Friday, August 24, 2012

जय श्री राम ...जय जय हनुमान ....
हनुमान ने घमण्ड चूर किया:--:

संसार में किसी का कुछ नहीं ख्वाहमख्वाह अपना समझना मूर्खता है, क्योंकि अपना होता हुआ भी, कुछ भी अपना नहीं होता|
इसलिए हैरानी होती है, घमण्ड क्यों?
किसलिए? किसका?

कुछ रुपये दान करने वाला यदि यह कहे कि उसने ऐसा किया है, तो उससे बड़ा मुर्ख और कोई नहीं और ऐसे भी हैं, जो हर महीने लाखों का दान करने हैं,
लेकिन उसका जिक्र तक नहीं करते, न करने देते हैं|

वास्तव में जरूरतमंद और पीड़ित की सहायता ही दान है, पुण्य है|
ऐसे व्यक्ति पर सरस्वती की सदा कृपा होती है|

पर क्या किया जाए,
देवताओं तक को अभिमान हो जाता है और उनके अभिमान को दूर करने के लिए परमात्मा को ही कोई उपाय करना पड़ता है|

गरुड़, सुदर्शन चक्र तथा सत्यभामा को भी अभिमान हो गया था और भगवान श्रीकृष्ण ने उनके
अभिमान को दूर करने के लिए श्री हनुमान जी की सहायता ली थी|

श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को स्वर्ग से पारिजात लाकर दिया था और वह इसीलिए अपने आपको श्रीकृष्ण की अत्यंत प्रिया और अति सुंदरी मानने लगी थी|

सुदर्शन चक्र को यह अभिमान हो गया था कि उसने इंद्र के वज्र को निष्क्रिय किया था|
वह लोकालोक के
अंधकार को दूर कर सकता है|
भगवान श्रीकृष्ण अतंत उसकी ही सहायता लेते हैं|

गरुड़ भगवान कृष्ण का वाहन था, वह समझता था, भगवान मेरे बिना कहीं जा ही नहीं सकते| इसलिए कि मेरी गति का कोई मुकाबला नहीं कर सकता|

भगवान अपने भक्तों का सदा कल्याण करते हैं|
इसलिए उन्होंने हनुमान जी का स्मरण किया|

तत्काल हनुमान जी द्वारिका आ गए| जान गए कि श्रीकृष्ण ने क्यों बुलाया है| श्रीकृष्ण और श्रीराम दोनों एक ही हैं, वह यह भी जानते थे| इसीलिए सीधे राजदरबार नहीं गए कुछ कौतुक करने के लिए उद्यान में चले गए|

वृक्षों पर लगे फल तोड़ने लगे, कुछ खाए, कुछ फेंक दिए, वृक्षों को उखाड़ फेंका, कुछ तो तोड़ डाला... बाग वीरान बना दिया फल तोड़ना और फेंक देना, हनुमान जी का मकसद नहीं था...
वह तो श्रीकृष्ण के संकेत से कौतुक कर रहे थे...

बात श्रीकृष्ण तक पहुंची, किसी वानर ने राजोद्यान को उजाड़ दिया है...
कुछ किया जाए

श्रीकृष्ण ने गरुड़ को बुलाया|

"कहा,
"जाओ, सेना ले जाओ
उस वानर को पकड़कर लाओ|

" गरुड़ ने कहा, "प्रभु, एक मामूली वानर को पकड़ने के लिए सेना की क्या जरूरत है?
मैं अकेला ही उसे मजा चखा दूंगा|

" कृष्ण मन ही मन मुस्करा दिए... "जैसा तुम चाहो, लेकिन उसे रोको|

" गरुड़ ने जाकर... हनुमान जी को ललकारा,

"बाग क्यों उजाड़ रहे हो?
फल क्यों तोड़ रहे
हो?
चलो, तुम्हें श्रीकृष्ण बुला रहे हैं|

" हनुमान जी ने
कहा,

"मैं किसी कृष्ण को नहीं जानता| मैं तो श्रीराम का सेवक हूं
जाओ, कह दो, मैं नहीं आऊंगा|

" गरुड़ क्रोधित होकर बोला,

"तुम नहीं चलोगे तो मैं तुम्हें पकड़कर ले जाऊंगा|

" हनुमान जी ने
कोई उत्तर नहीं दिया...
गरुड़ की अनदेखी
कर वह फल तोड़ने रहे|

गरुड़ को समझाया भी,
"वानर का काम फल तोड़ना और फेंकना है, मैं अपने स्वभाव के अनुसार ही कर रहा हूं|
मेरे काम में दखल न दो, क्यों झगड़ा मोल लेते हो, जाओ...
मुझे आराम से फल
खाने दो|

" गरुड़ नहीं माना...

तब हनुमान जी ने अपनी पूंछ बढ़ाई और गरुड़ को दबोच लिया|
उसका घमंड दूर करने के लिए कभी पूंछ को ढीला कर देते, गरुड़ कुछ सांस लेता,और जब कसते तो गरुड़ के मानो प्राण ही निकल रहे हो...

हनुमान जी ने सोचा...
भगवान का वाहन है, प्रहार भी नहीं कर सकता|
लेकिन इसे सबक तो सिखाना ही होगा|
पूंछ को एक झटका दिया और गरुड़ को दूर समुद्र में फेंक दिया|
बड़ी मुश्किल से वह गरुड़ दरबार में पहुंचा...
भगवान को बताया, वह कोई साधारण वानर नहीं है...
मैं उसे पकड़कर नहीं ला सकता|

भगवान मुस्करा दिए -
सोचा गरुड़ का घमंड तो दूर हो गया...
लेकिन अभी इसके
वेग के घमंड को चूर करना है|

श्रीकृष्ण ने कहा,

"गरुड़, हनुमान श्रीराम जी का भक्त है, इसीलिए नहीं आया|
यदि तुम कहते कि श्रीराम ने बुलाया है, तो फौरन भागे चले आते|
हनुमान अब मलय पर्वत पर चले गए हैं| तुम तेजी से जाओ और उससे कहना, श्रीराम ने उन्हें बुलाया है|
तुम तेज उड़ सकते हो...
तुम्हारी गति बहुत है, उसे साथ ही ले आना|

" गरुड़ वेग से उड़े, मलय पर्वत पर पहुंचे|
हनुमान जी से क्षमा मांगी.
कहा श्रीराम ने आपको याद किया है,
अभी आओ मेरे साथ, मैं तुम्हें अपनी पीठ पर बिठाकर मिनटों में द्वारिका ले जाऊंगा
तुम खुद चलोगे तो देर हो जाएगी|

मेरी गति बहुत तेज है...
तुम मुकाबला नहीं कर सकते|

हनुमान जी मुस्कराए...
भगवान की लीला समझ गए|
कहा,

"तुम जाओ,
मैं तुम्हारे पीछे ही आ रहा हूं|

" द्वारिका में श्रीकृष्ण राम रूप धारण कर सत्यभामा को सीता बना सिंहासन पर बैठ गए...
सुदर्शन चक्र को आदेश दिया... द्वार पर रहना... कोई बिना आज्ञा अंदर न आने पाए...

श्रीकृष्ण समझते थे किश्रीराम का संदेश सुनकर तो हनुमान जी एक पल भी रुक नहीं सकते...
अभी आते ही होंगे
गरुड़ को तो हुनमान जी ने
विदा कर दिया और स्वयं उससे भी तीव्र गति से
उड़कर गरुड़ से
पहले ही द्वारका पहुंच गए|

दरबार के द्वार पर सुदर्शन ने उन्हें रोक कर कहा,

"बिना आज्ञा अंदर जाने की मनाही है|

"जब श्रीराम बुला रहे हों तो हनुमान जी विलंब सहन नहीं कर सकते...

सुदर्शन को पकड़ा और मुंह में दबा लिया|
अंदर गए, सिंहासन पर श्रीराम और सीता जी बैठे थे...
हुनमान जी समझ गए...
श्रीराम को प्रणाम किया और कहा,

"प्रभु, आने में देर तो नहीं हुई?

" साथ ही कहा, "प्रभु मां कहां है? आपके पास आज यह कौन दासी बैठी
है?

सत्यभामा ने सुना तो लज्जित हुई, क्योंकि वह समझती थी कि कृष्ण द्वारा पारिजात लाकर दिए जाने से वह सबसे सुंदर स्त्री बन गई है...

सत्यभामा का घमंड चूर हो गया|

उसी समय गरुड़ तेज गति से उड़ने के कारण हांफते हुए दरबार में पहुंचा... सांस फूल रही थी, थके हुए से लग रहे
थे...
और हनुमान जी को दरबार में देखकर तो
वह चकित हो गए|

मेरी गति से भी
तेज गति से हनुमान जी दरबार में पहुंच गए?
लज्जा से
पानी-पानी हो गए| गरुड़ के बल का और तेज गति से उड़ने का घमंड चूर हो गया...

श्रीराम ने पूछा, "हनुमान ! तुम अंदर कैसे आ गए?
किसी ने रोका नहीं?"

"रोका था भगवन, सुदर्शन ने...
मैंने सोचा आपके दर्शनों में विलंब होगा...
इसलिए उनसे उलझा
नहीं, उसे मैंने अपने मुंह में दबा लिया था|

" और यह कहकर हनुमान जी ने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के चरणों में डाल दिया|

तीनों के घमंड चूर हो गए|

श्रीकृष्ण यही चाहते थे|

श्रीकृष्ण ने हनुमान जी को गले लगाया, हृदय से
हृदयकी बात हुई... और उन्हें विदा कर दिया|

परमात्मा अपने भक्तों में अपने निकटस्थों में अभिमान रहने नहीं देते|

श्रीकृष्ण सत्यभामा, गरुड़ और सुदर्शन चक्र का घमंड दूर न करते तो परमात्मा के निकट रह नहीं सकते थे...
और परमात्मा के निकट रह ही वह सकता है जो 'मैं' और 'मेरी' से रहित है|

श्रीराम से जुड़े व्यक्ति में कभी अभिमान हो ही नहीं सकता...
न श्रीराम में अभिमान था, न उनके भक्त हनुमान में, न श्रीराम ने
कहा कि मैंने किया है
और न हनुमान जी ने ही कहा कि मैंने किया है...
इसलिए दोनों एक हो गए...
न अलग थे, न अलग रहे|

—जय श्री राम ..जय जय हनुमान .....

Monday, August 20, 2012

श्री नारायण कवच


श्री नारायण कवच
न्यासः- सर्वप्रथम श्रीगणेश जी तथा भगवान नारायण को नमस्कार करके नीचे लिखे प्रकार से न्यास करें।
अंग -न्यासः-
ॐ ॐ नमः — पादयोः ( दाहिने हाँथ की तर्जनी व अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर दोनों पैरों का स्पर्श करें)।
ॐ नं नमः — जानुनोः ( दाहिने हाँथ की तर्जनी व अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर दोनों घुटनों का स्पर्श करें )।
ॐ मों नमः — ऊर्वोः (दाहिने हाथ की तर्जनी अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर दोनों पैरों की जाँघ का स्पर्श करें)।
ॐ नां नमः — उदरे ( दाहिने हाथ की तर्जनी तथा अंगुठा — इन दोनों को मिलाकर पेट का स्पर्श करे )
ॐ रां नमः — हृदि ( मध्यमा-अनामिका-तर्जनी से हृदय का स्पर्श करें )
ॐ यं नमः – उरसि ( मध्यमा- अनामिका-तर्जनी से छाती का स्पर्श करे )
ॐ णां नमः — मुखे ( तर्जनी – अँगुठे के संयोग से मुख का स्पर्श करे )
ॐ यं नमः — शिरसि ( तर्जनी -मध्यमा के संयोग से सिर का स्पर्श करे )

कर-न्यासः-
ॐ ॐ नमः — दक्षिणतर्जन्याम् ( दाहिने अँगुठे से दाहिने तर्जनी के सिरे का स्पर्श करे )
ॐ नं नमः —-दक्षिणमध्यमायाम् ( दाहिने अँगुठे से दाहिने हाथ की मध्यमा अँगुली का ऊपर वाला पोर स्पर्श करे )
ॐ मों नमः —दक्षिणानामिकायाम् ( दहिने अँगुठे से दाहिने हाथ की अनामिका का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ भं नमः —-दक्षिणकनिष्ठिकायाम् (दाहिने अँगुठे से हाथ की कनिष्ठिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श करे )
ॐ गं नमः —-वामकनिष्ठिकायाम् ( बाँये अँगुठे से बाँये हाथ की कनिष्ठिका का ऊपर वाला पोर स्पर्श करे )
ॐ वं नमः —-वामानिकायाम् ( बाँये अँगुठे से बाँये हाँथ की अनामिका का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ तें नमः —-वाममध्यमायाम् ( बाँये अँगुठे से बाये हाथ की मध्यमा का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ वां नमः —वामतर्जन्याम् ( बाँये अँगुठे से बाँये हाथ की तर्जनी का ऊपरवाला पोर स्पर्श करे )
ॐ सुं नमः —-दक्षिणाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि ( दाहिने हाथ की चारों अँगुलियों से दाहिने हाथ के अँगुठे का ऊपरवाला पोर छुए )
ॐ दें नमः —–दक्षिणाङ्गुष्ठाधः पर्वणि ( दाहिने हाथ की चारों अँगुलियों से दाहिने हाथ के अँगुठे का नीचे वाला पोर छुए )
ॐ वां नमः —–वामाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि ( बाँये हाथ की चारों अँगुलियों से बाँये अँगुठे के ऊपरवाला पोर छुए )
ॐ यं नमः ——वामाङ्गुष्ठाधः पर्वणि ( बाँये हाथ की चारों अँगुलियों से बाँये हाथ के अँगुठे का नीचे वाला पोर छुए )

विष्णुषडक्षरन्यासः-
ॐ ॐ नमः ————हृदये ( तर्जनी – मध्यमा एवं अनामिका से हृदय का स्पर्श करे )
ॐ विं नमः ————-मूर्ध्नि ( तर्जनी मध्यमा के संयोग सिर का स्पर्श करे )
ॐ षं नमः —————भ्रुर्वोर्मध्ये ( तर्जनी-मध्यमा से दोनों भौंहों का स्पर्श करे )
ॐ णं नमः —————शिखायाम् ( अँगुठे से शिखा का स्पर्श करे )
ॐ वें नमः —————नेत्रयोः ( तर्जनी -मध्यमा से दोनों नेत्रों का स्पर्श करे )
ॐ नं नमः —————सर्वसन्धिषु ( तर्जनी – मध्यमा और अनामिका से शरीर के सभी जोड़ों — जैसे – कंधा, घुटना, कोहनी आदि का स्पर्श करे )
ॐ मः अस्त्राय फट् — प्राच्याम् (पूर्व की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् –आग्नेय्याम् ( अग्निकोण में चुटकी बजायें )
ॐ मः अस्त्राय फट् — दक्षिणस्याम् ( दक्षिण की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — नैऋत्ये (नैऋत्य कोण में चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — प्रतीच्याम्( पश्चिम की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — वायव्ये ( वायुकोण में चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — उदीच्याम्( उत्तर की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — ऐशान्याम् (ईशानकोण में चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — ऊर्ध्वायाम् ( ऊपर की ओर चुटकी बजाएँ )
ॐ मः अस्त्राय फट् — अधरायाम् (नीचे की ओर चुटकी बजाएँ )

श्री हरिः

अथ श्रीनारायणकवच
।।राजोवाच।।
यया गुप्तः सहस्त्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान्।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्।।१
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्।
यथाssततायिनः शत्रून् येन गुप्तोsजयन्मृधे।।२
राजा परिक्षित ने पूछाः भगवन् ! देवराज इंद्र ने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओं की चतुरङ्गिणी सेना को खेल-खेल में अनायास ही जीतकर त्रिलोकी की राज लक्ष्मी का उपभोग किया, आप उस नारायण कवच को सुनाइये और यह भी बतलाईये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमि में किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की ।।१-२

।।श्रीशुक उवाच।।
वृतः पुरोहितोस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु।।३
श्रीशुकदेवजी ने कहाः परीक्षित् ! जब देवताओं ने विश्वरूप को पुरोहित बना लिया, तब देवराज इन्द्र के प्रश्न करने पर विश्वरूप ने नारायण कवच का उपदेश दिया तुम एकाग्रचित्त से उसका श्रवण करो ।।३

विश्वरूप उवाचधौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ् मुखः।
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः।।४
नारायणमयं वर्म संनह्येद् भय आगते।
पादयोर्जानुनोरूर्वोरूदरे हृद्यथोरसि।।५
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत्।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा।।६
विश्वरूप ने कहा – देवराज इन्द्र ! भय का अवसर उपस्थित होने पर नारायण कवच धारण करके अपने शरीर की रक्षा कर लेनी चाहिए उसकी विधि यह है कि पहले हाँथ-पैर धोकर आचमन करे, फिर हाथ में कुश की पवित्री धारण करके उत्तर मुख करके बैठ जाय इसके बाद कवच धारण पर्यंत और कुछ न बोलने का निश्चय करके पवित्रता से “ॐ नमो नारायणाय” और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इन मंत्रों के द्वारा हृदयादि अङ्गन्यास तथा अङ्गुष्ठादि करन्यास करे पहले “ॐ नमो नारायणाय” इस अष्टाक्षर मन्त्र के ॐ आदि आठ अक्षरों का क्रमशः पैरों, घुटनों, जाँघों, पेट, हृदय, वक्षःस्थल, मुख और सिर में न्यास करे अथवा पूर्वोक्त मन्त्र के यकार से लेकर ॐ कार तक आठ अक्षरों का सिर से आरम्भ कर उन्हीं आठ अङ्गों में विपरित क्रम से न्यास करे ।।४-६

करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया।
प्रणवादियकारन्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु।।७
तदनन्तर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस द्वादशाक्षर -मन्त्र के ॐ आदि बारह अक्षरों का दायीं तर्जनी से बाँयीं तर्जनी तक दोनों हाँथ की आठ अँगुलियों और दोनों अँगुठों की दो-दो गाठों में न्यास करे।।७

न्यसेद् हृदय ओङ्कारं विकारमनु मूर्धनि।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत्।।८
वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः।।९
सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्।
ॐ विष्णवे नम इति ।।१०
फिर “ॐ विष्णवे नमः” इस मन्त्र के पहले के पहले अक्षर ‘ॐ’ का हृदय में, ‘वि’ का ब्रह्मरन्ध्र , में ‘ष’ का भौहों के बीच में, ‘ण’ का चोटी में, ‘वे’ का दोनों नेत्रों और ‘न’ का शरीर की सब गाँठों में न्यास करे तदनन्तर ‘ॐ मः अस्त्राय फट्’ कहकर दिग्बन्ध करे इस प्रकर न्यास करने से इस विधि को जानने वाला पुरूष मन्त्रमय हो जाता है ।।८-१०

आत्मानं परमं ध्यायेद ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम्।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत ।।११
इसके बाद समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य से परिपूर्ण इष्टदेव भगवान् का ध्यान करे और अपने को भी तद् रूप ही चिन्तन करे तत्पश्चात् विद्या, तेज, और तपः स्वरूप इस कवच का पाठ करे ।।११

ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे।
दरारिचर्मासिगदेषुचापाशान् दधानोsष्टगुणोsष्टबाहुः ।।१२
भगवान् श्रीहरि गरूड़जी के पीठ पर अपने चरणकमल रखे हुए हैं, अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही हैं आठ हाँथों में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष, और पाश (फंदा) धारण किए हुए हैं वे ही ओंकार स्वरूप प्रभु सब प्रकार से सब ओर से मेरी रक्षा करें।।१२

जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरूणस्य पाशात्।
स्थलेषु मायावटुवामनोsव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ।।१३
मत्स्यमूर्ति भगवान् जल के भीतर जलजंतुओं से और वरूण के पाश से मेरी रक्षा करें माया से ब्रह्मचारी रूप धारण करने वाले वामन भगवान् स्थल पर और विश्वरूप श्री त्रिविक्रमभगवान् आकाश में मेरी रक्षा करें 13

दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयुथपारिः।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ।।१४
जिनके घोर अट्टहास करने पर सब दिशाएँ गूँज उठी थीं और गर्भवती दैत्यपत्नियों के गर्भ गिर गये थे, वे दैत्ययुथपतियों के शत्रु भगवान् नृसिंह किले, जंगल, रणभूमि आदि विकट स्थानों में मेरी रक्षा करें ।।१४

रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोsव्याद् भरताग्रजोsस्मान् ।।१५
अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठा लेने वाले यज्ञमूर्ति वराह भगवान् मार्ग में, परशुराम जी पर्वतों के शिखरों और लक्ष्मणजी के सहित भरत के बड़े भाई भगावन् रामचंद्र प्रवास के समय मेरी रक्षा करें ।।१५

मामुग्रधर्मादखिलात् प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च हासात्।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद् गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ।।१६
भगवान् नारायण मारण – मोहन आदि भयंकर अभिचारों और सब प्रकार के प्रमादों से मेरी रक्षा करें ऋषिश्रेष्ठ नर गर्व से, योगेश्वर भगवान् दत्तात्रेय योग के विघ्नों से और त्रिगुणाधिपति भगवान् कपिल कर्मबन्धन से मेरी रक्षा करें ।।१६

सनत्कुमारो वतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।
देवर्षिवर्यः पुरूषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ।।१७
परमर्षि सनत्कुमार कामदेव से, हयग्रीव भगवान् मार्ग में चलते समय देवमूर्तियों को नमस्कार आदि न करने के अपराध से, देवर्षि नारद सेवापराधों से और भगवान् कच्छप सब प्रकार के नरकों से मेरी रक्षा करें ।।१७

धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वाद् भयादृषभो निर्जितात्मा।
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् बलो गणात् क्रोधवशादहीन्द्रः ।।१८
भगवान् धन्वन्तरि कुपथ्य से, जितेन्द्र भगवान् ऋषभदेव सुख-दुःख आदि भयदायक द्वन्द्वों से, यज्ञ भगवान् लोकापवाद से, बलरामजी मनुष्यकृत कष्टों से और श्रीशेषजी क्रोधवशनामक सर्पों के गणों से मेरी रक्षा करें ।।१८

द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणात् प्रमादात्।
कल्किः कले कालमलात् प्रपातु धर्मावनायोरूकृतावतारः ।।१९
भगवान् श्रीकृष्णद्वेपायन व्यासजी अज्ञान से तथा बुद्धदेव पाखण्डियों से और प्रमाद से मेरी रक्षा करें धर्म-रक्षा करने वाले महान अवतार धारण करने वाले भगवान् कल्कि पाप-बहुल कलिकाल के दोषों से मेरी रक्षा करें ।।१९

मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः।
नारायण प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ।।२०
प्रातःकाल भगवान् केशव अपनी गदा लेकर, कुछ दिन चढ़ जाने पर भगवान् गोविन्द अपनी बांसुरी लेकर, दोपहर के पहले भगवान् नारायण अपनी तीक्ष्ण शक्ति लेकर और दोपहर को भगवान् विष्णु चक्रराज सुदर्शन लेकर मेरी रक्षा करें ।।२०

देवोsपराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु माधवो माम्।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोsवतु पद्मनाभः ।।२१
तीसरे पहर में भगवान् मधुसूदन अपना प्रचण्ड धनुष लेकर मेरी रक्षा करें सांयकाल में ब्रह्मा आदि त्रिमूर्तिधारी माधव, सूर्यास्त के बाद हृषिकेश, अर्धरात्रि के पूर्व तथा अर्ध रात्रि के समय अकेले भगवान् पद्मनाभ मेरी रक्षा करें ।।२१

श्रीवत्सधामापररात्र ईशः प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ।।२२
रात्रि के पिछले प्रहर में श्रीवत्सलाञ्छन श्रीहरि, उषाकाल में खड्गधारी भगवान् जनार्दन, सूर्योदय से पूर्व श्रीदामोदर और सम्पूर्ण सन्ध्याओं में कालमूर्ति भगवान् विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें ।।२२

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम्।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमासु कक्षं यथा वातसखो हुताशः ।।२३
सुदर्शन ! आपका आकार चक्र ( रथ के पहिये ) की तरह है आपके किनारे का भाग प्रलयकालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् की प्रेरणा से सब ओर घूमते रहते हैं जैसे आग वायु की सहायता से सूखे घास-फूस को जला डालती है, वैसे ही आप हमारी शत्रुसेना को शीघ्र से शीघ्र जला दीजिये, जला दीजिये ।।२३
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि। कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षोभूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ।।२४
कौमुद की गदा ! आपसे छूटने वाली चिनगारियों का स्पर्श वज्र के समान असह्य है आप भगवान् अजित की प्रिया हैं और मैं उनका सेवक हूँ इसलिए आप कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत और प्रेतादि ग्रहों को अभी कुचल डालिये, कुचल डालिये तथा मेरे शत्रुओं को चूर – चूर कर दिजिये ।।२४

त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन् ।।२५
शङ्खश्रेष्ठ ! आप भगवान् श्रीकृष्ण के फूँकने से भयंकर शब्द करके मेरे शत्रुओं का दिल दहला दीजिये एवं यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस आदि भयावने प्राणियों को यहाँ से तुरन्त भगा दीजिये ।।२५

त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्यमीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि।
चर्मञ्छतचन्द्र छादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् २६
भगवान् की श्रेष्ठ तलवार ! आपकी धार बहुत तीक्ष्ण है आप भगवान् की प्रेरणा से मेरे शत्रुओं को छिन्न-भिन्न कर दिजिये। भगवान् की प्यारी ढाल ! आपमें सैकड़ों चन्द्राकार मण्डल हैं आप पापदृष्टि पापात्मा शत्रुओं की आँखे बन्द कर दिजिये और उन्हें सदा के लिये अन्धा बना दीजिये ।।२६

यन्नो भयं ग्रहेभ्यो भूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव वा ।।२७

सर्वाण्येतानि भगन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतीपकाः ।।२८
सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छल तारे ) आदि केतु, दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगने वाले जन्तु, दाढ़ोंवाले हिंसक पशु, भूत-प्रेत आदि तथा पापी प्राणियों से हमें जो-जो भय हो और जो हमारे मङ्गल के विरोधी हों – वे सभी भगावान् के नाम, रूप तथा आयुधों का कीर्तन करने से तत्काल नष्ट हो जायें ।।२७-२८

गरूड़ो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ।।२९
बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान् गरूड़ और विष्वक्सेनजी अपने नामोच्चारण के प्रभाव से हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचायें।।२९

सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः।
बुद्धिन्द्रियमनः प्राणान् पान्तु पार्षदभूषणाः ।।३०
श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और श्रेष्ठ पार्षद हमारी बुद्धि , इन्द्रिय , मन और प्राणों को सब प्रकार की आपत्तियों से बचायें ।।३०

यथा हि भगवानेव वस्तुतः सद्सच्च यत्।
सत्यनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपाद्रवाः ।।३१
जितना भी कार्य अथवा कारण रूप जगत है, वह वास्तव में भगवान् ही है इस सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जायें ।।३१

यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्।
भूषणायुद्धलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ।।३२

तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ।।३३

जो लोग ब्रह्म और आत्मा की एकता का अनुभव कर चुके हैं, उनकी दृष्टि में भगवान् का स्वरूप समस्त विकल्पों से रहित है-भेदों से रहित हैं फिर भी वे अपनी माया शक्ति के द्वारा भूषण, आयुध और रूप नामक शक्तियों को धारण करते हैं यह बात निश्चित रूप से सत्य है इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक भगवान् श्रीहरि सदा -सर्वत्र सब स्वरूपों से हमारी रक्षा करें ।।३२-३३
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्तादन्तर्बहिर्भगवान् नारसिंहः।
प्रहापयँल्लोकभयं स्वनेन ग्रस्तसमस्ततेजाः ।।३४
जो अपने भयंकर अट्टहास से सब लोगों के भय को भगा देते हैं और अपने तेज से सबका तेज ग्रस लेते हैं, वे भगवान् नृसिंह दिशा -विदिशा में, नीचे -ऊपर, बाहर-भीतर – सब ओर से हमारी रक्षा करें ।।३४

मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारयणात्मकम्।
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ।।३५
देवराज इन्द्र ! मैने तुम्हें यह नारायण कवच सुना दिया है इस कवच से तुम अपने को सुरक्षित कर लो बस, फिर तुम अनायास ही सब दैत्य – यूथपतियों को जीत कर लोगे ।।३५

एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा।
पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ।।३६
इस नारायण कवच को धारण करने वाला पुरूष जिसको भी अपने नेत्रों से देख लेता है अथवा पैर से छू देता है, तत्काल समस्त भयों से से मुक्त हो जाता है 36

न कुतश्चित भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ।।३७
जो इस वैष्णवी विद्या को धारण कर लेता है, उसे राजा, डाकू, प्रेत, पिशाच आदि और बाघ आदि हिंसक जीवों से कभी किसी प्रकार का भय नहीं होता ।।३७

इमां विद्यां पुरा कश्चित् कौशिको धारयन् द्विजः।
योगधारणया स्वाङ्गं जहौ स मरूधन्वनि ।।३८
देवराज! प्राचीनकाल की बात है, एक कौशिक गोत्री ब्राह्मण ने इस विद्या को धारण करके योगधारणा से अपना शरीर मरूभूमि में त्याग दिया ।।३८

तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा।
ययौ चित्ररथः स्त्रीर्भिवृतो यत्र द्विजक्षयः ।।३९
जहाँ उस ब्राह्मण का शरीर पड़ा था, उसके उपर से एक दिन गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के साथ विमान पर बैठ कर निकले ।।३९

गगनान्न्यपतत् सद्यः सविमानो ह्यवाक् शिराः।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ।।४०
वहाँ आते ही वे नीचे की ओर सिर किये विमान सहित आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़े इस घटना से उनके आश्चर्य की सीमा न रही जब उन्हें बालखिल्य मुनियों ने बतलाया कि यह नारायण कवच धारण करने का प्रभाव है, तब उन्होंने उस ब्राह्मण देव की हड्डियों को ले जाकर पूर्ववाहिनी सरस्वती नदी में प्रवाहित कर दिया और फिर स्नान करके वे अपने लोक को चले गये ।।४०

।।श्रीशुक उवाच।।
य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चादृतः।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ।।४१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं – परिक्षित् जो पुरूष इस नारायण कवच को समय पर सुनता है और जो आदर पूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने सभी प्राणी आदर से झुक जाते हैं और वह सब प्रकार के भयों से मुक्त हो जाता है ।।४१

एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्यऽमृधेसुरान् ।।४२

परीक्षित् ! शतक्रतु इन्द्र ने आचार्य विश्वरूपजी से यह वैष्णवी विद्या प्राप्त करके रणभूमि में असुरों को जीत लिया और वे त्रैलोक्यलक्ष्मी का उपभोग करने लगे 42
।।इति श्रीनारायणकवचं सम्पूर्णम्।।
( श्रीमद्भागवत स्कन्ध 6 , अ। 8 )

मां छिन्नमस्तिका


मां छिन्नमस्तिका




झारखंड की राजधानी रांची से 75 किमी स्थित मां छिन्नमस्तिका का विख्यात सिद्धपीठ दस महा विद्याओं  में से एक है. रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित यह मंदिर रामगढ़, बिहार, झारखंड, बंगाल और छत्तीसगढ़ के भक्तों की आस्था की धरोहर है. इस मंदिर को दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में भी मान्यता है.
मंदिर के निर्माण के बारे में कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं. कुछ लोगों का कहना है कि मां छिन्नमस्तिका के इस शक्तिपीठ का निर्माण छह हजार वर्ष पहले हुआ था. वहीं कोई इसे महाभारत युग का मानता है. मां छिन्नमस्तिका के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की मानें, तो मां का प्राचीन मंदिर सालों पहले ही नष्ट हो गया था, लेकिन भक्तों की श्रद्धा के चलते इसे एक बार फिर नया रूप देकर नये मंदिर का निर्माण किया गया. हां, मगर पुराने मंदिर की प्राचीन प्रतिमा आज भी यहां मौजूद है. यह मूल प्रतिमा कितनी पुरानी है. इसका कोई सही प्रमाण नहीं मिल पाया है.
मंदिर के अंदर स्थित शिलाखंड में मां की तीन आंखें बनीं हैं. बायां पांव आगे की ओर बढ़ाये हुए मां कमल के पुष्प पर खड़ी हैं. पांव के नीचे रति मुद्रा में कामदेव और रति शयनावस्था में लेटे हैं. मां छिन्नमस्तिका के गले में सर्प की माला और मुंडमाला सुशोभित है. उनके दाएं हाथ में तलवार और बाएं हाथ में अपना ही कटा हुआ मस्तक है.
मां की शिला के अगल-बगल उनकी सहचरियां डाकिनी और शाकिनी खड़ी हैं, जिन्हें मां अपना रक्तपान करा रही हैं और स्वयं भी रक्तपान कर रही हैं. इनके गले से रक्त की तीन धाराएं बह रही हैं. बिखरे और खुले बाल, बाहर निकली जीभ और आभूषणों से सजी मां..
पौराणिक कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि एक बार भगवती भवानी अपनी दो सहचरियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने आयी थीं. स्नान करने के बाद मां के संग आयी दोनों सहचरियों को बहुत तेज भूख लग गयी और भूख की पीड़ा से उनका रंग काला हो गया. सहचरियों ने भोजन के लिए भवानी से कुछ मांगा. भवानी ने उनसे कुछ देर प्रतीक्षा करने के लिए कहा, लेकिन वे भूख से तड़पने लगीं. तभी सहचरियों ने मां से अनुरोध करते हुए कहा कि मां तो अपने हर काम को भूलकर अपने भूखे शिशु को भोजन कराती है.
सहचरियों का यह कथन सुनते ही भवानी ने खड़ग से अपना सिर काट दिया. कटा हुआ सिर उनके बायें हाथ में आ गिरा और तीन रक्तधाराएं बह निकली. सिर से निकली दो रक्त धाराओं को उन्होंने सहचरियों की और प्रवाहित कर दिया. मां के रक्त का पान कर दोनों सहचरियां तृप्त हो गयीं. तीसरी धारा जो ऊपर की ओर बह रही थी, उसका मां स्वयं पान करने लगीं. तभी से मां इस रूप को छिन्नमस्तिका के नाम से पूजा जाने लगा.
मां छिन्नमस्तिका की पूजा-अर्चना के लिए मंदिर में सुबह के चार बजे से ही माता का दरबार सजना शुरू हो जाता है. भक्तों की भीड़ पंक्तिबद्ध होकर मां के दर्शन करना शुरू कर देती है. खासकर शादी-विवाह, मुंडन-उपनयन के लगन और दशहरे के मौके पर यहां भक्तों की तीन-चार किलोमीटर लंबी लाइन नजर आती है. मंदिर के आसपास ही फल-फूल, प्रसाद की कई छोटी दुकानें हैं. आमतौर पर लोग यहां सुबह आते हैं. दिनभर पूजा-पाठ और मंदिर के दर्शन करने के बाद शाम तक मां के दर्शन करके लौट जाते हैं. -

Friday, August 17, 2012

भगवान वेदव्यास द्वारा रचित अठारह पुराणों में से एक 'अग्नि पुराण' में अग्निदेव द्वारा महर्षि वशिष्ठ को दिये गये विभिन्न उपदेश हैं। इसी के अंतर्गत इस पापनाशक स्तोत्र के बारे में महात्मा पुष्कर कहते हैं कि मनुष्य चित्त की मलिनतावश चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन आदि विभिन्न पाप करता है, पर जब चित्त कुछ शुद्ध होता है तब उसे इन पापों से मुक्ति की इच्छा होती है। उस समय भगवान नारायण की दिव्य स्तुति करने से समस्त पापों का प्रायश्चित पूर्ण होता है। इसीलिए इस दिव्य स्तोत्र का नाम 'समस्त पापनाशक स्तोत्र' है।
निम्निलिखित प्रकार से भगवान नारायण की स्तुति करें-
पुष्करोवाच
विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे नमः।
नमामि विष्णुं चित्तस्थमहंकारगतिं हरिम्।।
चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम्।
विष्णुमीड्यमशेषेण अनादिनिधनं विभुम्।।
विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च यत्।
यच्चाहंकारगो विष्णुर्यद्वष्णुर्मयि संस्थितः।।
करोति कर्मभूतोऽसौ स्थावरस्य चरस्य च।
तत् पापं नाशमायातु तस्मिन्नेव हि चिन्तिते।।
ध्यातो हरति यत् पापं स्वप्ने दृष्टस्तु भावनात्।
तमुपेन्द्रमहं विष्णुं प्रणतार्तिहरं हरिम्।।
जगत्यस्मिन्निराधारे मज्जमाने तमस्यधः।
हस्तावलम्बनं विष्णु प्रणमामि परात्परम्।।
सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज।
हृषीकेश हृषीकेश हृषीकेश नमोऽस्तु ते।।
नृसिंहानन्त गोविन्द भूतभावन केशव।
दुरूक्तं दुष्कृतं ध्यातं शमयाघं नमोऽस्तु ते।।
यन्मया चिन्तितं दुष्टं स्वचित्तवशवर्तिना।
अकार्यं महदत्युग्रं तच्छमं नय केशव।।
बह्मण्यदेव गोविन्द परमार्थपरायण।
जगन्नाथ जगद्धातः पापं प्रशमयाच्युत।।
यथापराह्ने सायाह्ने मध्याह्ने च तथा निशि।
कायेन मनसा वाचा कृतं पापमजानता।।
जानता च हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।
नामत्रयोच्चारणतः पापं यातु मम क्षयम्।।
शरीरं में हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।
पापं प्रशमयाद्य त्वं वाक्कृतं मम माधव।।
यद् भुंजन् यत् स्वपंस्तिष्ठन् गच्छन् जाग्रद यदास्थितः।
कृतवान् पापमद्याहं कायेन मनसा गिरा।।
यत् स्वल्पमपि यत् स्थूलं कुयोनिनरकावहम्।
तद् यातु प्रशमं सर्वं वासुदेवानुकीर्तनात्।।
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं च यत्।
तस्मिन् प्रकीर्तिते विष्णौ यत् पापं तत् प्रणश्यतु।।
यत् प्राप्य न निवर्तन्ते गन्धस्पर्शादिवर्जितम्।
सूरयस्तत् पदं विष्णोस्तत् सर्वं शमयत्वघम्।।
(अग्नि पुराणः 172.2-98)
माहात्म्यम् –
पापप्रणाशनं स्तोत्रं यः पठेच्छृणुयादपि।
शारीरैर्मानसैर्वाग्जैः कृतैः पापैः प्रमुच्यते।।
सर्वपापग्रहादिभ्यो याति विष्णोः परं पदम्।
तस्मात् पापे कृते जप्यं स्तोत्रं सर्वाघमर्दनम्।।
प्रायश्चित्तमघौघानां स्तोत्रं व्रतकृते वरम्।
प्रायश्चित्तैः स्तोत्रजपैर्व्रतैर्नश्यति पातकम्।।
(अग्नि पुराणः 172.17-29)
अर्थः पुष्कर बोलेः "सर्वव्यापी विष्णु को सदा नमस्कार है। श्री हरि विष्णु को नमस्कार है। मैं अपने चित्त में स्थित सर्वव्यापी, अहंकारशून्य श्रीहरि को नमस्कार करता हूँ। मैं अपने मानस में विराजमान अव्यक्त, अनन्त और अपराजित परमेश्वर को नमस्कार करता हूँ। सबके पूजनीय, जन्म और मरण से रहित, प्रभावशाली श्रीविष्णु को नमस्कार है। विष्णु मेरे चित्त में निवास करते हैं, विष्णु मेरी बुद्धि में विराजमान हैं, विष्णु मेरे अहंकार में प्रतिष्ठित हैं और विष्णु मुझमें भी स्थित हैं।
वे श्री विष्णु ही चराचर प्राणियों के कर्मों के रूप में स्थित हैं, उनके चिंतन से मेरे पाप का विनाश हो। जो ध्यान करने पर पापों का हरण करते हैं और भावना करने से स्वप्न में दर्शन देते हैं, इन्द्र के अनुज, शरणागतजनों का दुःख दूर करने वाले उन पापापहारी श्रीविष्णु को मैं नमस्कार करता हूँ।
मैं इस निराधार जगत में अज्ञानांधकार में डूबते हुए को हाथ का सहारा देने वाले परात्परस्वरूप श्रीविष्णु के सम्मुख नतमस्तक होता हूँ। सर्वेश्वरेश्वर प्रभो !कमलनयन परमात्मन् ! हृषीकेश ! आपको नमस्कार है। इन्द्रियों के स्वामी श्रीविष्णो ! आपको नमस्कार है। नृसिंह ! अनन्तस्वरूप गोविन्द ! समस्त भूत-प्राणियों की सृष्टि करने वाले केशव ! मेरे द्वारा जो दुर्वचन कहा गया हो अथवा पापपूर्ण चिंतन किया गया हो, मेरे उस पाप का प्रशमन कीजिये, आपको नमस्कार है। केशव ! अपने मन के वश में होकर मैंने जो न करने योग्य अत्यंत उग्र पापपूर्ण चिंतन किया है, उसे शांत कीजिये। परमार्थपरायण, ब्राह्मणप्रिय गोविन्द ! अपनी मर्यादा से कभी च्युत न होने वाले जगन्नाथ ! जगत का भरण-पोषण करने वाले देवेश्वर ! मेरे पाप का विनाश कीजिये। मैंने मध्याह्न, अपराह्न, सायंकाल एवं रात्रि के समय जानते हुए अथवा अनजाने, शरीर, मन एवं वाणी के द्वारा जो पाप किया हो, 'पुण्डरीकाक्ष', 'हृषीकेश', 'माधव' – आपके इन तीन नामों के उच्चारण से मेरे वे सब पाप क्षीण हो जायें। कमलनयन ! लक्ष्मीपते ! इन्द्रियों के स्वामी माधव ! आज आप मेरे शरीर एवं वाणी द्वारा किये हुए पापों का हनन कीजिये। आज मैंने खाते, सोते, खड़े, चलते अथवा जागते हुए मन, वाणी और शरीर से जो भी नीच योनि एवं नरक की प्राप्ति कराने वाले सूक्ष्म अथवा स्थूल पाप किये हों, भगवान वासुदेव के नामोच्चारण से वे सब विनष्ट हो जायें। जो परब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, उन श्रीविष्णु के संकीर्तन से मेरे पाप लुप्त हो जायें। जिसको प्राप्त होकर ज्ञानीजन पुनः लौटकर नहीं आते, जो गंध, स्पर्श आदि तन्मात्राओं से रहित है, श्रीविष्णु का वह परम पद मेरे सम्पूर्ण पापों का शमन करे।"
माहात्म्यः जो मनुष्य पापों का विनाश करने वाले इस स्तोत्र का पठन अथवा श्रवण करता है, वह शरीर, मन और वाणीजनित समस्त पापों से छूट जाता है एवं समस्त पापग्रहों से मुक्त होकर श्रीविष्णु के परम पद को प्राप्त होता है। इसलिए किसी भी पाप के हो जाने पर इस स्तोत्र का जप करें। यह स्तोत्र पापसमूहों के प्रायश्चित के समान है। कृच्छ्र आदि व्रत करने वाले के लिए भी यह श्रेष्ठ है। स्तोत्र-जप और व्रतरूप प्रायश्चित से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिए भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिए इनका अनुष्ठान करना चाहिए।

पुरुषोत्तम माह

पुरुषोत्तम माह


कितना श्रेयस्कर है यह मलमास या अधिमास? इसका शब्दों में बखान करना सचमुच बहुत कठिन है। एक बार फिर अधिमासआज  18 अगस्त से प्रारंभ हो रहा है। यह अधिमास खगोलीय दृष्टि से पूर्णत: वैज्ञानिक है तो दूसरी ओर आध्यात्मिकता प्राप्त करने के लिए यह सर्वोत्तम है। बस हमें जानना आवश्यक है कि इस बीच हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। 


                              भारतीय पंचांग में अधिमास का बड़ा महत्व है। खगोलीय गणना के अनुसार, हर तीसरे वर्ष एक बार अधिक मास होता है। यह सौर और चंद्र मास को एक समान लाने की गणितीय प्रक्रिया है। शास्त्रों में कहा गया है कि पुरुषोत्तम मास में किए गए जप, तप और दान से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है। सूर्य की बारह संक्रांति होती हैं और इसी आधार पर हमारे चंद्र पर आधारित बारह माह होते हैं। हर तीन वर्ष के अंतराल पर अधिक मास या मलमास आता है। शास्त्रों में कहा गया-
यस्मिन चांद्रे न संक्रांति: सो अधिमासो निगह्यते
तत्र मंगल कार्यानि नैव कुर्यात कदाचन्।
यस्मिन मासे द्वि संक्रांति क्षय: मास: स कथ्यते
तस्मिन शुभाणि कार्याणि यत्नत: परिवर्जयेत।।
अधिक मास क्या है?
जिस माह में सूर्य संक्रांति नहीं होती, वह अधिक मास होता है। इसी प्रकार जिस माह में दो सूर्य संक्रांति होती है वह क्षय मास कहलाता है। इन दोनों ही मासों में मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं, परंतु धर्म-कर्म के कार्य पुण्य फलदायी होते हैं। सौर वर्ष 365. 2422 दिन का होता है, जबकि चंद्र वर्ष 354.327 दिन का होता है। इस तरह दोनों के कैलेंडर वर्ष में 10.87 दिन का अंतर आ जाता है और तीन वर्ष में यह अंतर एक माह का हो जाता है। इस असमानता को दूर करने के लिए अधिक मास एवं क्षय मास का नियम बनाया गया है।
अधिक मास क्यों व कब?
यह एक खगोलशास्त्रीय तथ्य है कि सूर्य 30.44 दिन में एक राशि को पार कर लेता है।  यही क्रम सौर महीना है। ऐसे बारह महीनों का समय जो 365.25 दिन का है, एक सौर वर्ष कहलाता है। चंद्रमा का महीना 29.53 दिनों का होता है, जिससे चंद्र वर्ष में 354.36 दिन ही होते हैं। यह अंतर 32.5 माह के बाद यह एक चंद्र माह के बराबर हो जाता है। इस समय को समायोजित करने के लिए हर तीसरे वर्ष एक अधिक मास होता है। एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या के बीच कम से कम एक बार सूर्य की संक्रांति होती है। जब दो अमावस्या के बीच कोई संक्रांति नहीं होती तो वह माह बढ़ा हुआ या अधिक मास होता है। संक्रांति वाला माह शुद्ध माह, संक्रांति रहित माह अधिक माह और दो अमावस्या के बीच दो संक्रांति हो जाएं तो क्षय माह होता है। क्षय मास कभी-कभी होता है।
अधिक मास के संदर्भ
अधिक मास कई नामों से जाना जाता है- अधिमास, मलमास, मलिम्लुच, संसर्प, अंहस्पति या अंहसस्पति, पुरुषोत्तम मास ।  इनकी व्याख्या जरूरी है। यह द्रष्टव्य है कि बहुत प्राचीन काल से अधिक मास निन्द्य ठहराए गए हैं। अग्नि पुराण  में प्रसंग आया है- वैदिक अग्नियों को प्रज्वलित करना, मूर्ति-प्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, व्रत, संकल्प के साथ वेद-पाठ, सांड़ छोड़ना (वृषोत्सर्ग), चूड़ाकरण, उपनयन, नामकरण, अभिषेक अधिमास में नहीं करना चाहिए। हेमाद्रि  ने वर्जित एवं मान्य कृत्यों की लंबी सूची दी है।
सामान्य नियम यह है कि मलमास में नित्य कर्मों एवं नैमित्तिक कर्मों (कुछ विशिष्ट अवसरों पर किए जाने वाले कर्मों) को करते रहना ही चाहिए, यथा संध्या, पूजा, पंच महायज्ञ (ब्रह्मयज्ञ, वैश्वदेव आदि), अग्नि में हवि डालना (अग्निहोत्र के रूप में), ग्रहण-स्नान (यद्यपि यह नैमित्तिक है) और अन्त्येष्टि कर्म (नैमित्तिक)। यदि शास्त्र कहता है कि यह कृत्य (यथा सोम यज्ञ) नहीं करना चाहिए तो उसे अधिमास में स्थगित कर देना चाहिए।
यह भी सामान्य नियम है कि काम्य (नित्य नहीं, वह जिसे किसी फल की प्राप्ति के लिए किया जाता है) कर्म नहीं करना चाहिए। कुछ अपवाद भी हैं, यथा कुछ कर्म, जो अधिमास के पूर्व ही आरम्भ हो गए हों (यथा बारह दिनों वाला प्राजापत्य प्रायश्चित, एक मास वाला चंद्रायण व्रत), अधिमास तक भी चलाए जा सकते हैं।
   कुछ बातें मलमास के लिए ही व्यवस्थित हैं, यथा प्रतिदिन या कम से कम एक दिन ब्राह्मणों को 33 पूओं का दान करना चाहिए । कुछ ऐसे कर्म हैं, जो शुद्ध मासों में ही करणीय हैं, यथा वापी एवं तड़ाग (बावली एवं तलाब) खुदवाना, कूप बनवाना, यज्ञ कर्म, महादान एवं व्रत।
कुछ ऐसे कर्म हैं, जो अधिमास एवं शुद्ध मास, दोनों में किए जा सकते हैं, यथा गर्भ का कृत्य (पुंसवन जैसे संस्कार), ब्याज लेना, पारिश्रमिक देना, मास-श्राद्ध (अमावस्या पर), आह्निक दान, अन्त्येष्टि क्रिया, नव-श्राद्ध, मघा नक्षत्र की त्रयोदशी पर श्राद्ध, सोलह श्राद्ध, चान्द्र एवं सौर ग्रहणों पर स्नान, नित्य एवं नैमित्तिक कृत्य । जिस प्रकार हमारे यहां 13वें मास (मलमास) में धार्मिक कृत्य वर्जित हैं, पश्चिम देशों में 13वीं संख्या अभाग्यसूचक मानी जाती है, विशेषत: मेज पर 13 वस्तुओं की संख्या।
अधिक मास में क्या करें
इस माह में व्रत, दान, पूजा, हवन व ध्यान करने से पाप कर्म समाप्त हो जाते हैं और किए गए पुण्यों का फल कई गुना प्राप्त होता है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, मलमास में किए गए सभी शुभ कर्मो का अनंत गुना फल मिलता है। इस माह में भागवत कथा श्रवण की भी विशेष महत्ता है। पुरुषोत्तम मास में तीर्थ स्थलों पर स्नान का भी महत्त्व है। अधिक मास में पुरुषोत्तम-माहात्म्य का पाठ, पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण की उपासना, जप, व्रत, दानादि कृत्य करना चाहिए। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार, पुरुषोत्तम मास में गेहूं, चावल, मूंग, जौ, मटर, तिल, ककड़ी, बथुआ, कटहल, केला, घी, आम, जीरा, सोंठ, सुपारी, इमली, आंवला और सेंधा नमक आदि का सेवन करना चाहिए। परंतु ध्यान रहे कि पुरुषोत्तम मास में उड़द, राई, प्याज, लहसुन, गाजर, मूली, गोभी, दाल, शहद, तिल का तेल, दूषित अन्न व तामसिक भोजन का त्याग करना ही उचित है।
 दिन में मात्र एक बार भोजन तथा यथासंभव भूमि पर शयन करना चाहिए। पुरुषोत्तम मास में शास्त्रीय नियमों का पालन करते हुए, जो इसमें श्रद्धा-भक्ति के साथ व्रत, उपवास, पूजा आदि शुभ कर्म करता है, वह अपने कुल के साथ गोलोक में पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण का सान्निध्य प्राप्त करता है। इस प्रकार मलमास के रूप में निंदित इस मास को श्रीहरि ने अपना पुरुषोत्तम नाम देकर जगत के लिए पूजनीय बना दिया।
पुरुषोत्तम मास कैसे हुआ?
हमारे पंचांग में तिथि, वार, नक्षत्र एवं योग के अतिरिक्त सभी मास के कोई न कोई देवता या स्वामी हैं, परंतु मलमास या अधिक मास का कोई स्वामी नहीं होता। अत: इस माह में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य, शुभ एवं पितृ कार्य वर्जित माने गए हैं। अधिक मास स्वामी के न होने पर विष्णुलोक पहुंचे और भगवान श्रीहरि से अनुरोध किया कि सभी माह अपने स्वामियों के आधिपत्य में हैं और उनसे प्राप्त अधिकारों के कारण वे स्वतंत्र एवं निर्भय रहते हैं। एक मैं ही भाग्यहीन हूं, जिसका कोई स्वामी नहीं है। अत: हे प्रभु, मुझे इस पीड़ा से मुक्ति दिलाइए। अधिक मास की प्रार्थना को सुन कर श्रीहरि ने कहा हे मलमास, मेरे अंदर जितने भी सद्गुण हैं, वह मैं तुम्हें प्रदान कर रहा हूं और मेरा विख्यात नाम पुरुषोत्तम मैं तुम्हें दे रहा हूं और तुम्हारा मैं ही स्वामी हूं। तभी से मलमास का नाम पुरुषोत्तम मास हो गया और भगवान श्रीहरि की कृपा से ही इस मास में भगवान का कीर्तन, भजन, दान-पुण्य करने वाले मृत्यु के पश्चात श्रीहरि धाम को प्राप्त होते हैं।

अधिमास में विशेष पूजन विधि
पवित्र स्थान पर अक्षत से अष्ट दल बना कर जल का कलश स्थापित करना चाहिए। भगवान राधा-कृष्ण की प्रतिमा रख कर पोडरा विधि से पूजन करें और कथा श्रवण की जाए। संध्या के समय दीपदान करना चाहिए। माह के अंत में धातु के पात्र में तीस की संख्या में मिष्ठान्न रख कर दान किया जाए। पुरुषोत्तम मास में भक्त भांति-भांति का दान करके पुण्य फल प्राप्त करते हैं। मंदिरों में कथा-पुराण के आयोजन किए जाते हैं। दिवंगतों की आत्मा की शांति के लिए पूरे माह जल सेवा करने का संकल्प लिया जाता है। मिट्टी के कलश में जल भर कर दान किया जाता है। खरबूजा, आम, तरबूज सहित अन्य मौसमी फलों का दान करना चाहिए। माह में स्नान कर विधि पूर्वक पूजन-अर्चन कथा श्रवण करना चाहिए।
पुरुषोत्तम मास में नियम-संयम के साथ भगवान की भक्ति-भाव से सविधि अर्चना करने से वे अतिशीघ्र प्रसन्न होते हैं। पुरुषोत्तम मास का आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत अधिक महत्व है। इसमें धर्माचरण करते हुए निष्काम भाव से भगवान की पूजा-सेवा, कथा-श्रवण, संत-सत्संग और दीप-दान आदि पवित्र कर्म करने से जीव भगवत्कृपा का पात्र बन जाता है। इस मास में इस मंत्र का प्रतिदिन जप करना उचित रहेगा-
गोवर्धनधरम् वन्दे गोपालम् गोपरूपिणम्।
गोकुलोत्सव मीशानम् गोविंदम् गोपिका प्रियम्॥
मंत्र जपते समय भगवती श्री राधिका सहित द्विभुज मुरलीधर पीत वस्त्रधारी भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करना चाहिए। पुरुषोत्तम मास में तुलसी-पत्र से शालिग्राम की पूजा तथा श्रीमद्भ भागवत महापुराण का पाठ करने से अनंत पुण्य प्राप्त होता है। अवंतिका (उज्जयिनी) में श्रद्धालु पुराणोक्त सप्त सागरों में स्नान करके दान-पुण्य करते हैं। पुरुषोत्तम मास का सदुपयोग आध्यात्मिक उन्नति के लिए करें। इस कृत्य से नर नारायण बन सकता है।

Thursday, August 9, 2012

मुदा करात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं
कलाधरावतम्सकं विलासिलोकरक्षकम्।
अनायकैक नायकं विनाशितेभदैत्यकं
नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥१॥

नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरं
नमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्वरम्।
सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं
महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम्॥२॥

समस्तलोकशङ्करं निरस्तदैत्यकुञ्जरं
दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम्।
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं
मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम्॥३॥

अकिञ्चनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्ति भाजनं
पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम्।
प्रपञ्चनाशभीषणं धनञ्जयादि भूषणं
कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम्॥४॥

नितान्तकान्त दन्तकान्ति मन्तकान्तकात्मजं
अचिन्त्यरूप मन्तहीन मन्तराय कृन्तनम्।
हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां
तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम्॥५॥

महागणेश पञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं
प्रजल्पति प्रभातके हृदिस्मरन्गणेश्वरम्।
अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां
समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात्॥

देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रं

देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रं

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदापि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदापि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदापि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ १ ॥

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ २ ॥

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायते क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ३॥

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ४ ॥

परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५ ॥

श्र्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनःको जानीते जनानि जपनीयं जपविधौ ॥ ६ ॥

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ ७ ॥

न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥ ८ ॥

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥ ९ ॥

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥ १० ॥

जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परावृत्तं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥ ११ ॥

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु ॥ १२ ॥


॥ इति श्रीशंकराचार्यविरचितं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥