Monday, July 2, 2012

कहानी नंदी की

कहानी नंदी की संकलित पुराणों में यह कथा मिलती है कि शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने अपनी चिंता उनसे व्यक्त की। शिलाद निरंतर योग तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थाश्रम नहीं अपनाना चाहते थे अतः उन्होंने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र का वरदान माँगा। इंद्र ने इसमें असर्मथता प्रकट की तथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। तब शिलाद ने कठोर तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया और उनके ही समान मृत्युहीन तथा दिव्य पुत्र की माँग की। भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। उसको बड़ा होते देख भगवान शंकर ने मित्र और वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम में भेजे जिन्होंने नंदी को देखकर भविष्यवाणी की कि नंदी अल्पायु है। नंदी को जब यह ज्ञात हुआ तो वह महादेव की आराधना से मृत्यु को जीतने के लिए वन में चला गया। वन में उसने शिव का ध्यान आरंभ किया। भगवान शिव नंदी के तप से प्रसन्न हुए व दर्शन वरदान दिया- वत्स नंदी! तुम मृत्यु से भय से मुक्त, अजर-अमर और अदु:खी हो। मेरे अनुग्रह से तुम्हे जरा, जन्म और मृत्यु किसी से भी भय नहीं होगा।" भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से संपूर्ण गणों, गणेशों व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ। भगवान शंकर का वरदान है कि जहाँ पर नंदी का निवास होगा वहाँ उनका भी निवास होगा। तभी से हर शिव मंदिर में शिवजी के सामने नंदी की स्थापना की जाती है। शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम का प्रतीक है। नंदी का एक संदेश यह भी है कि जिस तरह वह भगवान शिव का वाहन है। ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की दृष्टि शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी दृष्टि भी आत्मा की ओर होनी चाहिये। हर व्यक्ति को अपने दोषों को देखना चाहिए। हमेशा दूसरों के लिए अच्छी भावना रखना चाहिए। नंदी यह संकेत देता है कि शरीर का ध्यान आत्मा की ओर होने पर ही हर व्यक्ति चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकता है। इसे ही सामान्य भाषा में मन का स्वच्छ होना कहते हैं। जिससे शरीर भी स्वस्थ होता है और शरीर के निरोग रहने पर ही मन भी शांत, स्थिर और दृढ़ संकल्प से भरा होता है। इस प्रकार संतुलित शरीर और मन ही हर कार्य और लक्ष्य में सफलता के करीब ले जाते हुए मनुष्य अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है। धर्म शास्त्रों में उल्लेख है कि जब शिव अवतार नंदी का रावण ने अपमान किया तो नंदी ने उसके सर्वनाश को घोषणा कर दी थी। रावण संहिता के अनुसार कुबेर पर विजय प्राप्त कर जब रावण लौट रहा था तो वह थोड़ी देर कैलाश पर्वत पर रुका था। वहाँ शिव के पार्षद नंदी के कुरूप स्वरूप को देखकर रावण ने उसका उपहास किया। नंदी ने क्रोध में आकर रावण को यह श्राप दिया कि मेरे जिस पशु स्वरूप को देखकर तू इतना हँस रहा है। उसी पशु स्वरूप के जीव तेरे विनाश का कारण बनेंगे। नंदी का एक रूप सबको आनंदित करने वाला बी है। सबको आनंदित करने के कारण ही भगवान शिव के इस अवतार का नाम नंदी पड़ा। शास्त्रों में इसका उल्लेख इस प्रकार है- त्वायाहं नंन्दितो यस्मान्नदीनान्म सुरेश्वर। तस्मात् त्वां देवमानन्दं नमामि जगदीश्वरम।। -शिवपुराण शतरुद्रसंहिता ६/४५ अर्थात नंदी के दिव्य स्वरूप को देख शिलाद मुनि ने कहा तुमने प्रगट होकर मुझे आनंदित किया है। अत: मैं आनंदमय जगदीश्वर को प्रणाम करता हूं।

Tuesday, June 12, 2012

फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है

जब दर पे तुम्हारे ही अधमों का ठिकाना है | फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है || तारोगे तो तर जायेंगे छोड़ोगे तो बैठे हैं | दरबार से अब हरगिज उठकर नहीं जाना है | फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है || फरियाद को सुनने में है कौन सिवा तुमसे | गर् तुम न सुनोगे तो फिर किसको सुनाना है | फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है || दृग बिंदु की शक्लों में ख्वाहिश है मेरे दिल की | जरिया तो है आँखों का आंसू का बहाना है | फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है ||

Monday, June 11, 2012

खबर कर दो रघु नंदन को

खबर कर दो रघु नंदन को , खड़े हम दर पर दर्शन को | लख चौरासी स्वांग धर ,नाना कष्ट उठाय | जन्म मरण से होय दुखी मैं पड़ा शरण में आय || झुकाए हुए हैं गर्दन को , खबर कर दो रघु नंदन को | खबर कर दो रघु नंदन को , खड़े हम दर पर दर्शन को | यद्यपि तुमने ही दिया ,रूप शील गुण खान | किन्तु हरी के भजन बिन सब ही है बेकार || करें क्या लेकर इस धन को,खबर कर दो रघु नंदन को | खबर कर दो रघु नंदन को , खड़े हम दर पर दर्शन को | खेल तमाशों में मेरा मन दौड़ –दौड़ के जाय | भजन भयंकर सा लगे और बुद्धि भ्रष्ट हो जाय || कहाँ तक रोयें कर्मों को ,खबर कर दो रघु नंदन को | खबर कर दो रघु नंदन को , खड़े हम दर पर दर्शन को | नौका पापों से भरी ,डूब रही मझधार | कछु डूबी कछु डूबन वाली ,एक तुम्ही आधार || उबारो हम जैसा पापी , खबर कर दो रघु नंदन को | खबर कर दो रघु नंदन को , खड़े हम दर पर दर्शन को |

Sunday, June 10, 2012

भगवान तुम्हारे चरणों में

भगवान तुम्हारे चरणों में, मै तुम्हे रिझाने आया हूँ | वाणी में तनिक मिठास नहीं, पर विनय सुनाने आया हूँ | प्रभु का चरणामृत लेने को, है पास मेरे कोई पात्र नहीं | आँखों के दोनों प्यालों में, कुछ भीख माँगने आया हूँ || तुमसे लेकर क्या भेंट करूं, भगवान तुम्हारे चरणों में | मैं भिक्षुक हूँ तुम दाता हो ,सम्बन्ध बताने आया हूँ || सेवा की कोई वास्तु नहीं, फिर भी मेरा साहस देखो | मैं लेकर आज आंसुओं का, एक हार चढ़ाने आया हूँ || भगवान तुम्हारे चरणों में, मै तुम्हे रिझाने आया हूँ | भगवान तुम्हारे चरणों में, मै तुम्हे रिझाने आया हूँ ||

Friday, June 8, 2012

एक अर्ज मेरी सुन लो

एक अर्ज मेरी सुन लो, ओ मेरे प्यारे हनुमत ! कर देना मेरी नैया, तुम पार मेरे हनुमत !! अच्छा हूँ या बुरा हूँ ,हूँ दास मैं तुम्हारा ! जीवन का भार तुम पर है मेरे स्वामी हनुमत !! तुम हो अधम जनों का उद्धार करने वाले ! मैं हूँ अधम जनों का सरदार मेरे हनुमत !! करुना निधान तुमको करुना तो होगी करनी ! वरना न होगे दास तुम श्री राम के ओ हनुमत !! ख्वाईस ये है हमारी कुछ बूँद अश्रु लेकर ! देना मुझे आशीष तुम ओ मेरे प्यारे हनुमत !!

Saturday, May 26, 2012

॥ निर्वाण षटकम्॥

॥ निर्वाण षटकम्॥ मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश: न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव: न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा: अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: पिता नैव मे नैव माता न जन्म न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ --शंकराचार्य रचित

Saturday, May 5, 2012

हे महा वीर मेरे स्वामी ,उद्धार करो इस दुनिया से!

हे महा वीर मेरे स्वामी ,उद्धार करो इस दुनिया से! छोटी सी भेट स्वीकार करो,प्रभु मुझ अज्ञानी दुखिया से!! हे महा वीर मेरे स्वामी ,उद्धार करो इस दुनिया से! तुम महा शक्ति,तुम महाकाल, जीवन प्रदान करने वाले! श्री राम चन्द्र की भक्ति मे जीवन अर्पण करने वाले!! हे महा वीर मेरे स्वामी ,उद्धार करो इस दुनिया से! हम बाल तुम्हारे द्वार खड़े,कब से प्रभु तुम्हे पुकार रहे! तुम दयावान हो, दया करो प्रभु,सन्त तुम्हे सब कोई कहे!! हे महा वीर मेरे स्वामी ,उद्धार करो इस दुनिया से! अतुलित बल है तुममे,जिसका प्रभु तुमको कोई ध्यान नही! हम याद दिलाते है तुमको,अपने को तुम समझो तो सही !! हे महा वीर मेरे स्वामी ,उद्धार करो इस दुनिया से! हम महाजाल मे है अटके,इस जाल को तुम काटो मेरे! निज भक्ती दे दो हे भगवन,हम बालक है नादान तेरे!! हे महा वीर मेरे स्वामी ,उद्धार करो इस दुनिया से! मै दीन-दुखी बेसहारा हूँ ,मेरा तो कोई सहारा नही! एक मात्र आसरा प्रभु तुम से ,है और कोई भी मेरा नही!! हे महा वीर मेरे स्वामी ,उद्धार करो इस दुनिया से! मेरे अपराध क्षमा कर दो,हम बच्चे है तेरे भगवन! अब तो प्रभु मेरी पुकार सुनो,अब दूर करो मेरे बन्धन!! हे महा वीर मेरे स्वामी ,उद्धार करो इस दुनिया से! है लाल-लाल मुख तेरा प्रभु,है लाल-लाल तेरी काया ! वो सब कुछ है तेरा भगवन,जो कुछ भी हमने है पाया !!
हे महा वीर मेरे स्वामी ,उद्धार करो इस दुनिया से!