों से विघ्नराज गणेश की पूजा की थी- ‘लड्डुकैश्च ततो देवैर्विघ्ननाथस्समर्चितः।। (स्कन्दपु., अवन्ती. 36। 1) उपरोक्त पौराणिक आख्यान से गणेश जी की मोदकप्रियता की पुष्टि होती है। गणेशजी को मोदक यानी लड्डू काफी प्रिय हैं। इनके बिना गणेशजी की पूजा अधूरी ही मानी जाती है।

गोस्वामी तुलसीदासजी ने विनय पत्रिका – 1 में कहा है - गाइये गनपति जगबंदन। संकर-सुवन भवानी-नंदन।। सिद्धि-सदन गज बदन विनायक। कृपा-सिंधु सुन्दर सब लायक।। मोदकप्रिय मुद मंगलदाता। विद्या वारिधि बुद्धि विधाता।। श्रीज्ञानेश्वरजी ने शब्दब्रह्म गणेश के रूप-वर्णन में उनके हाथ में शोभित मोदक को परम मधुर अद्वैत वेदान्त का रूपक बताया है - ‘वेदान्तु तो महारसु। मोदक मिरवे।’ (ज्ञानेश्वरी 1। 11) प्रसिद्ध श्रीगणेश आरती में जन-जन गाता है – ‘…………..लडुवन का भोग लगे संत करे सेवा।’ पं. श्रीपट्टाभिराम शास्त्री, मीमांसाचार्य ने कल्याण श्रीगणेश अंक वर्ष 48 अंक 1 पृष्ठ 151-152 पर गणेशजी को दूर्वा, शमीपत्र तथा मोदक चढ़ाने का रहस्य की अत्यन्त सुन्दर व्याख्या की है - ‘………………मोद-आनन्द ही मोदक है -‘आनन्दो मोदः प्रमोदः’ श्रुति है। इसका परिचायक है – ‘मोदक’। मोदक का निर्माण दो-तीन प्रकार से होता है। कई लोग बेसन को भूँजकर चीनी की चासनी बनाकर लड्डू बनाते हैं। इसको ‘मोदक’ कहते हैं। यह मूँग के आटे से भी बनाया जाता है। कतिपय लोग गरी या नारियल के चूर्ण को गुड़-पाक कर, गेहूँ, जौ या चावल से आटे को सानकर कवच बनाकर, उसमें सिद्ध गुड़पाक को थोड़ा रखकर घी में तल लेते हैं या वाष्प से पकाते हैं। आटे के कवच में जिस गुड़पाक को रखते हैं, उसका ‘पूर्णम्’ नाम है। ‘पूर्णम्’ से 51 संख्या निकलती है। यह संख्या अकारादि 51 अक्षरों की परिचायिका है। यही तन्त्रशास्त्र में ‘मातृका’ कहलाती है। ‘न क्षरजीति अक्षरम्’ – नाशरहित परिपूर्ण सच्चिदानन्द ब्रह्मशक्ति का यह द्योतक है। पूर्ण ब्रह्मतत्त्व माया से आच्छादित होने से वह दीखता नहीं, यह हमें ‘मोदक’ सिखलाता है। गुड़पाक आनन्दप्रद है। उसको आटे का कवच छिपाता है। वह आस्वाद से ही गम्य है, इसी प्रकार ब्रह्मतत्त्व स्वानुभवैक-गम्य है। विनायक भगवान् के हाथ में इस मोदक को रखते हैं तो वे स्वाधीनमाय, स्वाधीनप्रपंच आदि शब्दों में व्यवहृत होते है।’




Monday, August 2, 2010

दारिद्य दहन शिव स्तोत्रं !!!

ॐ नमः शिवाय !!!

विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय कर्णामृताय शशिशेखर धारणाय
कर्पूरकान्ति धवलाय जटाधराय दारिद्य दुःख दहनाय नमः शिवाय |
गौरीप्रियाय रजनीश कलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिप कंकनाय
गंगधराय गजराज विमर्द्नाथ दारिद्य दुःख दहनाय नमः शिवाय !!
भक्तप्रियाय भवरोग भयापहाय उग्राय दुर्गभाव सागर तारणाय
ज्योतिर्मयाय गुण नाम सुनृत्यकाय दारिद्य दुःख दहनाय नमः शिवाय !!
चर्माम्बराय शव भस्म विलेपनाय भालेक्षनाय मणिकुंडल मण्डिताय
मन्जीर् पादयुगलाय जटाधराय दारिद्य दुःख दहनाय नमः शिवाय !!!
पंचाननाय फणीराज विभूशनाय हेमांशुकाय भुवनत्रय मण्डिताय
आनंदभूमि वरदाय तमोमयाय दारिद्य दुःख दहनाय नमः शिवाय !!!!
भानुप्रियाय भवसागर तारणाय कालान्तकाय कमलासन पूजिताय
नेत्र त्रयाय शुभ लक्षण लक्षिताय दारिद्य दुःख दहनाय नमः शिवाय !!!
रामप्रियाय रघुनाथ वरप्रदाय नागप्रियाय नरकर्णवतारनाथ्
पुण्येषु पुण्यभरिताय सुचर्चिताय दारिद्य दुःख दहनाय नमः शिवाय !!!
मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वर वाहनाय
मातंग चर्म वसनाय महेश्वराय दारिद्य दुःख दहनाय नमः शिवाय !!!

श्री हनुमद्ष्टोत्तर-शत-नामावली


ॐ आंजनेयाय नमः।
ॐ महा-वीराय नमः।
ॐ हनुमते नमः।
ॐ मारूतात्मजाय नमः।
ॐ तत्त्व-ज्ञान-प्रदाय नमः।
ॐ सीता-देवी-मुद्रा-प्रदायकाय नमः।
ॐ अशोक-वनिका-छेत्रे-नमः।
ॐ सर्व-माया-विभंजनाय नमः।
ॐ सर्व-बन्ध-विमोक्त्रे नमः।
ॐ रक्षो-विध्वंस-कारकाय नमः।
ॐ पर-विद्या-परीहाराय नमः।
ॐ पर-शौर्य-विनाशनाय नमः।
ॐ पर-मन्त्र-निराकत्र्रे नमः।
ॐ पर-यन्त्र-प्रभेदकाय नमः।
ॐ सर्व-ग्रह-विनाशाय नमः।
ॐ भीमसेन-सहाय-कृते नमः।
ॐ सर्व-दुःख-हराय नमः।
ॐ सर्व-लोक-चारिणे नमः।
ॐ मनोजवाय नमः।
ॐ पारिजात-द्रुम-मूलस्थाय नमः।
ॐ सर्व-मन्त्र-स्वरूपवते नमः।
ॐ सर्व-तन्त्र-स्वरूपाय नमः।
ॐ सर्व-यन्त्रात्मकाय नमः।
ॐ शिवाय नमः।
ॐ कपीश्वराय नमः।
ॐ महा-काव्याय नमः।
ॐ सर्व-रोग-हराय नमः।
ॐ प्रभवे नमः।
ॐ कपि-सेना-नायकाय नमः।
ॐ भविष्य-चतुराननाय नमः।
ॐ कुमार-ब्रह्मचारिणे नमः।
ॐ रत्न-कुण्डल-दीप्ति-मते नमः।
ॐ संचलद्-बाल-सन्नद्ध लम्बमान-शिखोज्जवलाय नमः।
ॐ गन्धर्व-विद्या-तत्त्वज्ञाय नमः।
ॐ महाबल-पराक्रममाय नमः।
ॐ कारागृह-विमोक्त्रे नमः।
ॐ श्रृंखला-बन्ध-मोचकाय नमः।
ॐ सागरोत्तारकाय नमः।
ॐ प्राज्ञाय नमः।
ॐ राम-दूताय नमः।
ॐ प्रताप-वते नमः।
ॐ वानराय नमः।
ॐ केसरी-सूनवे नमः।
ॐ सीता-शोक-निवारकाय नमः।
ॐ अंजना-गर्भ-सम्भूताय नमः।
ॐ बालार्क-सदृशाननाय नमः।
ॐ विभीषण-प्रियंकत्र्रे नमः।
ॐ दशग्रीव-कुलान्तकाय नमः।
ॐ लक्ष्मण-प्राण-दात्रे नमः।
ॐ बज्र-कायाय नमः।
ॐ महा-द्युतये नमः।
ॐ चिरंजीविने नमः।
ॐ राम-भक्ताय नमः।
ॐ दैत्य-कार्य-विघातकाय नमः।
ॐ अक्ष-हन्त्रे नमः।
ॐ कांचनाभाय नमः।
ॐ पंच-वक्त्राय नमः।
ॐ महा-तपसे नमः।
ॐ लंकिनी-भंजकाय नमः।
ॐ श्रीमते नमः।
ॐ सिंहिका-प्राण-भंजनाय नमः।
ॐ गन्धमादन-शैलस्थाय नमः।
ॐ लंकापुर-विनाशकाय नमः।
ॐ सुकण्ठ-सचिवाय नमः।
ॐ धीराय नमः।
ॐ शूराय नमः।
ॐ दैत्य-कुलान्तकाय नमः।
ॐ सुरार्चिताय नमः।
ॐ महा-तेजसे नमः।
ॐ राम-चूड़ामणि-प्रदाय नमः।
ॐ काम-रूपिणे नमः।
ॐ पिंगलाक्षाय नमः।
ॐ वार्घि-मैनाक-पूजिताय नमः।
ॐ कवलीकृत-मार्तण्ड-मण्डलाय नमः।
ॐ विजितेन्द्रियाय नमः।
ॐ राम-सुग्रीव-सन्धात्रे नमः।
ॐ महीरावण-मर्दनाय नमः।
ॐ स्फटिकाभाय नमः।
ॐ वागधीशाय नमः।
ॐ नव-व्याकृति-पण्डिताय नमः।
ॐ चतुर्बाहवे नमः।
ॐ दीन-बन्धवे नमः।
ॐ महात्मने नमः।
ॐ भक्त-वत्सलाय नमः।
ॐ संजीवन-शैल-हत्र्रे नमः।
ॐ शुचये नमः।
ॐ वाग्मिने नमः।
ॐ दृढ़-व्रताय नमः।
ॐ कालनेमि-प्रमथनाय नमः।
ॐ हरि-मर्कट-मर्कटाय नमः।
ॐ दान्ताय नमः।
ॐ शान्ताय नमः।
ॐ प्रसन्नात्मने नमः।
ॐ दश-कण्ठे-मदापहत्र्रे नमः।
ॐ योगिने नमः।
ॐ राम-कथा-लोलाय नमः।
ॐ सीतान्वेषण-पण्डिताय नमः।
ॐ वज्र-दंष्ट्राय नमः।
ॐ वज्र-नखाय नमः।
ॐ रूद्र-वीर्य-समुद्भवाय नमः।
ॐ इन्द्रजित्-ग्रहितामोघ-ब्रह्मास्त्र-विनिवारकाय नमः।
ॐ पार्थ-ध्वजाग्र-संवासिने नमः।
ॐ शर-पंजर-भेदकाय नमः।
ॐ दश-बाहवे नमः।
ॐ लोक-पूज्याय नमः।
ॐ जाम्बवत्-प्रीति-वर्धनाय नमः।
ॐ शाकिनी-डाकिनी-यक्ष-रक्षो-भूत-प्रभंजकाय नमः।
ॐ सीता-समेत-श्रीराम-पाद्सेवा-धुरन्धराय नमः।

Wednesday, July 14, 2010

शंकर रूप लिए हनुमान

जय गणेश गिरिजा सुअन मंगल मूल सुजान|
हनुमान वंदन करूँ , जय हो कृपा निधान ||

जय हनुमान दया के सागर , संकट मोचन शरण दान कर ||
शंकर रूप लिया धरती पर , दया करो अब हम पर सब पर ||
सूर्य देव हैं गुरु तुम्हारे देते सबको शक्ति|
चाहे कोई करे ना करे उनकी कोई भक्ति ||
सूर्य शिष्य हो तुम भी करते रहना यह उपकार|
हम हैं अज्ञानी हम मूरख करना बेड़ा पार ||
बैठ पताका रथ की तुमने अर्जुन का भी काम किया|
दे आशीस दया कर देना जीवन तेरे नाम किया||

Tuesday, July 13, 2010

राम रक्षा स्त्रोत



श्रीरामरक्षास्तोत्र
ॐ श्रीगणेशाय नमः
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमंत्रस्य . बुधकौशिक ऋषिः
श्रीसीतारामचंद्रो देवता . अनुष्टुप् छंदः
सीता शक्तिः . श्रीमद् हनुमान कीलकम्
श्रीरामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः
अथ ध्यानम्
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थम्
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्
वामांकारूढ सीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभम्
नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामंडनं रामचंद्रम्
इति ध्यानम्
चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम्
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् .. १
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमंडितम् .. २
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम्
स्वलीलया जगत्रातुं आविर्भूतं अजं विभुम् .. ३
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्
शिरोमे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः .. ४
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियश्रुती
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः .. ५
जिव्हां विद्यानिधिः पातु कंठं भरतवंदितः
स्कंधौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः .. ६
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः .. ७
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् .. ८
जानुनी सेतुकृत्पातु जंघे दशमुखान्तकः
पादौ बिभीषणश्रीदः पातु रामोखिलं वपुः .. ९
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् .. १०
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः .. ११
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्
नरो न लिप्यते पापैः भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति .. १२
जगजैत्रैकमंत्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्
यः कंठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः .. १३
वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमंगलम् .. १४
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षांमिमां हरः
तथा लिखितवान् प्रातः प्रभुद्धो बुधकौशिकः .. १५
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् स नः प्रभुः .. १६
तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ
पुंडरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ .. १७
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ .. १८
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्
रक्षः कुलनिहंतारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ .. १९
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषंगसंगिनौ
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् .. २०
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा
गच्छन्मनोरथोस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः .. २१
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघुत्तमः .. २२
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः
जानकीवल्लभः श्रीमान् अप्रमेय पराक्रमः .. २३
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः
अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशयः .. २४
रामं दुर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्
स्तुवंति नामभिर्दिव्यैः न ते संसारिणो नरः .. २५
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्
राजेंद्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शांतमूर्तिम्
वंदे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् .. २६
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः .. २७
श्रीराम राम रघुनंदन राम राम
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम
श्रीराम राम शरणं भव राम राम .. २८
श्रीरामचंद्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचंद्रचरणौ वचसा गृणामि
श्रीरामचंद्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचंद्रचरणौ शरणं प्रपद्ये .. २९
माता रामो मत्पिता रामचंद्रः
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्रः
सर्वस्वं मे रामचंद्रो दयालुः
नान्यं जाने नैव जाने न जाने .. ३०
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वंदे रघुनंदनम् .. ३१
लोकाभिरामं रणरंगधीरम्
राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्
कारुण्यरूपं करुणाकरं तम्
श्रीरामचंद्रम् शरणं प्रपद्ये .. ३२
मनोजवं मारुततुल्यवेगम्
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्
वातात्मजं वानरयूथमुख्यम्
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये .. ३३
कूजंतं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम्
आरुह्य कविताशाखां वंदे वाल्मीकिकोकिलम् .. ३४
आपदां अपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् .. ३५
भर्जनं भवबीजानां अर्जनं सुखसम्पदाम्
तर्जनं यमदूतानां राम रामेति गर्जनम् .. ३६
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोस्म्यहम्
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर .. ३७
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने .. ३८
इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्
श्रीसीतारामचंद्रार्पणमस्तु

Thursday, July 8, 2010

नैया खेवनहार

गदाधारी हनुमत , तुम्ही मेरे भगवन|
चले आओ जल्दी , संवारो ये जीवन ||
में सेवक तुम्हारा हूँ, तुम राम सेवक |
बुलाता हूँ तुमको, बनो मेरे खेवक ||
संभालो ये नैया, जो है बिन खेवइया|
तुम्ही से है आशा, मेरे प्यारे भैया ||
पुकारे है तुमको, जनम से तेरा दास |
सुनो मेरी विनती, चले आओ मेरे पास ||
है रस्ता कठिन और बहुत सारे दुश्मन |
बचाओ मुझे , या फिर लेलो ये जीवन ||
मेरे प्यारे भगवन , मेरे प्यारे भगवन |
गदाधारी हनुमत तुम्ही तो हो भगवन ||

Friday, July 2, 2010

बजरंग बाण

हनुमान् बजरंग बाण॥

निश्चय प्रेम प्रतीत ते विनय करैं सनमान॥
तेहि के कारज सकल शुभ सिद्ध करैं हनुमान॥
जै हनुमंत संत हितकारी॥
सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन् के काज विलम्ब न कीजै ॥
आतुर दौरि महा सुख दीजै ॥
ज़ैसै कूदि सिन्धु महि पारा॥
सुरसा बदन पैठि विस्तारा॥
आगै जाई लंकिनी रोका॥
मारेहु लात गई सुर् लोका॥
जाय विभीषण को सुख दीन्हा॥
सीता निरखि परम पद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महं बोरा॥
अति आतुर जम कातर तोरा॥
अक्षय कुमार को मार संहारा॥
लूम लपेट लन्क को जारा॥
लाह समान् लंक जरि गई॥
जय जय जय धुनि सुर पुर भई॥
अब विलम्ब केहि कारण स्वामी॥
कृपा करहु उर अन्तर्यामी॥
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता॥
आतुर हैं दुःख करहु निपाता॥
जय गिरिधर जय जय सुख सागर |
सुर समूह समरथ भटनागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमन्त् हठीले॥
बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
गदा बज्र् लै बैरिहि मारो॥
महाराज् प्रभु दास उबारो॥
ॐकार हुन्कार महा-प्रभु धावो॥
बज्र् गदा हनु विलम्ब न लावो॥
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमन्त् कपिसा॥
ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा ॥
सत्य होहु हरि शपथ् पाय के॥
राम दूत धरु मारु धाय के॥
जय जय जय हनुमन्त् अगाधा ॥
दुख् पावत् जन् केहि अपराधा॥
पूजा जप ताप नाम् अचारा॥
नहिं जानत् कछु दास् तुम्हारा॥
वन् उपवन् मग् गिरि गृह माहीं ।
तुम्हरे बल् हम् डरपत नाहीं ॥
पांय परऊं कर् जोरि मनावौ॥
येहि अवसर् अब् केहि गोहरावौं॥
जय अंजनि कुमार बलवन्ता॥
शंकर सुवन बीर हनुमंता ॥
बदन कराल काल कुल घालक॥
राम सहाय सदा प्रति पालक्॥
भूत् प्रेत् पिशाच् निसाचर्॥
अग्नि बैताल् काल् मारी मर॥
इन्हें मारु तोहिं शपथ् राम् की॥
राखु नाथ् मरजाद् नाम् की॥
जनक् सुता हरि दास् कहावो॥
ताकी शपथ् विलम्ब न लावो॥
जय जय जय धुनि होत् अकाशा॥
सुमिरत् होत् दुसह् दुख् नाशा॥
चरन् शरन कर् जोरि मनावौं॥
येहि अवसर् अब् केहि गहरावौं॥
उठु उठु चल् तोहे राम् दुहाई॥
पांय परौं कर् जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता॥
ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता॥
ॐ हं हं हांक् देत् कपि चंचल्॥
ॐ सं सं सहम पराने खल् दल॥
अपने जन को तुरत उबारो |
सुमरत होय आनंद हमारो |
यह बजरंग बाण जेहि मारो |
ताहि कहो फिर् कौन् उबारै॥
पाठ करे बजरंग् बाण् की॥
हनुमन्त् रक्षा करैं प्राण् की॥
यही बजरंग बाण जो जापै|
ताते भूत् प्रेत् सब कांपै॥
धूप् देय् अरु जपै हमेशा॥
ताके तन् नहिं रहे कलेशा॥

दोहा -प्रेम प्रतीतहि कपि भजै सदा धरैं उर ध्यान ॥
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥