Sunday, October 10, 2010

हनुमान बाहुक

हनुमान बाहुक
छप्पय

सिंधु तरन, सिय-सोच हरन, रबि बाल बरन तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहु को काल जनु ।।
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान मान-मद-दवन पवनसुव ।।
कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट ।
गुन गनत, नमत, सुमिरत जपत समन सकल-संकट-विकट ।।१।।
स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रवि तरुन तेज घन ।
उर विसाल भुज दण्ड चण्ड नख-वज्रतन ।।
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस करकस लंगूर, खल-दल-बल-भानन ।।
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति विकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहि सपनेहुँ नहिं आवत निकट ।।२।।

झूलना
पञ्चमुख-छःमुख भृगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व सरि समर समरत्थ सूरो ।
बांकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो ।।
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह जासुबल, बिपुल जल भरित जग जलधि झूरो ।
दुवन दल दमन को कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो ।।३।।
घनाक्षरी
भानुसों पढ़न हनुमान गए भानुमन, अनुमानि सिसु केलि कियो फेर फारसो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन मन, क्रम को न भ्रम कपि बालक बिहार सो ।।
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरिहर विधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खबार सो।
बल कैंधो बीर रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि सार सो ।।४।।

भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।
कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ।।
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँग हूतें घाटि नभ तल भो ।
नाई-नाई-माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जो हैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ।।५

गो-पद पयोधि करि, होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निःसंक पर पुर गल बल भो ।
द्रोन सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ।।
संकट समाज असमंजस भो राम राज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।
साहसी समत्थ तुलसी को नाई जा की बाँह, लोक पाल पालन को फिर थिर थल भो ।।६

कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड़ैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।
जातुधान दावन परावन को दुर्ग भयो, महा मीन बास तिमि तोमनि को थल भो ।।
कुम्भकरन रावन पयोद नाद ईधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ।।७

दूत राम राय को सपूत पूत पौनको तू, अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो ।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन लखन प्रिय प्राण सो ।।
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ।।८

दवन दुवन दल भुवन बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदी छोर को ।
पाप ताप तिमिर तुहिन निघटन पटु, सेवक सरोरुह सुखद भानु भोर को ।।
लोक परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास। नाम कलि कामतरु केसरी किसोर को ।।९।।

महाबल सीम महा भीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।
कुलिस कठोर तनु जोर परै रोर रन, करुना कलित मन धारमिक धीर को ।।
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरन हार तुलसी की पीर को ।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को ।।१०।।

रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि हर, मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु पोषिबे को हिम भानु भो ।।
खल दुःख दोषिबे को, जन परितोषिबे को, माँगिबो मलीनता को मोदक दुदान भो ।
आरत की आरति निवारिबे को तिहुँ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो ।।११।।

सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँक को ।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँक को ।।
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आँक को ।
सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँक को ।।१२।।

सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ।।
केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।
बालक ज्यों पालि हैं कृपालु मुनि सिद्धता को, जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की ।।१३।।

करुनानिधान बलबुद्धि के निधान हौ, महिमा निधान गुनज्ञान के निधान हौ ।
बाम देव रुप भूप राम के सनेही, नाम, लेत देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ।।
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक बेद बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।
मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ।।१४।।

मन को अगम तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैं ।
देवबंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं ।
बीर बरजोर घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं ।
बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ।।१५।।

सवैया
जान सिरोमनि हो हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो ।
ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ।।
साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहां तुलसी को न चारो ।
दोष सुनाये तैं आगेहुँ को होशियार ह्वैं हों मन तो हिय हारो ।।१६।।

तेरे थपै उथपै न महेस, थपै थिर को कपि जे उर घाले ।
तेरे निबाजे गरीब निबाज बिराजत बैरिन के उर साले ।।
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले ।
बूढ भये बलि मेरिहिं बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ।।१७।।

सिंधु तरे बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवासे ।
तैं रनि केहरि केहरि के बिदले अरि कुंजर छैल छवासे ।।
तोसो समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।
बानरबाज ! बढ़े खल खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवासे ।।१८।।

अच्छ विमर्दन कानन भानि दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन से कुञ्जर केहरि वारो ।।
राम प्रताप हुतासन, कच्छ, विपच्छ, समीर समीर दुलारो ।
पाप ते साप ते ताप तिहूँ तें सदा तुलसी कह सो रखवारो ।।१९।।

घनाक्षरी
जानत जहान हनुमान को निवाज्यो जन, मन अनुमानि बलि बोल न बिसारिये ।
सेवा जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारिये ।।
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भान्ति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ।।२०।।

बालक बिलोकि, बलि बारें तें आपनो कियो, दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो विचारिये ।।
बड़ो बिकराल कलि काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को निहारि सो निबारिये ।
केसरी किसोर रनरोर बरजोर बीर, बाँह पीर राहु मातु ज्यौं पछारि मारिये ।।२१।।

उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो संबारिये ।
राम के गुलामनि को काम तरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ।।
साहेब समर्थ तो सों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये ।
पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यों पकरि के बदन बिदारिये ।।२२।।

राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।
मुद मरकट रोग बारिनिधि हेरि हारे, जीव जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ।।
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै विचारिये ।
महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात घात ही मरोरि मारिये ।।२३।।

लोक परलोकहुँ तिलोक न विलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ।।
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो, देव दुखी देखिअत भारिये ।
बात तरुमूल बाँहूसूल कपिकच्छु बेलि, उपजी सकेलि कपि केलि ही उखारिये ।।२४।।

करम कराल कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बक भगिनी काहू तें कहा डरैगी ।
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाँहू बल बालक छबीले छोटे छरैगी ।।
आई है बनाई बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सब को गुनी के पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपि कान्ह तुलसी की, बाँह पीर महाबीर तेरे मारे मरैगी ।।२५।।

भाल की कि काल की कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की ।
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की ।।
पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की ।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की ।।२६।।

सिंहिका सँहारि बल सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बार बार, जातुधान धारि धूरि धानी करि डारी है ।।
तोरि जमकातरि मंदोदरी कठोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महतारी है ।
भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ।।२७।।

तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र रवि राहु की ।
तेरी बाँह बसत बिसोक लोक पाल सब, तेरो नाम लेत रहैं आरति न काहु की ।।
साम दाम भेद विधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ।।२८।।

टूकनि को घर घर डोलत कँगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नत पाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ।।
इतनो परेखो सब भान्ति समरथ आजु, कपिराज सांची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि कोसो है ।।२९

आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढ़ी है बाँह बेदन कही न सहि जाति है ।
औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधीकाति है ।।
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है ।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ।।३०।।

दूत राम राय को, सपूत पूत वाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।
बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के धाय को ।।
एते बडे साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।
थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ।।३१।।

देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाग, राम दूत की रजाई माथे मानि लेत हैं ।।
घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं ।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ।।३२।।

तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर घर के ।
तेरे बल राम राज किये सब सुर काज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ।।
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरिहर के ।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीस नाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ।।३३।।

पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनो न अव डेरिये ।।
अँबु तू हौं अँबु चूर, अँबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये ।।३४।।

घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम मूल मलिनाई है ।।
करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हँसि हाँकि फूंकि फौंजै ते उड़ाई है ।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ।।३५।।

सवैया
राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो ।
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ।।
बाँह की बेदन बाँह पगार पुकारत आरत आनँद भूलो ।
श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो ।।३६।।

घनाक्षरी
काल की करालता करम कठिनाई कीधौ, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे ।
बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे ।।
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे ।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे ।।३७।।

पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुंह पीर, जर जर सकल पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।।
हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारे हीतें, ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुँभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है ।।३८।।

बाहुक सुबाहु नीच लीचर मरीच मिलि, मुँह पीर केतुजा कुरोग जातुधान है ।
राम नाम जप जाग कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान है ।।
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दौऊ, जिनके समूह साके जागत जहान है ।
तुलसी सँभारि ताडका सँहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाई बानवान है ।।३९।।

बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माँगि खात टूक टाक हौं ।
परयो लोक रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौं ।।
खोटे खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं ।
तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ।।४०।।

असन बसन हीन बिषम बिषाद लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ।।
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को ।
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ।।४१।।

जीओ जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुर सरि को ।
तुलसी के दोहूँ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाँऊ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ।।
मो को झूँटो साँचो लोग राम कौ कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।
भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को ।।४२।।

सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ।।
ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि की जै तुलसी को जानि जन फुर कै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै ।।४३।।

कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ।।
माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहें साँची मन गुनिये ।
तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहिं, हौं हूँ रहों मौनही वयो सो जानि लुनिये ।।४४।।

सर्वोपयोगी अनुभूत साधना

सर्वोपयोगी अनुभूत साधना
इस ‘साधना-क्रम’ में तीन उपासनाएँ है-(१) श्री गायत्री उपासना, (२) श्री दुर्गोपासना एवं (३) श्री बटुक-भैरवोपासना। प्रतिदिन प्रातःकाल और रात्रि-भोजन के पूर्व, निजी आसन पर बैठकर नियमित रुप से निश्चित समय पर इस साधना को करने से जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं एवं सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। साधना के समय अपने समक्ष एक ‘दीपक’ या अगरबत्ती या दोनों को प्रज्जवलित कर रख लें। साधना का समय और स्थल निश्चित रखें।
१॰ श्री गायत्री उपासना
(क) आत्म शोधन
प्रातःकाल एवं रात्रि में भोजन से पूर्व निश्चित समय पर, शुद्ध होकर, शुद्ध वस्त्र पहनकर, शुद्ध स्थान में पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बैठे।
पूजा-स्थान में अपने सम्मुख पहले से स्थापित ‘पञ्च-पात्र’ के जल में, निम्न मन्त्र से ‘सूर्य-मण्डल′ से तीर्थों का आवाहन करें-
“ॐ गंगे च यमुने चैव, गोदावरी! सरस्वति!
नर्मदे सिन्धु कावेरि! जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।”

फिर ‘पञ्च-पात्र’ से बाँए हाथ की हथेली में जल लेकर, निम्न मन्त्र पढ़ते हुए, उस जल को दाएँ हाथ की मध्यमा-अनामिका अँगुलियों से अपने ऊपर छिड़के-
“ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं, स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।”

(ख) आचमन
‘आत्म-शोधन’ करने के बाद ‘पञ्च-पात्र’ से पुनः दाएँ हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करे-
“ॐ आत्म-तत्त्वं शोधयामि स्वाहा।”
“ॐ विद्या-तत्त्वं शोधयामि स्वाहा।”
“ॐ शिव-तत्त्वं शोधयामि स्वाहा।”
(ग) माँ गायत्री का ध्यान
अब हाथ जोड़कर माँ गायत्री का ध्यान करें-
“ॐ मुक्ता-विद्रुम-हेम-नील-धवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणैः,
युक्तामिन्दु-निबद्ध-रत्न-मुकुटां तत्त्वार्थ-वर्णात्मिकाम्।
गायत्रीङ वरदाभयांकुश-कशां शूलं कपालं गुणम्,
शंखं चक्रमथारविन्द-युगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे।।”
अर्थात्- माँ गायत्री पाँच मुखवाली हैं। १॰ मुक्ता अर्थात् मोती जैसा, २॰ विद्रुम अर्थात् मूँगे जैसा, ३॰ हेम अर्थात् सुवर्ण जैसा, ४॰ नील-मणि जैसा और ५॰ धवल। इससे यह बोध होता है कि माँ पञ्व-प्राण-धारिणी है।
माँ गायत्री के तीन आँखें हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि माँ त्रि-विद्या वाली है।
माँ गायत्री के रत्न-जटित मुकुट पर चन्द्रमा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि माँ ज्योतिर्मयी अमृतवर्षिणी है।
माँ गायत्री शब्द-ब्रह्म-स्वरुपा है। नाद महाशक्ति या मनोमयी स्पन्द शक्ति है।
(घ) मन्त्र जप
ध्यान कर चुकने पर ‘श्रीगायत्री-मन्त्र’ का ११ बार जप करे-
“ॐ भूर्भुवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।”
अर्थात् ‘ॐ’ में निहित इच्छा-क्रिया-ज्ञान, सृष्टि-स्थिति-संहार, सत-रज-तम आदि शक्तियों को पुष्ट करने वाले और भू-लोक (मृत्यु-लोक), भुवर्लोक (अन्तरिक्ष) एवं स्वर्लोक (स्वर्ग-लोक) को जीवन्त बनाए रखनेवाले श्री सविता देवता (सूर्य देव) का वह श्रेष्ठ तेज हमारी धियों (मन, बुद्धि, चित् और अहं) को अग्रसर होने को प्रेरित करे। हम उस तेज का ध्यान करते हैं।
(ड़) श्रीगायत्री-मन्त्र-जप का समर्पण
११ बार गायत्री मन्त्र का जप कर चुकने पर हाथ जोड़कर जप के फल को माँ गायत्री श्री सविता देवता की प्रसन्नता प्राप्ति हेतु समर्पित करें-
“अनेन कृतेन श्रीगायत्री-मन्त्र-जपेन श्री सविता-देवता प्रीयतां नमः।”

२॰ श्री दुर्गोपासना
श्रीगायत्री-मन्त्र-जप के बाद ‘सप्त-श्लोकी चण्डी’ का विधिवत् पाठ करें-
(क) ध्यान
ॐ विद्युद्-दाम-सम-प्रभां मृग-पति-स्कन्ध-स्थितां भीषणाम्,
कन्याभिः करवाल-खेट-विलसद्-हस्ताभिरासेविताम्।
हस्तैश्चक्र-गदाऽसि-खेट-विशिखांश्चापं गुणं तर्जनीम्,
विभ्राणामनलात्मिकां शशि-धरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे।।”

अर्थात् तेजोरुपा माँ दुर्गा बिजली के सदृश वर्णवाली है। मृगपति अर्थात् सिंह के स्कन्ध या ग्रीवा (गर्दन) पर सवार है। भीषण अ्रथात् डरावनी आकृतिवाली हैं। हाथों में करवाल-खड्ग और ढाल लिए कन्याओं से घिरी हैं। भुजाओं में १॰ चक्र, २॰ गदा, ३॰ खड्ग, ४॰ ढाल, ५॰ शर, ६॰ धनुष, ७॰ गुण (रस्सी या पाश) और ८॰ तर्जनी-मुद्रा (सावधान करनेवाली) रखे हैं। तीन नेत्रोंवाली है।

(ख) मानस-पूजन
उक्त प्रकार ‘ध्यान’ करने के बाद माँ दुर्गा का मानसिक पूजन करे-
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीजगदम्बा-दुर्गा-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीजगदम्बा-दुर्गा-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीजगदम्बा-दुर्गा-प्रीतये घ्रापयामि नमः।
ॐ रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्रीजगदम्बा-दुर्गा-प्रीतये दर्शयामि नमः।
ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्रीजगदम्बा-दुर्गा-प्रीतये निवेदयामि नमः।
ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीजगदम्बा-दुर्गा-प्रीतये समर्पयामि नमः।

(ग) सप्त-श्लोकी चण्डी
मानस-पूजन के बाद सप्त-श्लोकी चण्डी-पाठ करे-
ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय, महा-माया प्रयच्छति।।१
ॐ दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः,
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
दारिद्र्य-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या,
सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।।२
ॐ सर्व-मंगल-मंगल्ये! शिवे! सर्वार्थ-साधिके़!
शरण्ये! त्र्यम्बके! गौरि! नारायणि! नमोऽस्तु ते।।३
ॐ शरणागत-दीनार्त -परित्राण -परायणे!
सर्वस्यार्ति-हरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।।४
ॐ सर्व-स्वरुपे सर्वेशे सर्व-शक्ति-समन्विते।
भतेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते।।५
ॐ रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणाम् ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।६
ॐ सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।७
।।फल-श्रुति।।
ॐ य एतत् परमं गुह्यं, सर्व-रक्षा-विशारदम्।
देव्याःसम्भाषित-स्तोत्रं, सदा साम्राज्य-दायकम्।
श्रृणुयाद् वा पठेद् वापि, पाठयेद् वापि यत्नतः।
परिवार-युतो भूत्वा, त्रैलोक्य-विजयी भवेत्।
।।क्षमा-प्रार्थना।।
ॐ मन्त्र-हीनं क्रिया-हीनं, भक्ति-हीनं सुरेश्वरि।
यत्-पठितं मया देवि, परिपूर्णं तदस्तु मे।।
।।पाठ-समर्पण।।
ॐ गुह्याति-गुह्य-गोप्त्री त्वं, गृहाणास्मत्-कृतं जपम्।
सिद्धिर्मे-भवतु देवि त्वत्-प्रसादान्महेश्वरि।।

३॰ श्रीबटुक उपासना
(क) ध्यान
वन्दे बालं स्फटिक-सदृशम्, कुन्तलोल्लासि-वक्त्रम्।
दिव्याकल्पैर्नव-मणि-मयैः, किंकिणी-नूपुराढ्यैः।।
दीप्ताकारं विशद-वदनं, सुप्रसन्नं त्रि-नेत्रम्।
हस्ताब्जाभ्यां बटुकमनिशं, शूल-दण्डौ दधानम्।।
अर्थात् भगवान् श्रीबटुक-भैरव बालक रुपी हैं। उनकी देह-कान्ति स्फटिक की तरह है। घुँघराले केशों से उनका चेहरा प्रदीप्त है। उनकी कमर और चरणों में नव मणियों के अलंकार जैसे किंकिणी, नूपुर आदि विभूषित हैं। वे उज्जवल रुपवाले, भव्य मुखवाले, प्रसन्न-चित्त और त्रिनेत्र-युक्त हैं। कमल के समान सुन्दर दोनों हाथों में वे शूल और दण्ड धारण किए हुए हैं।
भगवान श्रीबटुक-भैरव के इस सात्विक ध्यान से सभी प्रकार की अप-मृत्यु का नाश होता है, आपदाओं का निवारण होता है, आयु की वृद्धि होती है, आरोग्य और मुक्ति-पद लाभ होता है।
(ख) मानस-पूजन
उक्त प्रकार ‘ध्यान’ करने के बाद श्रीबटुक-भैरव का मानसिक पूजन करे-
ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।
ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये घ्रापयामि नमः।
ॐ रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये निवेदयामि नमः।
ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।
(ग) मूल-स्तोत्र
ॐ भैरवो भूत-नाथश्च, भूतात्मा भूत-भावनः।
क्षेत्रज्ञः क्षेत्र-पालश्च, क्षेत्रदः क्षत्रियो विराट्।।१
श्मशान-वासी मांसाशी, खर्पराशी स्मरान्त-कृत्।
रक्तपः पानपः सिद्धः, सिद्धिदः सिद्धि-सेवितः।।२
कंकालः कालः-शमनः, कला-काष्ठा-तनुः कविः।
त्रि-नेत्रो बहु-नेत्रश्च, तथा पिंगल-लोचनः।।३
शूल-पाणिः खड्ग-पाणिः, कंकाली धूम्र-लोचनः।
अभीरुर्भैरवी-नाथो, भूतपो योगिनी-पतिः।।४
धनदोऽधन-हारी च, धन-वान् प्रतिभागवान्।
नागहारो नागकेशो, व्योमकेशः कपाल-भृत्।।५
कालः कपालमाली च, कमनीयः कलानिधिः।
त्रि-नेत्रो ज्वलन्नेत्रस्त्रि-शिखी च त्रि-लोक-भृत्।।६
त्रिवृत्त-तनयो डिम्भः शान्तः शान्त-जन-प्रिय।
बटुको बटु-वेषश्च, खट्वांग-वर-धारकः।।७
भूताध्यक्षः पशुपतिर्भिक्षुकः परिचारकः।
धूर्तो दिगम्बरः शौरिर्हरिणः पाण्डु-लोचनः।।८
प्रशान्तः शान्तिदः शुद्धः शंकर-प्रिय-बान्धवः।
अष्ट-मूर्तिर्निधीशश्च, ज्ञान-चक्षुस्तपो-मयः।।९
अष्टाधारः षडाधारः, सर्प-युक्तः शिखी-सखः।
भूधरो भूधराधीशो, भूपतिर्भूधरात्मजः।।१०
कपाल-धारी मुण्डी च, नाग-यज्ञोपवीत-वान्।
जृम्भणो मोहनः स्तम्भी, मारणः क्षोभणस्तथा।।११
शुद्द-नीलाञ्जन-प्रख्य-देहः मुण्ड-विभूषणः।
बलि-भुग्बलि-भुङ्-नाथो, बालोबाल-पराक्रम।।१२
सर्वापत्-तारणो दुर्गो, दुष्ट-भूत-निषेवितः।
कामीकला-निधिःकान्तः, कामिनी-वश-कृद्वशी।।१३
जगद्-रक्षा-करोऽनन्तो, माया-मन्त्रौषधी-मयः।
सर्व-सिद्धि-प्रदो वैद्यः, प्रभ-विष्णुरितीव हि।।१४
।।फल-श्रुति।।
अष्टोत्तर-शतं नाम्नां, भैरवस्य महात्मनः।
मया ते कथितं देवि, रहस्य सर्व-कामदम्।।१५
य इदं पठते स्तोत्रं, नामाष्ट-शतमुत्तमम्।
न तस्य दुरितं किञ्चिन्न च भूत-भयं तथा।।१६
न शत्रुभ्यो भयं किञ्चित्, प्राप्नुयान्मानवः क्वचिद्।
पातकेभ्यो भयं नैव, पठेत् स्तोत्रमतः सुधीः।।१७
मारी-भये राज-भये, तथा चौराग्निजे भये।
औत्पातिके भये चैव, तथा दुःस्वप्नजे भये।।१८
बन्धने च महाघोरे, पठेत् स्तोत्रमनन्य-धीः।
सर्वं प्रशममायाति, भयं भैरव-कीर्तनात्।।१९
।।क्षमा-प्रार्थना।।
आवाहनङ न जानामि, न जानामि विसर्जनम्।
पूजा-कर्म न जानामि, क्षमस्व परमेश्वर।।
मन्त्र-हीनं क्रिया-हीनं, भक्ति-हीनं सुरेश्वर।
मया यत्-पूजितं देव परिपूर्णं तदस्तु मे।।


Saturday, October 9, 2010

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र


अष्टलक्ष्मी स्तोत्र

आदिलक्ष्मी

सुमनसवन्दित सुन्दरि माधवि चन्द्र सहोदरि हेममये l

मुनिगणमण्डित मोक्षप्रदायिनि मञ्जुळभाषिणि वेदनुते ll

पङ्कज वासिनि देवसुपूजित सद्गुणवर्षिणि शान्तियुते l

जयजय हे मधुसूदन कामिनि आदिलक्ष्मि सदा पालय माम् ll

धान्यलक्ष्मी

अहिकलि कल्मषनाशिनि कामिनि वैदिकरूपिणि वेदमये l

क्षीरसमुद्भव मङ्गलरूपिणि मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते ll

मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि देवगणाश्रित पादयुते l

जयजय हे मधुसूदन कामिनि धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम् ll

धैर्यलक्ष्मी

जयवरवर्णिनि वैष्णवि भार्गवि मन्त्रस्वरूपिणि मन्त्रमये l

सुरगणपूजित शीघ्रफलप्रद ज्ञानविकासिनि शास्त्रनुते ll

भवभयहारिणि पापविमोचनि साधुजनाश्रित पादयुते l

जयजय हे मधुसूदन कामिनि धैर्यलक्ष्मि सदा पालय माम् ll

गजलक्ष्मी

जयजय दुर्गतिनाशिनि कामिनि सर्वफलप्रद शास्त्रमये l

रथगज तुरगपदादि समावृत परिजनमण्डित लोकनुते ll

हरिहर ब्रह्म सुपूजित सेवित तापनिवारिणि पादयुते l

जयजय हे मधुसूदन कामिनि गजलक्ष्मि रूपेण पालय माम् ll

सन्तानलक्ष्मी

अहिखग वाहिनि मोहिनि चक्रिणि रागविवर्धिनि ज्ञानमये l

गुणगणवारिधि लोकहितैषिणि स्वरसप्त भूषित गाननुते ll

सकल सुरासुर देवमुनीश्वर मानववन्दित पादयुते l

जयजय हे मधुसूदन कामिनि सन्तानलक्ष्मि त्वं पालय माम् ll

विजयलक्ष्मी

जय कमलासनि सद्गतिदायिनि ज्ञानविकासिनि गानमये l

अनुदिनमर्चित कुङ्कुमधूसर भूषित वासित वाद्यनुते ll

कनकधरास्तुति वैभव वन्दित शङ्कर देशिक मान्य पदे l

जयजय हे मधुसूदन कामिनि विजयलक्ष्मि सदा पालय माम् ll

विद्यालक्ष्मी

प्रणत सुरेश्वरि भारति भार्गवि शोकविनाशिनि रत्नमये l

मणिमयभूषित कर्णविभूषण शान्तिसमावृत हास्यमुखे ll

नवनिधिदायिनि कलिमलहारिणि कामित फलप्रद हस्तयुते l

जयजय हे मधुसूदन कामिनि विद्यालक्ष्मि सदा पालय माम् ll

धनलक्ष्मी

धिमिधिमि धिंधिमि धिंधिमि धिंधिमि दुन्दुभि नाद सुपूर्णमये l

घुमघुम घुंघुम घुंघुम घुंघुम शङ्खनिनाद सुवाद्यनुते ll

वेदपुराणेतिहास सुपूजित वैदिकमार्ग प्रदर्शयुते l

जयजय हे मधुसूदन कामिनि धनलक्ष्मि रूपेण पालय माम् ll



Friday, October 8, 2010

भगवान राम की वंश परंपरा

भगवान राम की वंश परंपरा
हिंदू धर्म में राम को विष्णु का सातवाँ अवतार माना जाता है। वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। राम का जन्म इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था। जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल के थे।

मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु से विकुक्षि, निमि और दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। इस तरह से यह वंश परम्परा चलते-चलते हरिश्चन्द्र रोहित, वृष, बाहु और सगर तक पहुँची। इक्ष्वाकु प्राचीन कौशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी।

रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठजी द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है:- ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वतमनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।

इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए। कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था। विकुक्षि के पुत्र बाण और बाण के पुत्र अनरण्य हुए। अनरण्य से पृथु और पृथु और पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ। त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए। धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए और मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ। सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित। ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए।

भरत के पुत्र असित हुए और असित के पुत्र सगर हुए। सगर अयोध्या के बहुत प्रतापी राजा थे। सगर के पुत्र का नाम असमंज था। असमंज के पुत्र अंशुमान तथा अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए। दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए। भगीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतार था। भगीरथ के पुत्र ककुत्स्थ और ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए। रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया। तब राम के कुल को रघुकुल भी कहा जाता है।

रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए। प्रवृद्ध के पुत्र शंखण और शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए। सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरु हुए। मरु के पुत्र प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए। अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था। नहुष के पुत्र ययाति और ययाति के पुत्र नाभाग हुए। नाभाग के पुत्र का नाम अज था। अज के पुत्र दशरथ हुए और दशरथ के ये चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हैं। वा‍ल्मीकि रामायण- ॥1-59 से 72।।

विन्ध्येश्वरी स्तोत्र


विन्ध्येश्वरी स्तोत्र

Friday, September 24, 2010

हनुमत्सहस्त्र नामावली

हनुमत्सहस्त्र नामावली
विनियोगः-
ॐ अस्य श्रीहनुमत्सहस्त्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः हनुमान देवता, अनुष्टुप छन्द, ह्रां बीजं श्रीं शक्ति, श्रीहनुमत्प्रीत्यर्थं-तद्सहस्त्रनामभिरमुकसंख्यार्थ पुष्पादिद्रव्य समर्पणे विनियोगः।

ध्यानः-
ध्यायेद् बालदिवाकर-द्युतिनिभ देवारिदर्पापहं
देवेन्द्रमुख-प्रशा्तयकसं देदीप्यमान रुचा।
सुग्रीवादिसमतवानरयुतं सुव्यक्ततत्त्वप्रियं
संरक्तारुणलोचनं पवनजं पीताम्बरालंकृतम्।।
उद्यदादित्यसंकाशमुदारभुजविक्रमम्।
कन्दर्पकोटिलावण्य सर्वविद्याविशारदम्।।
श्रीरामहृदयानन्दं भक्तकल्पमहीरुहम्।
अभयं वरदं दोर्म्मा चिन्तयेन्मारुतात्मजम्।।

ॐ हनुमते नमः |
ॐ श्री प्रदाय नमः |
ॐ वायु पुत्राय नमः |
ॐ रुद्राय नमः |
ॐ अनघाय नमः |
ॐ अजराय नमः |
ॐ अमृत्यवे नमः |
ॐ वीरवीराय नमः |
ॐ ग्रामावासाय नमः |
ॐ जनाश्रयाय नमः |
ॐ धनदाय नमः |
ॐ निर्गुणाय नमः |
ॐ अकायाय नमः |
ॐ वीराय नमः |
ॐ निधिपतये नमः |
ॐ मुनये नमः |
ॐ पिंगाक्षाय नमः |
ॐ वरदाय नमः |
ॐ वाग्मीने नमः ।
ॐ सीता-शोक-विनाशाय नमः |
ॐ शिवाय नमः |
ॐ शर्वाय नमः |
ॐ पराय नमः |
ॐ अव्यक्ताय नमः |
ॐ व्यक्ताव्यक्ताय नमः |
ॐ रसा-धराय नमः |
ॐ पिंग-केशाय नमः |
ॐ पिंग-रोमम्णे नमः ।
ॐ श्रुति-गम्याय नमः |
ॐ सनातनाय नमः |
ॐ अनादये नमः |
ॐ भगवते नमः |
ॐ देवाय नमः |
ॐ विश्व-हेतवे नमः |
ॐ निरामयाय नमः |
ॐ आरोग्यकर्त्रे नमः ।
ॐ विश्वेशाय नमः |
ॐ विश्वनाथाय नमः |
ॐ हरीश्वराय नमः |
ॐ भर्गाय नमः |
ॐ रामाय नमः |
ॐ राम-भक्ताय नमः |
ॐ कल्याणाय नमः |
ॐ प्रकृति-स्थिराय नमः |
ॐ विश्वम्भराय नमः |
ॐ विश्वमूर्तये नमः |
ॐ विश्वाकाराय नमः |
ॐ विश्वदाय नमः |
ॐ विश्वात्मने नमः |
ॐ विश्वसेव्याय नमः |
ॐ विश्वाय नमः |
ॐ विश्वराय नमः |
ॐ रवये नमः |
ॐ विश्व-चेष्टाय नमः |
ॐ विश्व-गम्याय नमः |
ॐ विश्व-ध्येयाय नमः |
ॐ कला-धराय नमः |
ॐ प्लवंगमाय नमः |
ॐ कपि-श्रेष्टाय नमः |
ॐ ज्येष्ठाय नमः ।
ॐ विद्यावते नमः |
ॐ वनेचराय नमः |
ॐ बालाय नमः |
ॐ वृद्धाय नमः |
ॐ यूने नमः ।
ॐ तत्त्वाय नमः |
ॐ तत्त्व-गम्याय नमः |
ॐ सख्ये नमः |
ॐ अजाय नमः |
ॐ अन्जना-सूनवे नमः |
ॐ अव्यग्राय नमः |
ॐ ग्राम-ख्याताय नमः |
ॐ धरा-धराय नमः |
ॐ भूर्लोकाय नमः |
ॐ भुवर्लोकाय नमः ।
ॐ स्वर्लोकाय नमः |
ॐ महर्लोकाय नमः |
ॐ जनलोकय नमः |
ॐ तपसे नमः |
ॐ अव्ययाय नमः |
ॐ सत्ययाय नमः |
ॐ ओंकार-गम्याय नमः |
ॐ प्रणवाय नमः |
ॐ व्यापकाय नमः |
ॐ अमलाय नमः |
ॐ शिवाय नमः |
ॐ धर्म-प्रतिष्ठात्रे नमः ।
ॐ रामेष्टाय नमः |
ॐ फाल्गुण-प्रियाय नमः |
ॐ गोष्पदिने नमः |
ॐ कृत-वारीशाय नमः |
ॐ पूर्ण-कामाय नमः |
ॐ धराधिपाय नमः |
ॐ रक्षोघ्नाय नमः |
ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः |
ॐ शरणागत-वत्सलाय नमः |
ॐ जानकी-प्राण-दात्रे नमः |
ॐ रक्षः-प्राणहारकाय नमः |
ॐ पूर्णाय नमः ।
ॐ सत्याय नमः | १००
ॐ पीतवाससे नमः ।
ॐ दिवाकर-समप्रभाय नमः |
ॐ देवोद्यान-विहारीणे नमः ।
ॐ देवता-भय-भञ्जनाय नमः ।
ॐ भक्तोदयाय नमः ।
ॐ भक्त-लब्धाय नमः ।
ॐ भक्त-पालन-तत्पराय नमः ।
ॐ द्रोणहर्षाय नमः ।
ॐ शक्तिनेत्राय नमः ।
ॐ शक्तये नमः |
ॐ राक्षस-मारकाय नमः |
ॐ अक्षघ्नाय नमः |
ॐ राम-दूताय नमः |
ॐ शाकिनी-जीव-हारकाय नमः |
ॐ बुबुकार-हतारातये नमः |
ॐ गर्वाय नमः |
ॐ पर्वत-मर्दनाय नमः |
ॐ हेतवे नमः |
ॐ अहेतवे नमः |
ॐ प्रांशवे नमः |
ॐ विश्वभर्ताय नमः ।
ॐ जगद्गुरवे नमः |
ॐ जगन्नेत्रे नमः ।
ॐ जगन्नथाय नमः |
ॐ जगदीशाय नमः |
ॐ जनेश्वराय नमः |
ॐ जगद्धिताय नमः ।
ॐ हरये नमः |
ॐ श्रीशाय नमः |
ॐ गरुडस्मयभंजनाय नमः |
ॐ पार्थ-ध्वजाय नमः |
ॐ वायु-पुत्राय नमः |
ॐ अमित-पुच्छाय नमः |
ॐ अमित-विक्रमाय नमः |
ॐ ब्रह्म-पुच्छाय नमः |
ॐ परब्रह्म-पुच्छाय नमः |
ॐ रामेष्ट-कारकाय नमः |
ॐ सुग्रीवादि-युताय नमः |
ॐ ज्ञानिने नमः ।
ॐ वानराय नमः |
ॐ वानरेश्वराय नमः |
ॐ कल्पस्थायिने नमः ।
ॐ चिरंजीविने नमः ।
ॐ तपनाय नमः |
ॐ सदा-शिवाय नमः |
ॐ सन्नताय नमः |
ॐ सद्गते नमः |
ॐ भुक्ति-मुक्तिदाय नमः |
ॐ कीर्ति-दायकाय नमः |
ॐ कीर्तये नमः |
ॐ कीर्ति-प्रदाय नमः |
ॐ समुद्राय नमः |
ॐ श्रीप्रदाय नमः |
ॐ शिवाय नमः |
ॐ भक्तोदयाय नमः ।
ॐ भक्तगम्याय नमः ।
ॐ भक्त-भाग्य-प्रदायकाय नमः ।
ॐ उदधिक्रमणाय नमः |
ॐ देवाय नमः |
ॐ संसार-भय-नाशनाय नमः |
ॐ वार्धि-बंधनकृदाय नमः ।
ॐ विश्व-जेताय नमः ।
ॐ विश्व-प्रतिष्ठिताय नमः |
ॐ लंकारये नमः |
ॐ कालपुरुषाय नमः |
ॐ लंकेश-गृह- भंजनाय नमः |
ॐ भूतावासाय नमः |
ॐ वासुदेवाय नमः |
ॐ वसवे नमः |
ॐ त्रिभुवनेश्वराय नमः |
ॐ श्रीराम-रुपाय नमः |
ॐ कृष्णस्तवे नमः |
ॐ लंका-प्रासाद-भंजकाय नमः |
ॐ कृष्णाय नमः |
ॐ कृष्ण-स्तुताय नमः |
ॐ शान्ताय नमः |
ॐ शान्तिदाय नमः |
ॐ विश्वपावनाय नमः |
ॐ विश्व-भोक्त्रे नमः ।
ॐ मारिघ्नाय नमः |
ॐ ब्रह्मचारिणे नमः ।
ॐ जितेन्द्रियाय नमः |
ॐ ऊर्ध्वगाय नमः |
ॐ लान्गुलिने नमः ।
ॐ मालिने नमः।
ॐ लान्गूला-हत-राक्षसाय नमः |
ॐ समीर-तनुजाय नमः |
ॐ वीराय नमः |
ॐ वीर-ताराय नमः |
ॐ जय-प्रदाय नमः |
ॐ जगन्मन्गलदाय नमः |
ॐ पुण्याय नमः |
ॐ पुण्य-श्रवण-कीर्तनाय नमः |
ॐ पुण्यकीर्तये नमः |
ॐ पुण्य-गीतये नमः |
ॐ जगत्पावन-पावनाय नमः |
ॐ देवेशाय नमः |
ॐ जितमाराय नमः |
ॐ राम-भक्ति-विधायकाय नमः |
ॐ ध्यात्रे नमः।
ॐ ध्येयाय नमः |
ॐ लयाय नमः |
ॐ साक्षिणे नमः ।
ॐ चेत्रे नमः।
ॐ चैतन्य-विग्रहाय नमः |
ॐ ज्ञानदाय नमः |
ॐ प्राणदाय नमः |
ॐ प्राणाय नमः |
ॐ जगत्प्राणाय नमः |
ॐ समीरणाय नमः |
ॐ विभीषण-प्रियाय नमः |
ॐ शूराय नमः |
ॐ पिप्पलाश्रयाय नमः |
ॐ सिद्धिदाय नमः |
ॐ सिद्धाय नमः |
ॐ सिद्धाश्रयाय नमः |
ॐ कालाय नमः |
ॐ महोक्षाय नमः ।
ॐ काल-जान्तकाय नमः |
ॐ लंकेश-निधन-स्थायिने नमः |
ॐ लंका-दाहकाय नमः ।
ॐ ईश्वराय नमः |
ॐ चन्द्र-सूर्य-अग्नि-नेत्राय नमः |
ॐ कालाग्ने नमः |
ॐ प्रलयान्तकाय नमः |
ॐ कपिलाय नमः |
ॐ कपीशाय नमः |
ॐ पुण्यराशये नमः |
ॐ द्वादश राशिगाय नमः |
ॐ सर्वाश्रयाय नमः |
ॐ अप्रमेयत्माय नमः ।
ॐ रेवत्यादि-निवारकाय नमः |
ॐ लक्ष्मण-प्राणदात्रे नमः ।
ॐ सीता-जीवन-हेतुकाय नमः |
ॐ राम-ध्येयाय नमः |
ॐ हृषीकेशाय नमः |
ॐ विष्णु-भक्ताय नमः |
ॐ जटिने नमः |
ॐ बलिने नमः |
ॐ देवारिदर्पघ्ने नमः |
ॐ होत्रे नमः |
ॐ कर्त्रे नमः |
ॐ धार्त्रे नमः |
ॐ जगत्प्रभवे नमः |
ॐ नगर-ग्राम-पालाय नमः |
ॐ शुद्धाय नमः |
ॐ बुद्धाय नमः |
ॐ निरन्तराय नमः |
ॐ निरंजनाय नमः |
ॐ निर्विकल्पाय नमः |
ॐ गुणातीताय नमः |
ॐ भयंकराय नमः |
ॐ हनुमते नमः ।
ॐ दुराराध्याय नमः |
ॐ तपस्साध्याय नमः |
ॐ महेश्वराय नमः |
ॐ जानकी-घन-शोकोत्थतापहर्त्रे नमः ।
ॐ परात्पराय नमः |
ॐ वाङ्मयाय नमः |
ॐ सद-सद्रूपाय नमः |
ॐ कारणाय नमः |
ॐ प्रकृतेः-पराय नमः |
ॐ भाग्यदाय नमः |
ॐ निर्मलाय नमः |
ॐ नेत्रे नमः |
ॐ पुच्छ-लंका-विदाहकाय नमः |
ॐ पुच्छ-बद्धाय नमः |
ॐ यातुधानाय नमः |
ॐ यातुधान-रिपुप्रियाय नमः |
ॐ छायापहारिणे नमः |
ॐ भूतेशाय नमः |
ॐ लोकेशाय नमः |
ॐ सद्गति-प्रदाय नमः |
ॐ प्लवंगमेश्वराय नमः |
ॐ क्रोधाय नमः |
ॐ क्रोध-संरक्तलोचनाय नमः |
ॐ क्रोध-हर्त्रे नमः |
ॐ ताप-हर्त्रे नमः |
ॐ भक्ताऽभय-वरप्रदाय नमः |
ॐ वर-प्रदाय नमः |
ॐ भक्तानुकंपिने नमः |
ॐ विश्वेशाय नमः |
ॐ पुरु-हूताय नमः |
ॐ पुरंदराय नमः |
ॐ अग्निने नमः |
ॐ विभावसवे नमः |
ॐ भास्वते नमः |
ॐ यमाय नमः |
ॐ निष्कृतिरेवचाय नमः |
ॐ वरुणाय नमः |
ॐ वायु-गति-मानाय नमः |
ॐ वायवे नमः |
ॐ कौबेराय नमः |
ॐ ईश्वराय नमः |
ॐ रवये नमः |
ॐ चन्द्राय नमः |
ॐ कुजाय नमः |
ॐ सौम्याय नमः |
ॐ गुरवे नमः |
ॐ काव्याय नमः |
ॐ शनैश्वराय नमः |
ॐ राहवे नमः |
ॐ केतवे नमः |

ॐ मरुते नमः |
ॐ धात्रे नमः |
ॐ धर्त्रे नमः |
ॐ हर्त्रे नमः |
ॐ समीरजाय नमः |
ॐ मशकीकृत-देवारये नमः |
ॐ दैत्यारये नमः |
ॐ मधुसूदनाय नमः |
ॐ कामाय नमः |
ॐ कपये नमः |
ॐ कामपालाय नमः |
ॐ कपिलाय नमः |
ॐ विश्व जीवनाय नमः |
ॐ भागीरथी-पदांभोजाय नमः |
ॐ सेतुबंध-विशारदाय नमः |
ॐ स्वाहा-काराय नमः |
ॐ स्वधा-काराय नमः |
ॐ हविषे नमः |
ॐ कव्याय नमः |
ॐ हव्यवाहकाय नमः |
ॐ प्रकाशाय नमः |
ॐ स्वप्रकाशाय नमः |
ॐ महावीराय नमः |
ॐ लघवे नमः |
ॐ अमित-विक्रमाय नमः |
ॐ प्रडीनोड्डीनगतिमानाय नमः |
ॐ सद्गतये नमः |
ॐ पुरुषोत्तमाय नमः |
ॐ जगदात्मने नमः |
ॐ जगद्योनये नमः |
ॐ जगदंताय नमः |
ॐ अनंतकाय नमः |
ॐ विपात्मने नमः |
ॐ निष्कलंकाय नमः |
ॐ महते नमः |
ॐ महदहंकृतये नमः |
ॐ खाय नमः |
ॐ वायवे नमः |
ॐ पृथिव्यै नमः |
ॐ आपोभ्य नमः |
ॐ वह्नये नमः |
ॐ दिक्पालाय नमः |
ॐ एकस्थाय नमः |
ॐ क्षेत्रज्ञाय नमः |
ॐ क्षेत्र-पालाय नमः |
ॐ पल्वली-कृत-सागराय नमः |
ॐ हिरण्मयाय नमः |
ॐ पुराणाय नमः |
ॐ खेचराय नमः |
ॐ भुचराय नमः |
ॐ मनसे नमः |
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः |
ॐ सूत्राम्णे नमः |
ॐ राज-राजाय नमः |
ॐ विशांपतये नमः |
ॐ वेदांत-वेद्याय नमः |
ॐ उद्गीथाय नमः |
ॐ वेदवेदांग- पारगाय नमः |
ॐ प्रति-ग्राम-स्थिताय नमः |
ॐ साध्याय नमः |
ॐ स्फूर्ति दात्रे नमः |
ॐ गुणाकराय नमः |
ॐ नक्षत्र-मालिने नमः |
ॐ भूतात्मने नमः |
ॐ सुरभये नमः |
ॐ कल्प-पादपाय नमः |
ॐ चिन्ता-मणये नमः |
ॐ गुणनिधये नमः |
ॐ प्रजापतये नमः |
ॐ अनुत्तमाय नमः |
ॐ पुण्यश्लोकाय नमः |
ॐ पुरारातये नमः |
ॐ ज्योतिष्मते नमः |
ॐ शर्वरीपतये नमः |
ॐ किलिकिल्यारवत्रस्त-प्रेत-भूत-पिशाचकाय नमः |
ॐ ऋणत्रय-हराय नमः |
ॐ सूक्ष्माय नमः |
ॐ स्थूलाय नमः |
ॐ सर्वगतये नमः |
ॐ पुंसे नमः |
ॐ अपस्मार-हराय नमः |
ॐ स्मर्त्रे नमः |
ॐ श्रुतये नमः |
ॐ गाथायै नमः |
ॐ स्मृतये नमः |
ॐ मनवे नमः |
ॐ स्वर्ग-द्वाराय नमः |
ॐ प्रजा-द्वाराय नमः |
ॐ मोक्ष-द्वाराय नमः |
ॐ यतीश्वराय नमः |
ॐ नाद-रूपाय नमः |
ॐ पर-ब्रह्मणे नमः |
ॐ ब्रह्मणे नमः |
ॐ ब्रह्म-पुरातनाय नमः |
ॐ एकाय नमः |
ॐ अनेकाय नमः |
ॐ जनाय नमः |
ॐ शुक्लाय नमः |
ॐ स्वयज्योतिषे नमः |
ॐ अनाकुलाय नमः |
ॐ ज्योति-ज्योतिषे नमः |
ॐ अनादये नमः |
ॐ सात्त्विकाय नमः |
ॐ राजसत्तमाय नमः |
ॐ तमसे नमः |
ॐ तमो-हर्त्रे नमः |
ॐ निरालंबाय नमः |
ॐ निराकाराय नमः |
ॐ गुणाकराय नमः |
ॐ गुणाश्रयाय नमः |
ॐ गुणमयाय नमः |
ॐ बृहत्कायाय नमः |
ॐ बृहद्यशसे नमः |
ॐ बृहद्धनुषे नमः |
ॐ बृहत्पादाय नमः |
ॐ बृहन्नमूर्ध्ने नमः |
ॐ बृहत्स्वनाय नमः |
ॐ बृहत्कर्णाय नमः |
ॐ बृहन्नासाय नमः |
ॐ बृहन्नेत्राय नमः |
ॐ बृहत्गलाय नमः |
ॐ बृहध्यन्त्राय नमः |
ॐ बृहत्चेष्टाय नमः |
ॐ बृहत्पुच्छाय नमः |
ॐ बृहत्कराय नमः |
ॐ बृहत्गतये नमः |
ॐ बृहत्सेव्याय नमः |
ॐ बृहल्लोक-फलप्रदाय नमः |
ॐ बृहच्छक्तये नमः |
ॐ बृहद्वांछा-फलदाय नमः |
ॐ बृहदीश्वराय नमः |
ॐ बृहल्लोकनुताय नमः |
ॐ द्रंष्टे नमः |
ॐ विद्या-दात्रे नमः |
ॐ जगद्गुरवे नमः |
ॐ देवाचार्याय नमः |
ॐ सत्य-वादिने नमः |
ॐ ब्रह्म-वादिने नमः |
ॐ कलाधराय नमः |
ॐ सप्त-पातालगामिने नमः |
ॐ मलयाचल-संश्रयाय नमः |
ॐ उत्तराशास्थिताय नमः |
ॐ श्रीदाय नमः |
ॐ दिव्य-औषधि-वशाय नमः |
ॐ खगाय नमः |
ॐ शाखामृगाय नमः |
ॐ कपीन्द्राय नमः |
ॐ पुराणाय नमः |
ॐ श्रुति-संचराय नमः |
ॐ चतुराय नमः |
ॐ ब्राह्मणाय नमः |
ॐ योगिने नमः |
ॐ योगगम्याय नमः |
ॐ परात्पराय नमः |
ॐ अनादये नमः |
ॐ निधनाय नमः |
ॐ व्यासाय नमः |
ॐ वैकुण्ठाय नमः |
ॐ पृथ्वी-पतये नमः |
ॐ अपराजितये नमः |
ॐ जितारातये नमः |
ॐ सदानन्दाय नमः |
ॐ ईशित्रे नमः |
ॐ गोपालाय नमः |
ॐ गोपतये नमः |
ॐ गोप्त्रे नमः |
ॐ कलये नमः |
ॐ कालाय नमः |
ॐ परात्पराय नमः |
ॐ मनोवेगिने नमः |
ॐ सदा-योगिने नमः |
ॐ संसार-भय-नाशनाय नमः |
ॐ तत्त्व-दात्रे नमः |
ॐ तत्त्वज्ञाय नमः |
ॐ तत्त्वाय नमः |
ॐ तत्त्व-प्रकाशाय नमः |
ॐ शुद्धाय नमः |
ॐ बुद्धाय नमः |
ॐ नित्यमुक्ताय नमः |
ॐ भक्त-राजाय नमः |
ॐ जयप्रदाय नमः |
ॐ प्रलयाय नमः |
ॐ अमित-मायाय नमः |
ॐ मायातीताय नमः |
ॐ विमत्सराय नमः |
ॐ माया-निर्जित-रक्षसे नमः |
ॐ माया-निर्मित-विष्टपाय नमः |
ॐ मायाश्रयाय नमः |
ॐ निर्लेपाय नमः |
ॐ माया-निर्वंचकाय नमः |
ॐ सुखाय नमः |
ॐ सुखिने नमः |
ॐ सुखप्रदाय नमः |
ॐ नागाय नमः |
ॐ महेशकृत-संस्तवाय नमः |
ॐ महेश्वराय नमः |
ॐ सत्यसंधाय नमः |
ॐ शरभाय नमः |
ॐ कलि-पावनाय नमः |
ॐ रसाय नमः |
ॐ रसज्ञाय नमः |
ॐ सम्मानाय नमः |
ॐ तपस्चक्षवे नमः |
ॐ भैरवाय नमः |
ॐ घ्राणाय नमः |
ॐ गन्धाय नमः |
ॐ स्पर्शनाय नमः |
ॐ स्पर्शाय नमः |
ॐ अहंकारमानदाय नमः |
ॐ नेति-नेति-गम्याय नमः |
ॐ वैकुण्ठ-भजन-प्रियाय नमः |
ॐ गिरीशाय नमः |
ॐ गिरिजा-कान्ताय नमः |
ॐ दूर्वाससे नमः |
ॐ कवये नमः |
ॐ अंगिरसे नमः |
ॐ भृगुवे नमः |
ॐ वसिष्ठाय नमः |
ॐ च्यवनाय नमः |
ॐ तुम्बुरुवे नमः |
ॐ नारदाय नमः |
ॐ अमलाय नमः |
ॐ विश्व-क्षेत्राय नमः |
ॐ विश्व-बीजाय नमः |
ॐ विश्व-नेत्राय नमः |
ॐ विश्वगाय नमः |
ॐ याजकाय नमः |
ॐ यजमानाय नमः |
ॐ पावकाय नमः |
ॐ पित्रे नमः |
ॐ श्रद्धायै नमः |
ॐ बुद्धये नमः |
ॐ क्षमायै नमः |
ॐ तन्त्राय नमः |
ॐ मन्त्राय नमः |
ॐ मन्त्रयुताय नमः |
ॐ स्वराय नमः |
ॐ राजेन्द्राय नमः |
ॐ भूपतये नमः |
ॐ रुण्ड-मालिने नमः |
ॐ संसार-सारथये नमः |
ॐ नित्याय नमः |
ॐ संपूर्ण-कामाय नमः |
ॐ भक्त कामदुधे नमः |
ॐ उत्तमाय नमः |
ॐ गणपाय नमः |
ॐ केशवाय नमः |
ॐ भ्रात्रे नमः |
ॐ पित्रे नमः |
ॐ मात्रे नमः |
ॐ मारुतये नमः |
ॐ सहस्र-शीर्षा-पुरुषाय नमः |
ॐ सहस्राक्षाय नमः |
ॐ सहस्रपाताय नमः |
ॐ कामजिते नमः |
ॐ काम-दहनाय नमः |
ॐ कामाय नमः |
ॐ काम्य-फल-प्रदाय नमः |
ॐ मुद्रापहारिणे नमः |
ॐ रक्षोघ्नाय नमः |
ॐ क्षिति-भार-हराय नमः |
ॐ बलाय नमः |
ॐ नख-दंष्ट्रा-युधाय नमः |
ॐ विष्णु-भक्ताय नमः |
ॐ अभय-वर-प्रदाय नमः |
ॐ दर्पघ्ने नमः |
ॐ दर्पदाय नमः |
ॐ इष्टाय नमः |
ॐ शत-मूर्त्तये नमः |
ॐ अमूर्त्तिमते नमः |
ॐ महा-निधये नमः |
ॐ महा-भागाय नमः |
ॐ महा-भर्गाय नमः |
ॐ महार्थदाय नमः |
ॐ महाकाराय नमः |
ॐ महा-योगिने नमः |
ॐ महा-तेजसे नमः |
ॐ महा-द्युतये नमः |
ॐ महा-कर्मणे नमः |
ॐ महा-नादाय नमः |
ॐ महा-मन्त्राय नमः |
ॐ महा-मतये नमः |
ॐ महाशयाय नमः |
ॐ महोदराय नमः |
ॐ महादेवात्मकाय नमः |
ॐ विभवे नमः |
ॐ रुद्र-कर्मणे नमः |
ॐ अकृत-कर्मणे नमः |
ॐ रत्न-नाभाय नमः |
ॐ कृतागमाय नमः |
ॐ अम्भोधि-लंघनाय नमः |
ॐ सिंहाय नमः |
ॐ नित्याय नमः |
ॐ धर्माय नमः |
ॐ प्रमोदनाय नमः |
ॐ जितामित्राय नमः |
ॐ जयाय नमः |
ॐ सम-विजयाय नमः |
ॐ वायु-वाहनाय नमः |
ॐ जीव-दात्रे नमः |
ॐ सहस्रांशवे नमः |
ॐ मुकुन्दाय नमः |
ॐ भूरि-दक्षिणाय नमः |
ॐ सिद्धर्थाय नमः |
ॐ सिद्धिदाय नमः |
ॐ सिद्ध-संकल्पाय नमः |
ॐ सिद्धि-हेतुकाय नमः |
ॐ सप्त-पातालचरणाय नमः |
ॐ सप्तर्षि-गण-वन्दिताय नमः |
ॐ सप्ताब्धि-लंघनाय नमः |
ॐ वीराय नमः |
ॐ सप्त-द्वीपोरुमण्डलाय नमः |
ॐ सप्तांग-राज्य-सुखदाय नमः |
ॐ सप्त-मातृ-निशेविताय नमः |
ॐ सप्त-लोकैक-मुकुटाय नमः |
ॐ सप्त-होता-स्वराश्रयाय नमः |
ॐ सप्तच्छन्द-निधये नमः |
ॐ सप्तच्छन्दसे नमः |
ॐ सप्त-जनाश्रयाय नमः |
ॐ सप्त-सामोपगीताय नमः |
ॐ सप्त-पातल-संश्रयाय नमः |
ॐ मेधावी-कीर्तिदाय नमः |
ॐ शोक-हारिणे नमः |
ॐ दौर्भाग्य-नाशनाय नमः |
ॐ सर्व-वश्यकराय नमः |
ॐ गर्भ-दोषघ्नाय नमः |
ॐ पुत्र-पौत्र-दाय नमः |
ॐ प्रतिवादि-मुखस्तंभिने नमः |
ॐ तुष्टचित्ताय नमः |
ॐ प्रसादनाय नमः |
ॐ पराभिचारशमनाय नमः |
ॐ दवे नमः |
ॐ खघ्नाय नमः |
ॐ बंध-मोक्षदाय नमः |
ॐ नव-द्वार-पुराधाराय नमः |
ॐ नव-द्वार-निकेतनाय नमः |
ॐ नर-नारायण-स्तुत्याय नमः |
ॐ नरनाथाय नमः |
ॐ महेश्वराय नमः |
ॐ मेखलिने नमः |
ॐ कवचिने नमः |
ॐ खद्गिने नमः |
ॐ भ्राजिष्णवे नमः |
ॐ जिष्णुसारथये नमः |
ॐ बहु-योजन-विस्तीर्ण-पुच्छाय नमः |
ॐ पुच्छ-हतासुराय नमः |
ॐ दुष्टग्रह-निहंत्रे नमः |
ॐ पिशाच-ग्रह-घातकाय नमः |
ॐ बाल-ग्रह-विनाशिने नमः |
ॐ धर्माय नमः |
ॐ नेता-कृपाकराय नमः |
ॐ उग्रकृत्याय नमः |
ॐ उग्रवेगिने नमः |
ॐ उग्र-नेत्राय नमः |
ॐ शत-क्रतवे नमः |
ॐ शत-मन्युस्तुताय नमः |
ॐ स्तुत्याय नमः |
ॐ स्तुतये नमः |
ॐ स्तोत्रे नमः |
ॐ महा-बलाय नमः |
ॐ समग्र-गुणशालिने नमः |
ॐ अव्यग्राय नमः |
ॐ रक्षाय नमः |
ॐ विनाशकाय नमः |
ॐ रक्षोघ्न-हस्ताय नमः |
ॐ ब्रह्मेशाय नमः |
ॐ श्रीधराय नमः |
ॐ भक्त-वत्सलाय नमः |
ॐ मेघ-नादाय नमः |
ॐ मेघ-रूपाय नमः |
ॐ मेघ-वृष्टि-निवारकाय नमः |
ॐ मेघ-जीवन-हेतवे नमः |
ॐ मेघ-श्यामाय नमः |
ॐ परात्मकाय नमः |
ॐ समीर-तनयाय नमः |
ॐ बोध्-तत्त्व-विद्या-विशारदाय नमः |
ॐ अमोघाय नमः |
ॐ अमोघहृष्टये नमः |
ॐ इष्टदाय नमः |
ॐ अनिष्ट-नाशनाय नमः |
ॐ अर्थाय नमः |
ॐ अनर्थापहारिणे नमः |
ॐ समर्थाय नमः |
ॐ राम-सेवकाय नमः |
ॐ अर्थिने नमः |
ॐ धन्याय नमः |
ॐ असुरारातये नमः |
ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः |
ॐ आत्मभूवे नमः |
ॐ संकर्षणाय नमः |
ॐ विशुद्धात्मने नमः |
ॐ विद्या-राशये नमः |
ॐ सुरेश्वराय नमः |
ॐ अचलोद्धारकाय नमः |
ॐ नित्याय नमः |
ॐ सेतुकृते नमः |
ॐ राम-सारथये नमः |
ॐ आनन्दाय नमः |
ॐ परमानन्दाय नमः |
ॐ मत्स्याय नमः |
ॐ कूर्माय नमः |
ॐ निधये नमः |
ॐ शूराय नमः |
ॐ वाराहाय नमः |
ॐ नारसिंहाय नमः |
ॐ वामनाय नमः |
ॐ जमदग्निजाय नमः |
ॐ रामाय नमः |
ॐ कृष्णाय नमः |
ॐ शिवाय नमः |
ॐ बुद्धाय नमः |
ॐ कल्किने नमः |
ॐ रामाश्रयाय नमः |
ॐ हराय नमः |
ॐ नन्दिने नमः |
ॐ भृन्गिने नमः |
ॐ चण्डिने नमः |
ॐ गणेशाय नमः |
ॐ गण-सेविताय नमः |
ॐ कर्माध्यक्ष्याय नमः |
ॐ सुराध्यक्षाय नमः |
ॐ विश्रामाय नमः |
ॐ जगतांपतये नमः |
ॐ जगन्नथाय नमः |
ॐ कपि-श्रेष्टाय नमः |
ॐ सर्ववासाय नमः |
ॐ सदाश्रयाय नमः |
ॐ सुग्रीवादिस्तुताय नमः |
ॐ शान्ताय नमः |
ॐ सर्व-कर्मणे नमः |
ॐ प्लवंगमाय नमः |
ॐ नखदारितरक्षसे नमः |
ॐ नख-युद्ध-विशारदाय नमः |
ॐ कुशलाय नमः |
ॐ सुघनाय नमः |
ॐ शेषाय नमः |
ॐ वासुकये नमः |
ॐ तक्षकाय नमः |
ॐ स्वराय नमः |
ॐ स्वर्ण-वर्णाय नमः |
ॐ बलाढ्याय नमः |
ॐ राम-पूज्याय नमः |
ॐ अघनाशनाय नमः |
ॐ कैवल्य-दीपाय नमः |
ॐ कैवल्याय नमः |
ॐ गरुडाय नमः |
ॐ पन्नगाय नमः |
ॐ गुरवे नमः |
ॐ क्लिक्लिरावणहतारातये नमः |
ॐ गर्वाय नमः |
ॐ पर्वत-भेदनाय नमः |
ॐ वज्रांगाय नमः |
ॐ वज्र-वेगाय नमः |
ॐ भक्ताय नमः |
ॐ वज्र-निवारकाय नमः |
ॐ नखायुधाय नमः |
ॐ मणिग्रीवाय नमः |
ॐ ज्वालामालिने नमः |
ॐ भास्कराय नमः |
ॐ प्रौढ-प्रतापाय नमः |
ॐ तपनाय नमः |
ॐ भक्त-ताप-निवारकाय नमः |
ॐ शरणाय नमः |
ॐ जीवनाय नमः |
ॐ भोक्त्रे नमः |
ॐ नानाचेष्टा नमः |
ॐ चंचलाय नमः |
ॐ सुस्वस्थाय नमः |
ॐ अस्वास्थ्यघ्ने नमः |
ॐ दवे नमः |
ॐ खशमनाय नमः |
ॐ पवनात्मजाय नमः |
ॐ पावनाय नमः |
ॐ पवनाय नमः |
ॐ कान्ताय नमः |
ॐ भक्तागाय नमः |
ॐ सहनाय नमः |
ॐ बलाय नमः |
ॐ मेघनाद-रिपवे नमः |
ॐ मेघनाद-संहृतराक्षसाय नमः |
ॐ क्षराय नमः |
ॐ अक्षराय नमः |
ॐ विनीतात्मा वानरेशाय नमः |
ॐ सतांगतये नमः |
ॐ शिति-कण्ठाय नमः |
ॐ श्री-कण्ठाय नमः |
ॐ सहायाय नमः |
ॐ सहनायकाय नमः |
ॐ अस्थलाय नमः |
ॐ अनणवे नमः |
ॐ भर्गाय नमः |
ॐ देवाय नमः |
ॐ संसृतिनाशनाय नमः |
ॐ अध्यात्म-विद्याय नमः |
ॐ साराय नमः |
ॐ अध्यात्म-कुशलाय नमः |
ॐ सुधिये नमः |
ॐ अकल्मषाय नमः |
ॐ सत्य-हेतवे नमः |
ॐ सत्यगाय नमः |
ॐ सत्य-गोचराय नमः |
ॐ सत्य-गर्भाय नमः |
ॐ सत्य-रूपाय नमः |
ॐ सत्याय नमः |
ॐ सत्य-पराक्रमाय नमः |
ॐ अन्जना-प्राणलिंगाय नमः |
ॐ वायु-वंशोद्भवाय नमः |
ॐ शुभाय नमः |
ॐ भद्र-रूपाय नमः |
ॐ रुद्र-रूपाय नमः |
ॐ सुरूपस्चित्र-रूपधृताय नमः |
ॐ मैनाक-वंदिताय नमः |
ॐ सूक्ष्म-दर्शनाय नमः |
ॐ विजयाय नमः |
ॐ जयाय नमः |
ॐ क्रान्त-दिग्मण्डलाय नमः |
ॐ रुद्राय नमः |
ॐ प्रकटीकृत-विक्रमाय नमः |
ॐ कम्बु-कण्ठाय नमः |
ॐ प्रसन्नात्मने नमः |
ॐ ह्रस्व-नासाय नमः |
ॐ वृकोदराय नमः |
ॐ लंबोष्टाय नमः |
ॐ कुण्डलिने नमः |
ॐ चित्र-मालिने नमः |
ॐ योग-विदावराय नमः |
ॐ वराय नमः |
ॐ विपश्चिताय नमः |
ॐ कविरानन्द-विग्रहाय नमः |
ॐ अनन्य-शासनाय नमः |
ॐ फल्गुणीसूनुरव्यग्राय नमः |
ॐ योगात्मने नमः |
ॐ योगतत्पराय नमः |
ॐ योग-वेद्याय नमः |
ॐ योग-कर्त्रे नमः |
ॐ योग-योनये नमः |
ॐ दिगंबराय नमः |
ॐ अकारादि-क्षकारान्ताय नमः |
ॐ वर्ण-निर्मिताय नमः |
ॐ विग्रहाय नमः |
ॐ उलूखल-मुखाय नमः |
ॐ सिंहाय नमः |
ॐ संस्तुताय नमः |
ॐ परमेश्वराय नमः |
ॐ श्लिष्ट-जंघाय नमः |
ॐ श्लिष्ट-जानवे नमः |
ॐ श्लिष्ट-पाणये नमः |
ॐ शिखा-धराय नमः |
ॐ सुशर्मणे नमः |
ॐ अमित-शर्मणे नमः |
ॐ नारायण-परायणाय नमः |
ॐ जिष्णवे नमः |
ॐ भविष्णवे नमः |
ॐ रोचिष्णवे नमः |
ॐ ग्रसिष्णवे नमः |
ॐ स्थाणुरेवाय नमः |
ॐ हरये नमः |
ॐ रुद्रानुकृते नमः |
ॐ वृक्ष-कंपनाय नमः |
ॐ भूमि-कंपनाय नमः |
ॐ गुण-प्रवाहाय नमः |
ॐ सूत्रात्मने नमः |
ॐ वीत-रागाय नमः |
ॐ स्तुति-प्रियाय नमः |
ॐ नाग-कन्या-भय-ध्वंसिने नमः |
ॐ ऋतु-पर्णाय नमः |
ॐ कपाल-भृताय नमः |
ॐ अनाकुलाय नमः |
ॐ भवोपायाय नमः |
ॐ अनपायाय नमः |
ॐ वेद-पारगाय नमः |
ॐ अक्षराय नमः |
ॐ पुरुषाय नमः |
ॐ लोक-नाथाय नमः |
ॐ रक्ष-प्रभवे नमः |
ॐ दृडाय नमः |
ॐ अष्टांग-योगाय नमः |
ॐ फलभुवे नमः |
ॐ सत्य-संधाय नमः |
ॐ पुरुष्टुताय नमः |
ॐ श्मशान-स्थान-निलयाय नमः |
ॐ प्रेत-विद्रावणाय नमः |
ॐ क्षमाय नमः |
ॐ पंचाक्षर-पराय नमः |
ॐ पञ्च-मातृकाय नमः |
ॐ रंजनाय नमः |
ॐ ध्वजाय नमः |
ॐ योगिने नमः |
ॐ वृन्द-वंद्याय नमः |
ॐ शत्रुघ्नाय नमः |
ॐ अनन्त-विक्रमाय नमः |
ॐ ब्रह्मचारिणे नमः |
ॐ इन्द्रिय-रिपवे नमः |
ॐ धृतदण्डाय नमः |
ॐ दशात्मकाय नमः |
ॐ अप्रपंचाय नमः |
ॐ सदाचाराय नमः |
ॐ शूर-सेना-विदारकाय नमः |
ॐ वृद्धाय नमः |
ॐ प्रमोदाय नमः |
ॐ आनंदाय नमः |
ॐ सप्त-जिह्व-पतिर्धराय नमः |
ॐ नव-द्वार-पुराधाराय नमः |
ॐ प्रत्यग्राय नमः |
ॐ सामगायकाय नमः |
ॐ षट्चक्रधाम्ने नमः |
ॐ स्वर्लोकाय नमः |
ॐ भयहृते नमः |
ॐ मानदाय नमः |
ॐ अमदाय नमः |
ॐ सर्व-वश्यकराय नमः |
ॐ शक्तिरनन्ताय नमः |
ॐ अनन्त-मंगलाय नमः |
ॐ अष्ट-मूर्तिर्धराय नमः |
ॐ नेत्रे नमः |
ॐ विरूपाय नमः |
ॐ स्वर-सुन्दराय नमः |
ॐ धूम-केतवे नमः |
ॐ महा-केतवे नमः |
ॐ सत्य-केतवे नमः |
ॐ महारथाय नमः |
ॐ नन्दि-प्रियाय नमः |
ॐ स्वतन्त्राय नमः |
ॐ मेखलिने नमः |
ॐ समर-प्रियाय नमः |
ॐ लोहांगाय नमः |
ॐ सर्वविदे नमः |
ॐ धन्विने नमः |
ॐ षट्कलाय नमः |
ॐ शर्वाय नमः |
ॐ ईश्वराय नमः |
ॐ फल-भुजे नमः |
ॐ फल-हस्ताय नमः |
ॐ सर्व-कर्म-फलप्रदाय नमः |
ॐ धर्माध्यक्षाय नमः |
ॐ धर्म-फलाय नमः |
ॐ धर्माय नमः |
ॐ धर्म-प्रदाय नमः |
ॐ अर्थदाय नमः |
ॐ पं-विंशति-तत्त्वज्ञाय नमः |
ॐ तारक-ब्रह्म-तत्पराय नमः |
ॐ त्रि-मार्गवसतये नमः |
ॐ भीमाये नमः |
ॐ सर्व-दुष्ट-निबर्हणाय नमः |
ॐ ऊर्जस्वानाय नमः |
ॐ निष्कलाय नमः |
ॐ मौलिने नमः |
ॐ गर्जाय नमः |
ॐ निशाचराय नमः |
ॐ रक्तांबर-धराय नमः |
ॐ रक्ताय नमः |
ॐ रक्त-माला-विभूषणाय नमः |
ॐ वन-मालिने नमः |
ॐ शुभांगांय नमः |
ॐ श्वेताय नमः |
ॐ श्वेतांबराय नमः |
ॐ जयाय नमः |
ॐ जय-परीवाराय नमः |
ॐ सहस्र-वदनाय नमः |
ॐ कपये नमः |
ॐ शाकिनी-डाकिनी-यक्ष-रक्षाय नमः |
ॐ भूतौघ-भंजनाय नमः |
ॐ सद्योजाताय नमः |
ॐ कामगतये नमः |
ॐ ज्ञान-मूर्तये नमः |
ॐ यशस्कराय नमः |
ॐ शंभु-तेजसे नमः |
ॐ सार्वभौमाय नमः |
ॐ विष्णु-भक्ताय नमः |
ॐ चतुर्नवति-मन्त्रज्ञाय नमः |
ॐ पौलस्त्य-बल-दर्पहाय नमः |
ॐ सर्व-लक्ष्मी-प्रदाय नमः |
ॐ श्रीमानाय नमः |
ॐ अन्गदप्रियाय नमः |
ॐ स्मृतये नमः |
ॐ सुरेशानाय नमः |
ॐ संसार-भय-नाशनाय नमः |
ॐ उत्तमाय नमः |
ॐ श्रीपरिवाराय नमः |
ॐ सदागतिर्मातरये नमः |
ॐ राम-पादाब्ज-षट्पदाय नमः |
ॐ नील-प्रियाय नमः |
ॐ नील-वर्णाय नमः |
ॐ नील-वर्ण-प्रियाय नमः |
ॐ सुहृताय नमः |
ॐ राम दूताय नमः |
ॐ लोक-बन्धवे नमः |
ॐ अन्तरात्मा-मनोरमाय नमः |
ॐ श्री राम ध्यानकृद् वीराय नमः |
ॐ सदा किंपुरुषस्स्तुताय नमः |
ॐ राम कार्यांतरंगाय नमः |
ॐ शुद्धिर्गतिरानमयाय नमः |
ॐ पुण्य श्लोकाय नमः |
ॐ परानन्दाय नमः |
ॐ परेशाय नमः |
ॐ प्रिय सारथये नमः |
ॐ लोक-स्वामिने नमः |
ॐ मुक्ति-दात्रे नमः |
ॐ सर्व-कारण-कारणाय नमः |
ॐ महा-बलाय नमः |
ॐ महा-वीराय नमः |
ॐ पारावारगतये नमः |
ॐ समस्त-लोक-साक्षिणे नमः |
ॐ समस्त-सुर-वंदिताय नमः |
ॐ सीता-समेत-श्रीराम-पाद-सेवा-धुरंधराय नमः |

अनेन सहस्त्रनाम्नाऽमुकद्रव्यसमर्पणेन श्री हनुमद्देवता प्रीयताम् न मम।।

Wednesday, September 15, 2010

भगवती मंगल-चण्डिका

भगवती मंगल-चण्डिका
‘चण्डी’ शब्द का प्रयोग ‘दक्षा’ (चतुरा) के अर्थ में होता है और ‘मंगल′ शब्द कल्याण का वाचक है। जो मंगल-कल्याण करने में दक्ष हो, वही “मंगल-चण्डिका” कही जाती है। ‘दुर्गा’ के अर्थ में भी चण्डी शब्द का प्रयोग होता है और मंगल शब्द भूमि-पुत्र मंगल के अर्थ में भी आता है। अतः जो मंगल की अभीष्ट देवी है, उन देवी को ‘मंगल-चण्डिका’ कहा गया है।
मनुवंश में ‘मंगल′ नामक राजा थे। सप्त-द्वीपवती पृथ्वी उनके शासन में थी। उन्होंने इन देवी को अभीष्ट देवता मानकर पूजा की थी। इसलिए भी ये ‘मंगल-चण्डी’ नाम से विख्यात हुई। जो मूलप्रकृति भगवती जगदीश्वरी ‘दुर्गा’ कहलाती हैं, उन्हीं का यह रुपान्तर है। ये देवी कृपा की मूर्ति धारण करके सबके सामने प्रत्यक्ष हुई हैं। स्त्रियों की ये इष्टदेवी हैं।

मंगल-चण्डिका-स्तोत्रम्
मन्त्रः- “ॐ ह्रीं श्रीम क्लीं सर्व-पूज्ये देवि मंगल-चण्डिके। ऐं क्रू फट् स्वाहा।।” (२१ अक्षर)
(देवीभागवत, नवम स्कन्ध, अध्याय ४७ के अनुसार मन्त्र इस प्रकार हैः- “ॐ ह्रीं श्रीम क्लीं सर्व-पूज्ये देवि मंगल-चण्डिके। हूं हूं फट् स्वाहा।।”)
ध्यानः-
देवीं षोड्शवष यां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम्। सर्वरुपगुणाढ्यां च कोमलांगीं मनोहराम् ।।१
श्वेतचम्पकवर्णाभां चन्द्रकोटिसमप्रभाम् । वह्निशुद्धांशुकाधानां रत्नभूषणभूषिताम् ।।२
बिभ्रतीं कवरीभारं मल्लिकामाल्यभूषितम् । विम्बोष्ठीं सुदतीं शुद्धां शरत्पद्मनिभाननाम् ।।३
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सुनीलोत्पललोचनाम् । जगद्धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्यः सर्वसम्पदाम् ।।४
संसारसागरे घोरे पोतरुपां वरां भजे।।५
देव्याश्च द्यानमित्येवं स्तवनं श्रूयतां मुने । प्रयतः संकटग्रस्तो येन तुष्टाव शंकरः ।।
सुस्थिर यौवना भगवती मंगल-चण्डिका सदा सोलह वर्ष की ही जान पड़ती है। ये सम्पूर्ण रुप-गुण से सम्पन्न, कोमलांगी एवं मनोहारिणी हैं। श्वेत चम्पा के समान इनका गौरवर्ण तथा करोड़ों चन्द्रमाओं के तुल्य इनकी मनोहर कान्ति है। ये अग्नि-शुद्ध दिव्य वस्त्र धारण किये रत्नमय आभूषणों से विभूषित है। मल्लिका पुष्पों से समलंकृत केशपाश धारण करती हैं। बिम्बसदृश लाल ओठ, सुन्दर दन्त-पंक्ति तथा शरत्काल के प्रफुल्ल कमल की भाँति शोभायमान मुखवाली मंगल-चण्डिका के प्रसन्न वदनारविन्द पर मन्द मुस्कान की छटा छा रही है। इनके दोनों नेत्र सुन्दर खिले हुए नीलकमल के समान मनोहर जान पड़ते हैं। सबको सम्पूर्ण सम्पदा प्रदान करने वाली ये जगदम्बा घोर संसार-सागर से उबारने में जहाज का काम करती हैं। मैं सदा इनका भजन करता हूँ।

।।शंकर उवाच।।
रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि मंगलचण्डिके । हारिके विपदां राशेर्हर्ष-मंगल-कारिके ।।
हर्ष-मंगल-दक्षे च हर्ष-मंगल-चण्डिके । शुभे मंगल-दक्षे च शुभ-मंगल-चण्डिके ।।
मंगले मंगलार्हे च सर्व-मंगल-मंगले । सतां मंगलदे देवि सर्वेषां मंगलालये ।।
पूज्या मंगलवारे च मंगलाभीष्ट-दैवते । पूज्ये मंगल-भूपस्य मनुवंशस्य संततम् ।।
मंगलाधिष्ठातृदेवि मंगलानां च मंगले । संसार-मंगलाधारे मोक्ष-मंगल-दायिनी ।।
सारे च मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम् । प्रतिमंगलवारे च पूज्ये च मंगलप्रदे ।।
स्तोत्रेणानेन शम्भुश्च स्तुत्वा मंगलचण्डिकाम् । प्रतिमंगलवारे च पूजां कृत्वा गतः शिवः ।।
देव्याश्च मंगल-स्तोत्रं यं श्रृणोति समाहितः । तन्मंगलं भवेच्छश्वन्न भवेत् तदमंगलम् ।।
(ब्रह-वैवर्त्त-पुराण । प्रकृतिखण्ड । ४४ । २०-३६)
महादेवजी ने कहाः- ‘जगन्माता भगवती मंगल-चण्डिके ! तुम सम्पूर्ण विपत्तियों का विध्वंस करने वाली हो एवं हर्ष तथा मंगल प्रदान करने को सदा प्रस्तुत रहती हो। मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। खुले हाथ हर्ष और मंगल देनेवाली हर्ष-मंगल-चण्डिके ! तुम शुभा, मंगलदक्षा, शुभमंगल-चण्डिका, मंगला, मंगलार्हा तथा सर्व-मंगल-मंगला कहलाती हो। देवि ! साधु-पुरुषों को मंगल प्रदान करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। तुम सबके लिये मंगल का आश्रय हो। देवि ! तुम मंगलग्रह की इष्ट-देवी हो। मंगलवार के दिन तुम्हारी पूजा होनी चाहिए। मनुवंश में उत्पन्न राजा मंगल की पूजनीया देवी हो। मंगलाधिष्ठात्री देवि ! तुम मंगलों के लिए भी मंगल हो। जगत् के समस्त मंगल तुम पर आश्रित हैं। तुम सबको मोक्षमय मंगल प्रदान करती हो। मंगलवार के दिन सुपूजित होने पर मंगलमय सुख प्रदान करने वाली देवि ! तुम संसार की सारभूता मंगलधारा तथा समस्त कर्मों से परे हो।’
इस स्तोत्र से स्तुति करके भगवान् शंकर ने देवी मंगल-चण्डिका की उपासना की। वे प्रति मंगलवार के दिन उनका पूजन करके चले जाते हैं। यों ये भगवती सर्वमंगला सर्वप्रथम भगवान् शंकर से पूजित हुई। उनके दूसरे उपासक मंगल ग्रह हैं। तीसरी बार राजा मंगल ने तथा चौथी बार मंगलवार के दिन कुछ सुन्दर स्त्रियों ने इन देवी की पूजा की। पाँचवीं बार मंगल कामना रखने वाले बहुसंख्यक मनुष्यों ने मंगलचण्डिका का पूजन किया। फिर तो विश्वेश शंकर से सुपूजित ये देवी प्रत्येक विश्व में सदा पूजित होने लगी। मुने ! इसके बाद देवता, मुनि, मनु और मानव – सभी सर्वत्र इन परमेश्वरी की पूजा करने लगे।
जो पुरुष मन को एकाग्र करके भगवती मंगल-चण्डिका के इस मंगलमय स्तोत्र का श्रवण करता है, उसे सदा मंगल प्राप्त होता है। अमंगल उसके पास नहीं आ सकता। उसके पुत्र और पौत्रों में वृद्धि होती है तथा उसे प्रतिदिन मंगल ही दृष्टिगोचर होता है।