Thursday, August 11, 2011

सबसे ऊँचा शिव मंदिर ( बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का विश्वनाथ मंदिर)

सबसे ऊँचा शिव मंदिर ( बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का विश्वनाथ मंदिर)

भारत का सबसे ऊँचा (करीब 252 फुट) शिव मंदिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के मध्य में स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर है। मंदिर का शिखर दक्षिण भारत के तंजावुर स्थित वृहदेश्वर मंदिर की ऊँचाई से ज्यादा है। इसमें मुख्य शिखर के अलावा दो अन्य शिखर भी हैं। मंदिर की अंदर की दीवारों पर श्रीमद्भगवतगीता के श्लोक अंकित हैं।

इसके अलावा दीवारों पर संतों के अनमोल वचन भी संगमरमर पर उकेरे गए हैं। मंदिर के दोनों तरफ खूबसूरत मूर्तियाँ बनी हैं। मंदिर तथा आस-पास का परिसर इतना सुंदर है कि फिल्म बनाने वाले भी यहाँ आकर्षित होते हैं। हरे-भरे आमों के पेड़ मंदिर की शोभा में चार चाँद लगाते हैं। कई फिल्मों की यहाँ पर शूटिंग भी हो चुकी है। मंदिर की साफ-सफाई इतनी अच्छी है कि कहीं पर एक तिनका नजर नहीं आता। इस मंदिर को अगर हिंदू विश्वविद्यालय का आध्यात्मिक केंद्र कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

यहाँ बाबा भोलेनाथ की आरती में इलेक्ट्रॉनिक घंटा-घड़ियाल लयबद्ध ताल में गूँजते हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय की कल्पना की परिणति है यह भव्य और अलौकिक सौंदर्य से भरा मंदिर। मंदिर के चढ़ावे से विश्वविद्यालय के 22 छात्रों को 'अन्न सुख' भी मिलता है।

मदनमोहन मालवीय की मंशा के अनुरूप इसे आकार देने का श्रेय उद्योगपति युगल किशोर बिरला को जाता है। मंदिर का शिलान्यास 11 मार्च 1931 को हुआ और 17 फरवरी 1958 को महाशिवरात्रि पर मंदिर के गर्भगृह में भगवान विश्वनाथ प्रतिष्ठित हुए। जीवन के अंतिम समय में बिस्तर पर पड़े मदनमोहन मालवीय की आँखें नम देख जाने-माने उद्योगपति युगल किशोर बिरला ने मंदिर के बारे में पूछा तो वे मौन रहे।

मदनमोहन मालवीय को मौन देख बिरला बोले, आप मंदिर के बारे में चिंता न करें, मैं वचन देता हूँ कि पूरी तत्परता के साथ मंदिर के निर्माण कार्य में लगूँगा। तब मदनमोहन मालवीय निश्चिंत हुए और कुछ दिन बाद ही उनका देहाँत हो गया। मंदिर की अन्नदान योजना के तहत अभी 22 छात्रों और कुलपति के विवेकाधीन कोष से 16 छात्रों को भोजन कराया जाता है। मंदिर के कोष से इसका रख-रखाव होता है। विश्वविद्यालय की ओर से यहाँ छह पुजारी, तीन चौकीदार, दो गायक, एक तबला वादक, एक अधिकारी समेत अन्य कर्मचारी मंदिर की देखरेख एवं सेवा में तैनात हैं।

वैसे तो मंदिर में बाबा का दर्शन करने वाले हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन आते हैं लेकिन सावन के महीने में भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। मंदिर में लगी देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियों का दर्शन कर लोग जहाँ अपने को कृतार्थ करते हैं वहीं मंदिर के आस-पास आम कुंजों की हरियाली एवं मोरों की 'पीकों' की आवाज से भक्त भावविभोर हो जाते हैं।

पूरे सावन माह और माह के प्रत्येक सोमवार को देश-विदेश से श्रद्धालु यहाँ भक्तिभाव से जुटते हैं। मंदिर के मानद व्यवस्थापक ज्योतिषाचार्य पंडित चंद्रमौलि उपाध्याय के अनुसार इस भव्य मंदिर के शिखर की सर्वोच्चता के साथ ही यहाँ का आध्यात्मिक, धार्मिक, पर्यावरणीय माहौल दुनिया भर के आस्थावान श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। खासकर युवा पीढ़ी के लिए यह मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र बन चुका है, जहाँ उनके जीवन में सात्विक मूल्यों का बीजारोपण होता है।

श्री शिव चालीसा...

श्री शिव चालीसा
दोहा :
अज अनादि अविगत अलख अकल अकुल अविकार वंदे शिव पद युग कमल अमल अतीव उदार ॥
आर्ति हरण सुख करण शुभ भक्ति मुक्ति दातार करो अनुग्रह दान लखि अपनो बिरद विचार पड्यो पतित भवकूप महं सहजनकर आगार ॥
सहज सुहृद पावन पतति सहजहिलेहु बार पलक पलक आशाभरियो रह्योसु बट निहार हरो तुरंत स्वभाव वश नेक् न करो अबार ॥

चरणं :
जय शिव शंकर औघर दानि जय गिरि तनय मात् भवानि ॥१॥
सर्वोत्तम योगि योगेश्वर सर्वलोक ईश्वर परमेश्वर ॥२॥
सबवुरप्रेरक सर्वनियंता उपद्रष्ट भर्ता अनुमंता ॥ ३॥
पराशक्ति पति अखिल विश्वपति परब्रह्म परंधाम परमगति ॥ ४॥
सर्वातीत अनन्य सर्वगत निज स्वरूप महमामें स्थितरत ॥ ५॥
अंगभूति भूषित स्मशान चर भुजंग भूषण चंद्रमकुट धर ॥ ६॥
वृषवाहन नंदीगण नायक अखिल विश्वके भाग्य विधायक ॥७॥
व्याघ्र चर्म परिधान मनोहर रीच चर्म ओढे गिरिजावर ॥८॥
कर त्रिशूल ढमरू कर राजत अभय वरद मुदा शुभ साजत ॥९॥
तनु कर्पूर गौर उज्वलतम पिंगल जटा जूट शिरवुत्तम ॥१०॥
फाल त्रिपुंड्र मुंड मालाधर गल रुद्राक्ष माल शोभाकर ॥११॥
विधि हरि रुद्र त्रिविध वपुधारि जने सुजन पालन लयकारि ॥१२॥
तुम हो नित्य दयाके सागर आशु तोष आनंद वुजागर ॥१३॥
अति दयालु भोले भंडारि अगजग सबके मंगलकारि ॥१४॥
सती पार्वतीके प्राणेश्वर स्कंद गणेश जनक शिव सुखकर ॥१५॥
हर हर एक रूप गुणशीला कर त स्वामि सेवक् की लीला ॥१६॥
रहते दोवु पूजक वालीत पूजा पद्धति सभन्नि शिखावत ॥१७॥

मारुति बन हरि सेवा कीन्हिं रामेश्वर बन सेवा लीन्हिं ॥१८॥
जगहित घोर हालाहल पीकर बनेसदाशिव नीलकंठ वर ॥१९॥
अमरासुर शुचिवरद शुभंकर अमर निहंत प्रभु प्रलयंकर ॥२०॥
नमश्शिवाय मंत्र पंचाक्षर जपत मिटत सब क्लेश भयंकर ॥२१॥
जो नरनारी रटते शिव शिव नित तिन को शिव अति करत परमहित ॥२२॥
श्रीकृष्ण तप कोन्हूं भारी ह्वै प्रसन्न वर दियो पुरारि ॥२३॥
अर्जुन संगलडे किरात बन दियो पाशुपत अस्त्र मुदित मन ॥२४॥
भक्तन के सब कष्ट निवारे निज भक्त सबन्हि उद्धारे ॥२५॥
शंख चूड जालंधर मारे दैत्य असंख्य प्राण हर तारे ॥२६॥
अंधकको गणपति पद दीन्हों शुक्र शुक्र पथ बाहुर कीन्हों ॥२७॥
तेहि संजीवनि विद्या दीन्हिं बाणासुर गणपति गति कीन्हिं ॥२८॥
अष्टमूर्ति पंचानन चिन्मय द्वादश ज्योतिर्लिंग ज्योतिर्मय ॥२९॥
भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा अकथ अचिंत्य असीम अनुपा ॥३०॥
काशी मरत जंतु अवलोकी देत मुक्ति पद करत अशोकी ॥३१॥
भक्त भगीरथ की रुचि राखी जटा बसी गंगा सुर साखी ॥३२॥
रुरु अगस्त्य उपमन्यू ज्ञानी ऋषि दधीच अधिक विज्ञानी ॥३३॥
शिव रहस्य शिप ज्ञान प्रचारक शिवहि परमप्रिय लोकोद्धारक ॥३४॥
इनके शुभ सुमरनते शंकर देत मुदित ह्वै अति दुर्लभ वर ॥३५॥
अति उदार करुणा वरुणालय हरण दैन्य दारिद्य्र दु:ख भय ॥३६॥
तुम्हरो भजन परम हितकारी विप्र शूद्र सबही अधिकारी ॥३७॥
बालक वृद्ध नारी नर ध्यावहिं ते अलभ्य शिव पदको पावहिं ॥३८॥
भेद शून्य तुम सबके स्वामी सहज सुहृद सेवक अनुगामी ॥३९॥
जो जन शरण तुम्हारी आवत सकल दुरित तत्काल नशावत ||40||

रावण कृत शिव ज़ी की स्तुति ....

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले,गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।
डमड्डमड्ड्मड्ड्मन्निनादवड्ड्मर्वयं,चकार चण्डताण्डवं तनोतु न: शिव:शिवम्॥ (1)

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी, विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्ध्दनि।
धगध्दगध्दगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके, किशोरचन्द्रशेखरे रति: प्रतिक्षणं मम॥ (2)

धराधरेन्द्ननन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर, स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुध्ददुर्धरापदि, क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥ (3)

जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा, कदम्बकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे, मनोविनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥ (4)

सहस्त्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर, प्रसूनधुलिधोरणीविधुसराङध्रिपीठभू:।
भुजंगराजमा्लया निबध्दजाटजूटक:, श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखर:॥ (5)

ललाटचत्वरज्वलध्दनञ्ज्यस्फुलिंगभा, निपीतपंचसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयुखलेखया विराजमान शेखरं, महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु न:॥ (6)

करालभाल्पट्टिकाधगध्दगध्दगज्ज्वल, ध्दनञ्ज्याहुतीकृतप्रचण्डपंचसायके।
धराधरेन्द्ननन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक, प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥ (7)

नवीनमेघमण्डलीनिरुध्ददुर्धरस्फुर, त्कुहुनिशीथिनीतम: प्रबन्धबध्दकन्धर:।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुर:, कलानिधानबन्धुर: श्रियं जगदधुरन्धर:॥ (8)

प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा, वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबध्दकन्धरम्।
स्मरच्छिदंपुरच्छिदं भवच्छिदंमखच्छिदं, गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥ (9)

अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमञ्जरी, रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकंपुरान्तकं भवान्तकंमखान्तकं, गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥ (10)

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमभ्दुजंगमश्र्व्स,द्विनिर्गमत्क्र
मस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिध्दिमिध्दिमिद्ध्वनन्मृदंगतुन्गमंगल,ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्ड्ताण्डव: शिव:॥ (11)

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकस्रजो, र्गरिष्ठरत्नलोष्ठ्यो: सुहृद्विपक्षपक्षयो:।
तृणारविन्दचक्षुषो: प्रजामहीमहेन्द्रयो:, समप्रवृत्तिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥ (12)

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे वसन्, विमुक्तदुर्मति: सदा शिर:स्थमञ्जलिं वहन्।
विलोललोचनो ललामभाललग्नक:, शिवेति मन्त्रामुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥ (13)

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं, पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुध्दिमेति सन्त्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु यातिनान्यथा गतिं, विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम्॥ (14)

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं, य: शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां, लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भु:॥ (15)

रूद्राष्ट्क-----

रूद्राष्ट्क

परम शिव भक्त कागभुशुण्डि ने जब अपने गुरू की अवहेलना की तो वे शिव के क्रोध-भाजन हुए। अपने शिष्य के लिए क्षमादान की अपेक्षा रखने वाले सहृदय गुरू ने रूद्राष्टक की रचना की तथा महादेव को प्रसन्न किया। सम्पुर्ण कथा रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में वर्णित है।

नमामी शमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं, ब्रह्म वेदस्वरूपम् ।
निजं, निर्गुणं, निर्विकल्पं, निरीहं, चिदाकाशं आकाशवासं भजेहं ।।

हे मोक्ष रूप (आप जो) सर्व व्यापक हैं, ब्रह्म और वेद् स्वरूप हैं, माया, गुण, भेद, इक्षा से रहित हैं, चेतन, आकाश रूप एवं आकाश को ही वस्त्ररूप को धारण करने वाले हैं, आपको प्रणाम करता हूँ।

निराकारं ॐकार मुलं तुरीयं, गिरा ज्ञान गोती-तमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकाल कालं कृपालं, गुणागार संसार-पारं नतो अहम ।।

हे निराकार आप जो कि ॐ कार के भी मूल हैं, तथा तीनों गुणों (सद-रज-तमस) से पृथक हैं, वाणी-ज्ञान-इंद्रियों से परे हैं, महाकाल के भी काल हैं, मैं ऐसे कृपालु, गुणों के भंडार, एवं सृष्टि से परे आप परम देव को नमस्कार करता हूँ।

तुषाराद्रि-संकाश-गौरं गंभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद भाल बालेन्दू कण्ठे-भुजंगा॥

हे शिव, आप हिमालय पर्वत के समक्ष गौर वर्ण वाले तथा गंभीर चित वाले हैं तथा आपके शरीर की कांति करोडों कामदेवों की ज्योति के सामान है। आपके शिश पर गंगाजी, ललाट पर दूज का चन्द्रमा तथा गले में सर्प माल शोभायमान है।

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीश-चर्माबरं मुण्डमालं, प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥

कानों में झिलमिलाते कुण्ड्ल से सोभायमान तथा विशाल नेत्रों एवं सुन्दर भौंहें वाले, हे नीलकंठ, हे सदा प्रसन्नचित रहने वाले परम दयालु, मृगचर्म एवं मुण्डमाल धारण करने वाले, सबके प्रिय और स्वामी, हे शंकर! मैं आपको भजता हूँ।

प्रचण्डं, प्रकृष्टं, प्रगल्भं, परेशं, अखंडं अजं भानुकोटि-प्रकाशम्।
त्रय:शूल निर्मूलनं शूलपाणिं, भजे अहं भवानीपतिं भाव गम्यम्॥

आप प्रचण्ड रूद्रस्वरूप, उत्तम, तेजवान, परमेश्वर, अखंड, जन्मरहित, करोडों सूर्यों के सामान प्रकाशमान, तीनों प्रकार के दुःखो को हरने वाले, हाथों मे शूल धारण करने वाले, एवं भक्ति द्वारा प्राप्त होने वाले हैं। हे माँ भवानी के स्वामि, मैं आपको भजता हूँ।

कलातीत-कल्याण-कल्पांतकारी, सदा सज्जनानन्द दातापुरारी।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद-प्रसीद प्रभो मन्माथारी॥

आप (सोलह) कलाओं से पृथक, कल्यानकारी, कल्पचक्र के नियन्ता, सज्जनों को आनन्द प्रदान करने वाले, सत, चित, आनन्द स्वरूप त्रिपुरारी हैं। हे प्रभु! आप मुझ पर प्रसन्न होएं। प्रसन्न होएं।

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजंतीह लोके परे वा नाराणम्।
न तावत्सुखं शांति संताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वभुताधिवासम् ॥

जबतक उमापति के चरणरूप कमलों को प्राणी नहीं भजते, या उनका ध्यान नहीं करते तबतक उन्हे इस लोक या परमलोक में सुख-शांति नहीं मिलती। हे सभी प्राणियों में वास करने वाले, प्रभु, आप प्रसन्न हों।

न जानामि योगं जपं नैव पूजाम्, नतोहं सदा सर्वदा शम्भु ! तुभ्यम।
जरा जन्म दु:खौद्य तातप्यमानं, प्रभो ! पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥

हे शम्भुं! मैं पुजा-जप-तप-योग आदि कुछ भी नहीं जानता; मैं सदैव आपको प्रणाम करता हूँ। जन्म,अवस्था रोग आदि दुःखों से पीडित मुझ दीन की आप रक्षा करें! हे प्रभु मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

रूद्राष्टक इदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये,
ये पठंति नरा भक्त्या तेषां शम्भु प्रसीदति ॥

ब्राह्मण द्वारा कहा गया हे रूद्राष्टक भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए है। जो व्यक्ति श्रद्धा भक्ति से इसका पाठ करते हैं, उनपर शिव सदैव प्रसन्न रहते हैं।

वेदसार शिवस्तव:

वेदसार शिवस्तव:
आदिगुरू श्री शंकराचार्य द्वारा रचित यह शिवस्तव वेद वर्णित शिव की स्तुति प्रस्तुत करता है। शिव के रचयिता, पालनकर्ता एव विलयकर्ता विश्वरूप का वर्णन करता यह स्तुति संकलन करने योग्य है।

पशूनां पतिं पापनाशं परेशं
गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं
महादेवमेकं स्मरामि

(हे शिव आप) जो प्राणिमात्र के स्वामी एवं रक्षक हैं, पाप का नाश करने वाले परमेश्वर हैं, गजराज का चर्म धारण करने वाले हैं, श्रेष्ठ एवं वरण करने योग्य हैं, जिनकी जटाजूट में गंगा जी खेलती हैं, उन एक मात्र महादेव को बारम्बार स्मरण करता हूँ|

महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं
विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं
सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्

हे महेश्वर, सुरेश्वर, देवों (के भी) दु:खों का नाश करने वाले विभुं विश्वनाथ (आप) विभुति धारण करने वाले हैं, सूर्य, चन्द्र एवं अग्नि आपके तीन नेत्र के सामान हैं। ऎसे सदा आनन्द प्रदान करने वाले पञ्चमुख वाले महादेव मैं आपकी स्तुति करता हूँ।

गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं
गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं
भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्

(हे शिव आप) जो कैलाशपति हैं, गणों के स्वामी, नीलकंठ हैं, (धर्म स्वरूप वृष) बैल की सवारी करते हैं, अनगिनत गुण वाले हैं, संसार के आदि कारण हैं, प्रकाश पुञ सदृश्य हैं, भस्मअलंकृत हैं, जो भवानिपति हैं, उन पञ्चमुख (प्रभु) को मैं भजता हूँ।

शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले
महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूपः
प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप

हे शिवा (पार्वति) पति, शम्भु! हे चन्द्रशेखर! हे महादेव! आप त्रीशूल एवं जटाजूट धारण करने वाले हैं। हे विश्वरूप! सिर्फ आप ही स्मपुर्ण जगद में व्याप्त हैं। हे पूर्णरूप आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।

परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं
निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं
तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्

हे एकमात्र परमात्मा! जगत के आदिकारण! आप इक्षारहित, निराकार एवं ॐकार स्वरूप वाले हैं। आपको सिर्फ प्रण (ध्यान) द्वारा ही जान जा सकता है। आपके द्वारा ही सम्पुर्ण सृष्टी की उतपत्ति होती है, आपही उसका पालन करते हैं तथा अंतत: उसका आप में ही लय हो जाता है। हे प्रभू मैं आपको भजता हूँ।

न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायु-
र्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा
न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो
न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे

जो न भुमि हैं, न जल, न अग्नि, न वायु और न ही आकाश, - अर्थात आप पंचतत्वों से परे हैं। आप तन्द्रा, निद्रा, गृष्म एवं शीत से भी अलिप्त हैं। आप देश एव वेश की सीमा से भी परे हैं। हे निराकार त्रिमुर्ति मैं आपकी स्तुति करता हूँ।

अजं शाश्वतं कारणं कारणानां
शिवं केवलं भासकं भासकानाम्
तुरीयं तमःपारमाद्यन्तहीनं
प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम्

हे अजन्मे (अनादि), आप शाश्वत हैं, नित्य हैं, कारणों के भी कारण हैं। हे कल्यानमुर्ति (शिव) आप ही एक मात्र प्रकाशकों को भी प्रकाश प्रदान करने वाले हैं। आप तीनो अवस्ताओं से परे हैं। हे आनादि, अनंत आप जो कि अज्ञान से परे हैं, आपके उस परम् पावन अद्वैत स्वरूप को नमस्कार है।

नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते
नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य
नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥

हे विभो, हे विश्वमूर्ते आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे सबको आनन्द प्रदान करने वाले सदानन्द आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे तपोयोग ज्ञान द्वारा प्राप्त्य आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे वेदज्ञान द्वारा प्राप्त्य (प्रभु) आपको नमस्कार है, नमस्कार है।

प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ
महादेव शंभो महेश त्रिनेत्र
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे
त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः

हे त्रिशूलधारी ! हे विभो विश्वनाथ ! हे महादेव ! हे शंभो ! हे महेश ! हे त्रिनेत्र ! हे पार्वतिवल्लभ ! हे शान्त ! हे स्मरणिय ! हे त्रिपुरारे ! आपके समक्ष न कोई श्रेष्ठ है, न वरण करने योग्य है, न मान्य है और न गणनीय ही है।

शंभो महेश करुणामय शूलपाणे
गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्
काशीपते करुणया जगदेतदेक-
स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि

हे शम्भो! हे महेश ! हे करूणामय ! हे शूलपाणे ! हे गौरीपति! हे पशुपति ! हे काशीपति ! आप ही सभी प्रकार के पशुपाश (मोह माया) का नाश करने वाले हैं। हे करूणामय आप ही इस जगत के उत्तपत्ति, पालन एवं संहार के कारण हैं। आप ही इसके एकमात्र स्वामि हैं।

त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे
त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश
लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन्

हे चराचर विश्वरूप प्रभु, आपके लिंगस्वरूप से ही सम्पुर्ण जगत अपने अस्तित्व में आता है (उसकी उत्तपत्ती होती है), हे शंकर ! हे विश्वनाथ अस्तित्व में आने के उपरांत यह जगत आप में ही स्थित रहता है – अर्थात आप ही इसका पालन करते हैं। अंतत: यह सम्पुर्ण श्रृष्टी आप में ही लय हो जाती है।

शिवमानसपूजा ....


शिवमानसपूजा

आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रचित शिव मानस पूजा शिव की एक अनुठी स्तुति है। यह स्तुति शिव भक्ति मार्ग के अतयंत सरल पर साथ ही एक अतयन्त गुढ रहस्य को समझाता है। शिव सिर्फ भक्ति द्वारा प्रापत्य हैं, आडम्बर ह्की कोई आवश्यकता नहीं है। इस स्तुति में हम प्रभू को भक्ति द्वारा मानसिक रूप से तैयार की हुई वस्तुएं समर्पित करते हैं। हम उन्हे रत्न जडित सिहांसन पर आसिन करते हैं, वस्त्र, भोज तथा भक्ति अर्पण करते हैं; पर ये सभी हम भोतिक स्वरूप में अपितु मानसिक रूप में करते हैं। इस प्रकार हम स्वयं को शिव को शिव को समर्पित कर शिव स्वरूप में विलिन हो जाते हैं।

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम्
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥१..

हे दयानिधे, हे पशुपते, मैंने आपके लिए एक रत्नजड़ित सिहांसन की कल्पना की है, स्नान के लिए हिमालय सम शीतल जल, नाना प्रकार के रत्न जड़ित दिव्य वस्त्र, तथा कस्तुरि, चन्दन, विल्व पत्र एवं जुही, चम्पा इत्यादि पुष्पांजलि तथा धूप-दीप ये सभी मानसिक पूजा उपहार ग्रहण करें।

सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् .
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ..२..

हे महादेव, मैंने अपने मन में नवीन रत्नखण्डों से जड़ित स्वर्ण पात्रों में धृतयूक्त खीर, दुध एवं दही युक्त पाँच प्रकार के व्यंजन, रम्भा फल एवं शुद्ध मीठा जल ताम्बुल और कर्पूर से सुगन्धित धुप आपके लिए प्रस्तुत किया है। हे प्रभू मेरी इस भक्ति को स्वीकार करें।

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलम्
वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा .
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ..३..

हे प्रभो! मैंने सकंल्प द्वारा आपके लिए एक छ्त्र, दो चंवर, पंखा एव निर्मल दर्पन की कल्पना की है। आपको साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए, तथा विणा, भेरि एवं मृदङ्ग के साथ गीत, नृत्य एव बहुदा प्रकार की स्तुति प्रस्तुत करता हूँ। हे प्रभो! मेरी इस पूजा को ग्रहण करें।

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः .
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् .. ४..

हे शम्भों ! आप मेरी आत्मा हैं, माँ भवानी मेरी बुद्धी हैं, मेरी इन्द्रियाँ आपके गण हैं एवं मेरा शरीर आपका गृह है। सम्पुर्ण विषय-भोग की रचना आपकी ही पूजा है। मेरे निद्रा की स्थिति समाधि स्थिति है, मेरा चलना आपकी ही परिक्रमा है, मेरे शब्द आपके ही स्तोत्र हैं। वास्त्व में मैं जो भी करता हूँ वह सब आपकी आराधना ही है।

करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा .
श्रवणनयनजं वा मानसंवापराधम् .
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व .
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेवशम्भो .. ५..

हे प्रभो! मेरे हाथ या पैर द्वारा, कर्म द्वारा, वाक्य या स्रवण द्वारा या मन द्वारा हुए समस्त विहित अथवा अविहित अपराधों को क्षमा करें। हे करूणा मय महादेव सम्भों आपकी सदा जय हो।

.. इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता शिवमानसपूजा समाप्ता..

Wednesday, August 3, 2011

नागपंचमी (Nag Panchami – Thursday, 4 August 2011)

नागपंचमी (Nag Panchami – Thursday, 4 August 2011)

श्रावणमासके शुक्लपक्षकी पंचमी तिथिको नागपंचमी (Nag Panchami – Thursday, 4 August 2011) का त्योहार नागोंको समर्पित है। इस त्योहारपर व्रतपूर्वक नागोंका अर्चन-पूजन होता है। वेद और पुराणोंमें नागोंका उद्गम महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रूसे माना गया है। नागोंका मूलस्थान पाताललोक प्रसिद्ध है।

पुराणोंमें ही नागलोककी राजधानीके रुपमें भोगवतीपुरी विख्यात है। भगवान्‌ विष्णुकी शय्याकी शोभा नागराज शेष बढ़ाते हैं। भगवान्‌ शिव और गणेशजीके अलंकरणमें भी नागोंकी मह्त्त्वपूर्ण भूमिका है। पुराणोंमें भगवान्‌ सूर्यके रथमें द्वादश नागों का उल्लेख मिलता है, जो क्रमश: प्रत्येक मासमें उनके रथ के वाहक बनते हैं। नागदेवता भारतीय संस्कृतिमें देवरुपमें स्वीकार किये गये हैं।

देवी भागवतमें प्रमुख नागोंका नित्य स्मरण किया गया है। हमारे ऋषि-मुनियोंनें नागोपासनामें अनेक व्रत-पूजनका विधान किया है। श्रावणमासके शुक्ल पक्षकी पंचमी नागोंको अत्यन्त आनन्द देनेवाली है -‘नागानामानन्दकरी’ पंचमी तिथिको नागपूजामें उनको गो-दुग्धसे स्नान करानेका विधान है। कहा जाता है कि एक बार मातृ-शापसे नागलोक जलने लगा । इस दाहपीडाकी निवृत्तिके लिये (नागपंचमीको) गो-दुग्धस्नान जहाँ नागोंको शीतलता प्रदान करता है, वहाँ भक्तोंको सर्पभय से मुक्ति भी देता है।

ब्रह्माजीने पंचमी तिथिको नागोंको पाण्डववंशके राजा जनमेजय द्वारा किये जानेवाले नागयज्ञसे यायावरवंशमें उत्त्पन्न तपस्वी जरत्कारु के पुत्र आस्तीक द्वारा रक्षाका वरदान दिया था। तथा इसी तिथिपर आस्तीकमुनिने नागोंका परिरक्षण किया था । अत: नागपंचमीका यह पर्व ऎतिहासिक तथा सांस्कृतिक दृष्टिसे महत्त्वपूर्ण है ।

श्रावनमासके शुक्लपक्षकी पंचमीको नागपूजाका विधान है। व्रतके साथ एक बार भोजन करने का नियम है। पूजामें पृथ्वीपर नागोंका चित्राड्कन किया जाता है। स्वर्ण, रजत, काष्ठ या मृत्तिकासे नाग बनाकर पुष्प, गुन्ध, धूप-दीप एवं विविध नैवेधोंसे नागोंका पूजन होता है।

निज गृहके द्वारमें दोनों ओर गोबरके सर्प बनाकर उनका दधि, दूर्वा, कुशा, गन्ध, अक्षत, पुष्प, मोदक और मालपुआ आदिसे पूजा करने और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर एकभुक्त व्रत करनेसे घरमें सर्पोंका भय नहीं होता है।