Monday, July 2, 2012
दशा मुझ दीन की भगवन संभालोगे तो क्या होगा
दशा मुझ दीन की भगवन संभालोगे तो क्या होगा |
अगर चरणों की सेवा में लगा लोगे तो क्या होगा ||
कि नामी पातकी मैं हूँ कि नामी पाप हर हो तुम |
जो लज्जा दोनों नामों की बचा लोगे तो क्या होगा ||
दशा मुझ दीन की भगवन संभालोगे तो क्या होगा |
जिन्होंने तुमको करुणा कर पतित पावन बनाया है ||
उन्ही पतितों को तुम पावन बना लोगे तो क्या होगा |
दशा मुझ दीन की भगवन संभालोगे तो क्या होगा ||
यहाँ सब मुझसे कहते हैं किसी के काम का ना तू |
मैं किसका हूँ ये झगड़ा ही मिटा दोगे तो क्या होगा ||
दशा मुझ दीन की भगवन संभालोगे तो क्या होगा ||
अजामिल गीध गणिका जिस दया गंगा में बहते हैं |
उसी में बूँद सा पापी मिला दोगे तो क्या होगा ||
दशा मुझ दीन की भगवन संभालोगे तो क्या होगा ||
दशा मुझ दीन की भगवन संभालोगे तो क्या होगा ||
फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है
जब दर पे तुम्हारे ही अधमों का ठिकाना है |
फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है ||
तारोगे तो तर जायेंगे छोड़ोगे तो बैठे हैं |
दरबार से अब हरगिज उठकर नहीं जाना है |
फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है ||
फरियाद को सुनने में है कौन सिवा तुमसे |
गर् तुम न सुनोगे तो फिर किसको सुनाना है |
फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है ||
दृग बिंदु की शक्लों में ख्वाहिश है मेरे दिल की |
जरिया तो है आँखों का आंसू का बहाना है |
फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है ||
कहानी नंदी की
कहानी नंदी की
संकलित पुराणों में यह कथा मिलती है कि शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने अपनी चिंता उनसे व्यक्त की। शिलाद निरंतर योग तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थाश्रम नहीं अपनाना चाहते थे अतः उन्होंने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र का वरदान माँगा। इंद्र ने इसमें असर्मथता प्रकट की तथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। तब शिलाद ने कठोर तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया और उनके ही समान मृत्युहीन तथा दिव्य पुत्र की माँग की।
भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। उसको बड़ा होते देख भगवान शंकर ने मित्र और वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम में भेजे जिन्होंने नंदी को देखकर भविष्यवाणी की कि नंदी अल्पायु है। नंदी को जब यह ज्ञात हुआ तो वह महादेव की आराधना से मृत्यु को जीतने के लिए वन में चला गया। वन में उसने शिव का ध्यान आरंभ किया। भगवान शिव नंदी के तप से प्रसन्न हुए व दर्शन वरदान दिया- वत्स नंदी! तुम मृत्यु से भय से मुक्त, अजर-अमर और अदु:खी हो। मेरे अनुग्रह से तुम्हे जरा, जन्म और मृत्यु किसी से भी भय नहीं होगा।"
भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से संपूर्ण गणों, गणेशों व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ। भगवान शंकर का वरदान है कि जहाँ पर नंदी का निवास होगा वहाँ उनका भी निवास होगा। तभी से हर शिव मंदिर में शिवजी के सामने नंदी की स्थापना की जाती है।
शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम का प्रतीक है। नंदी का एक संदेश यह भी है कि जिस तरह वह भगवान शिव का वाहन है। ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की दृष्टि शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी दृष्टि भी आत्मा की ओर होनी चाहिये। हर व्यक्ति को अपने दोषों को देखना चाहिए। हमेशा दूसरों के लिए अच्छी भावना रखना चाहिए। नंदी यह संकेत देता है कि शरीर का ध्यान आत्मा की ओर होने पर ही हर व्यक्ति चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकता है। इसे ही सामान्य भाषा में मन का स्वच्छ होना कहते हैं। जिससे शरीर भी स्वस्थ होता है और शरीर के निरोग रहने पर ही मन भी शांत, स्थिर और दृढ़ संकल्प से भरा होता है। इस प्रकार संतुलित शरीर और मन ही हर कार्य और लक्ष्य में सफलता के करीब ले जाते हुए मनुष्य अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है।
धर्म शास्त्रों में उल्लेख है कि जब शिव अवतार नंदी का रावण ने अपमान किया तो नंदी ने उसके सर्वनाश को घोषणा कर दी थी। रावण संहिता के अनुसार कुबेर पर विजय प्राप्त कर जब रावण लौट रहा था तो वह थोड़ी देर कैलाश पर्वत पर रुका था। वहाँ शिव के पार्षद नंदी के कुरूप स्वरूप को देखकर रावण ने उसका उपहास किया। नंदी ने क्रोध में आकर रावण को यह श्राप दिया कि मेरे जिस पशु स्वरूप को देखकर तू इतना हँस रहा है। उसी पशु स्वरूप के जीव तेरे विनाश का कारण बनेंगे।
नंदी का एक रूप सबको आनंदित करने वाला बी है। सबको आनंदित करने के कारण ही भगवान शिव के इस अवतार का नाम नंदी पड़ा। शास्त्रों में इसका उल्लेख इस प्रकार है-
त्वायाहं नंन्दितो यस्मान्नदीनान्म सुरेश्वर।
तस्मात् त्वां देवमानन्दं नमामि जगदीश्वरम।।
-शिवपुराण शतरुद्रसंहिता ६/४५
अर्थात नंदी के दिव्य स्वरूप को देख शिलाद मुनि ने कहा तुमने प्रगट होकर मुझे आनंदित किया है। अत: मैं आनंदमय जगदीश्वर को प्रणाम करता हूं।
Tuesday, June 12, 2012
फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है
जब दर पे तुम्हारे ही अधमों का ठिकाना है |
फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है ||
तारोगे तो तर जायेंगे छोड़ोगे तो बैठे हैं |
दरबार से अब हरगिज उठकर नहीं जाना है |
फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है ||
फरियाद को सुनने में है कौन सिवा तुमसे |
गर् तुम न सुनोगे तो फिर किसको सुनाना है |
फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है ||
दृग बिंदु की शक्लों में ख्वाहिश है मेरे दिल की |
जरिया तो है आँखों का आंसू का बहाना है |
फिर मेरी ही किस्मत में क्यूँ देर लगाना है ||
Monday, June 11, 2012
खबर कर दो रघु नंदन को
खबर कर दो रघु नंदन को , खड़े हम दर पर दर्शन को |
लख चौरासी स्वांग धर ,नाना कष्ट उठाय |
जन्म मरण से होय दुखी मैं पड़ा शरण में आय ||
झुकाए हुए हैं गर्दन को , खबर कर दो रघु नंदन को |
खबर कर दो रघु नंदन को , खड़े हम दर पर दर्शन को |
यद्यपि तुमने ही दिया ,रूप शील गुण खान |
किन्तु हरी के भजन बिन सब ही है बेकार ||
करें क्या लेकर इस धन को,खबर कर दो रघु नंदन को |
खबर कर दो रघु नंदन को , खड़े हम दर पर दर्शन को |
खेल तमाशों में मेरा मन दौड़ –दौड़ के जाय |
भजन भयंकर सा लगे और बुद्धि भ्रष्ट हो जाय ||
कहाँ तक रोयें कर्मों को ,खबर कर दो रघु नंदन को |
खबर कर दो रघु नंदन को , खड़े हम दर पर दर्शन को |
नौका पापों से भरी ,डूब रही मझधार |
कछु डूबी कछु डूबन वाली ,एक तुम्ही आधार ||
उबारो हम जैसा पापी , खबर कर दो रघु नंदन को |
खबर कर दो रघु नंदन को , खड़े हम दर पर दर्शन को |
Sunday, June 10, 2012
भगवान तुम्हारे चरणों में
भगवान तुम्हारे चरणों में, मै तुम्हे रिझाने आया हूँ |
वाणी में तनिक मिठास नहीं, पर विनय सुनाने आया हूँ |
प्रभु का चरणामृत लेने को, है पास मेरे कोई पात्र नहीं |
आँखों के दोनों प्यालों में, कुछ भीख माँगने आया हूँ ||
तुमसे लेकर क्या भेंट करूं, भगवान तुम्हारे चरणों में |
मैं भिक्षुक हूँ तुम दाता हो ,सम्बन्ध बताने आया हूँ ||
सेवा की कोई वास्तु नहीं, फिर भी मेरा साहस देखो |
मैं लेकर आज आंसुओं का, एक हार चढ़ाने आया हूँ ||
भगवान तुम्हारे चरणों में, मै तुम्हे रिझाने आया हूँ |
भगवान तुम्हारे चरणों में, मै तुम्हे रिझाने आया हूँ ||
Friday, June 8, 2012
एक अर्ज मेरी सुन लो
एक अर्ज मेरी सुन लो, ओ मेरे प्यारे हनुमत !
कर देना मेरी नैया, तुम पार मेरे हनुमत !!
अच्छा हूँ या बुरा हूँ ,हूँ दास मैं तुम्हारा !
जीवन का भार तुम पर है मेरे स्वामी हनुमत !!
तुम हो अधम जनों का उद्धार करने वाले !
मैं हूँ अधम जनों का सरदार मेरे हनुमत !!
करुना निधान तुमको करुना तो होगी करनी !
वरना न होगे दास तुम श्री राम के ओ हनुमत !!
ख्वाईस ये है हमारी कुछ बूँद अश्रु लेकर !
देना मुझे आशीष तुम ओ मेरे प्यारे हनुमत !!
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