Monday, April 30, 2012
|| श्री हनुमत् स्तवन ||
|| श्री हनुमत् स्तवन ||
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन।
जासु ह्रदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥१॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं।
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्॥२॥
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं।
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥३॥
गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम्।
रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम्॥४॥
अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्।
कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्॥५॥
महाव्याकरणाम्भोधिमन्थमानसमन्दरम्।
कवयन्तं रामकीर्त्या हनुमन्तमुपास्महे॥६॥
उल्लङ्घ्य सिन्धोः सलिलं सलीलं यः शोकवह्निं जनकात्मजायाः।
आदाय तेनैव ददाह लङ्कां नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम्॥७॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥८॥
आञ्जनेयमतिपाटलाननं काञ्चनाद्रिकमनीयविग्रहम्।
पारिजाततरुमूलवासिनं भावयामि पवमाननन्दनम्॥९॥
यत्र-यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र-तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्।
बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम्॥१०॥
परशुरामकृतं कालीस्तोत्रम्
परशुरामकृतं कालीस्तोत्रम्
परशुराम उवाच
नम: शंकरकान्तायै सारायै ते नमो नमः।
नमो दुर्गतिनाशिन्यै मायायै ते नमो नमः॥
नमो नमो जगद्धायै जगत्कर्यै नमो नमः।
नमोऽस्तु ते जगन्मात्रे कारणायै नमो नमः॥
प्रसीद जगतां मात: सृष्टिसंहारकारिणि।
त्वत्पादे शरणं यामि प्रतिज्ञां सार्थिकां कुरु॥
त्वयि मे विमुखायां च को मां रक्षितुमीश्वरः।
त्वं प्रसन्ना भव शुभे मां भक्तं भक्तवत्सले॥
युष्माभि: शिवलोके च मह्यं दत्तो वर: पुरा।
तं वरं सफलं कर्तु त्वमर्हसि वरानने॥
जामदग्न्यस्तवं श्रुत्वा प्रसन्नाभवदम्बिका।
मा भैरित्येवमुक्त्वा तु तत्रैवान्तरधीयत॥
एतद् भृगुकृतं स्तोत्रं भक्तियुक्तश्च य: पठेत्।
महाभयात् समुत्तीर्ण: स भवेदवलीलया॥
स पूजितश्च त्रैलोक्ये त्रैलोक्यविजयी भवेत्।
ज्ञानिश्रेष्ठो भवेच्चैव वैरिपक्षविमर्दकः॥
Friday, April 6, 2012
हनुमान प्रार्थना
धीर-वीर, रक्षक प्रबल, बलशाली-हनुमान।
जिनके हृदय-अलिन्द में, रचे-बसे श्रीराम।।
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महासिन्धु को लाँघकर, नष्ट किये वन-बाग।
असुरों को आहत किया, लंका मे दी आग।।
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कभी न टाला राम का, जिसने था आदेश।
सीता माता को दिया, रघुवर का सन्देश।।
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लछमन को शक्ति लगी, शोकाकुल थे राम।
पवन वेग की चाल से, पहुँचे पर्वत धाम।।
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संजीवन के शैल को, उठा लिया तत्काल।
बूटी खा जीवित हुए, दशरथ जी के लाल।।
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बिगड़े काम बनाइए, बनकर कृपा निधान।
कोटि-कोटि वन्दन तुम्हे, पवनपुत्र हनुमान।।
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जिनके हृदय-अलिन्द में, रचे-बसे श्रीराम।।
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महासिन्धु को लाँघकर, नष्ट किये वन-बाग।
असुरों को आहत किया, लंका मे दी आग।।
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कभी न टाला राम का, जिसने था आदेश।
सीता माता को दिया, रघुवर का सन्देश।।
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लछमन को शक्ति लगी, शोकाकुल थे राम।
पवन वेग की चाल से, पहुँचे पर्वत धाम।।
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संजीवन के शैल को, उठा लिया तत्काल।
बूटी खा जीवित हुए, दशरथ जी के लाल।।
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बिगड़े काम बनाइए, बनकर कृपा निधान।
कोटि-कोटि वन्दन तुम्हे, पवनपुत्र हनुमान।।
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हनुमान प्रार्थना
हनुमान प्रार्थना
जय रघुकुल-मणि के प्रिय सेवक,
जय गौरीपति के अवतार I
जय लक्ष्मण के परिरक्षक,
जय सीताजी के खोजनहार II
जय निशिचर-गण के विध्वंशक,
भक्त-जनों के परित्राता I
कायरता कलि कलेश निवारक,
महा-बुद्धि, बल के दाता II
भाग्य - विधाता हो दुखियो के,
करुणा के तुम हो आगार I
जय लक्ष्मण के परिरक्षक,
जय सीताजी के खोजनहार II
देव ! तेरी पावन पूजा से,
भक्त - जनों की व्यथा टली I
जय हम दुखियों के इष्ट देव,
जय महावीर बजरंज बली II
मन की कली खिला दो, प्रभु जी !
जन - जन का हो बेड़ा पार I
जय लक्ष्मण के परिरक्षक,
जय सीताजी के खोजनहार II
ऐसी कृपा करो, प्रभु ! मुझ पर,
निशि - वासर मै तुमको ध्याऊँ I
प्रभु चरणों का लिये आसरा,
सकल कामना बिसराऊ II
भक्त गण गाएं युगों - युगों तक,
तेरी महिमा अपरम्पार I
जय लक्ष्मण के परिरक्षक,
जय सीताजी के खोजनहार II
जय रघुकुल-मणि के प्रिय सेवक,
जय गौरीपति के अवतार I
जय लक्ष्मण के परिरक्षक,
जय सीताजी के खोजनहार II
जय निशिचर-गण के विध्वंशक,
भक्त-जनों के परित्राता I
कायरता कलि कलेश निवारक,
महा-बुद्धि, बल के दाता II
भाग्य - विधाता हो दुखियो के,
करुणा के तुम हो आगार I
जय लक्ष्मण के परिरक्षक,
जय सीताजी के खोजनहार II
देव ! तेरी पावन पूजा से,
भक्त - जनों की व्यथा टली I
जय हम दुखियों के इष्ट देव,
जय महावीर बजरंज बली II
मन की कली खिला दो, प्रभु जी !
जन - जन का हो बेड़ा पार I
जय लक्ष्मण के परिरक्षक,
जय सीताजी के खोजनहार II
ऐसी कृपा करो, प्रभु ! मुझ पर,
निशि - वासर मै तुमको ध्याऊँ I
प्रभु चरणों का लिये आसरा,
सकल कामना बिसराऊ II
भक्त गण गाएं युगों - युगों तक,
तेरी महिमा अपरम्पार I
जय लक्ष्मण के परिरक्षक,
जय सीताजी के खोजनहार II
Tuesday, April 3, 2012
हनुमान चालीसा ( भाग - २ )
हनुमान चालीसा भाग-२
दोहा:- श्रीगुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुरु सुधारि ।
बरनऊं रघुवर बिमल जसु जो दायक फल चारि ।।
अर्थ : श्रीगुरुजी महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूं , जो चारों फल ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) देने वाला है ।
गूढार्थ : तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा का प्रारंभ गुरु वंदना से किया है । भारतीय संस्कृति में गुरु को बहुत अधिक महत्व दिया गया है । निर्जीव वस्तु को उपर फेंकने के लिए जिस तरह सजीव की जरुरत होती है, उसी प्रकार लगभग जीवन हीन और पुश तुल्य बने मानव को देवत्व की ओर ले जाने के लिए जिस तेजस्वी व्यक्ति की आवश्यकता रहती है, वह गुरु ही है । गुरु याने जो लघु नहीं है और लघु को गुरु बनाता है ।गुरु का अर्थ है वाह जिससे हम कुछ सीखते है या ज्ञान प्राप्त करते हैं | अज्ञान के अंधकार को दूर करने के लिए ज्ञान की ज्योति जलानेवाले गुरु होतें है । कहते हैं कि :
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर: ।
गुरु: साक्षात् परब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नम: ।।
ब्रम्हा की तरह सद्गुणोंका सर्जक, विष्णु की तरह सद्वृत्ति के पालक और महादेव की तरह दुर्गूण और दुवृत्ति के संहारक और जीव-शिव का मिलन करानेवाले गुरु साक्षात् परब्रम्ह के समान हैं। ऐसे गुरु का पूजन भारतीय संस्कृति का सुमधुर काव्य है ।
गुरु अनेक प्रकार के होतें है, जैसे कि मार्गदर्शक गुरु, पृच्छक गुरु, दोष विसर्जक गुरु, चंदन गुरु, विचार गुरु, अनुग्रह गुरु, स्पर्श गुरु, वात्सल्य गुरु, कुर्मगुरु, चंद्रगुरु, दर्पण गुरु इत्यादि | प्रत्येक गुरु की अपनी अपनी विशिष्टता है ।
तुलसीदासजी के गुरु श्री नरहरि जी शिक्षा गुरु, तथा हनुमानजी मार्गदर्शक गुरु थे, जिनके मार्गदर्शन तथा कृपा से ही उन्हे भगवान श्रीराम के दर्शन प्राप्त हुए । जो सामान्य विद्या देता है वह गुरु ही है, परन्तु जो विद्याओंमें श्रेष्ठ विद्या, अध्यात्म विद्या देता है, वही सच्चा गुरु है ।
गुरु शिक्षक अथवा आचार्य नहीं है । शिक्षक तथा आचार्य कुछ विषय हमें समझाते हैं, परन्तु गुरु हमें ज्ञान के गर्भागार में ले जाते हैं । गुरु हमें जीवन के प्रांगण में ले जाते है । हिन्दी में एक कहावत है -
‘पीना पानी छानके और गुरु करना जानके’।
गुरु सोच समझकर ही बनाना चाहिए । संस्कृत में एक सुभाषित है ।
बहवो गुरुवो लोके शिष्य वित्तापहारका: ।
क्वचितु तत्र दृशन्ते शिष्यचित्तापहारका: ।।
जगतमें अनेक गुरु शिष्यका वित्त हरण करनेवाले होते हैं, परन्तु शिष्यका चित्त हरण करनेवाले गुरु क्वचित ही दिखायी देते हैं ।
‘गुरु’ शब्द का अर्थ क्या है ? ‘गु’ शब्द का अर्थ है ‘अंधकार’ और ‘रु’ शब्द का अर्थ है - निवर्तक - निकालनेवाला । अंधकार का जो निवारण करता है वह गुरु है ।
जीवन क्या है ? किसलिए है ? इस सम्बन्धमें सब के मन में अंधकार है । अंधकार में प्रकाश कौन देगा ? कोई कहेगा प्रकाश सूर्य देता है । सच बात है । सूर्य ही अंधकार का नाश करता है । वह अंधकार अलग है, परंतु जीवन के सम्बन्ध में जो अंधकार है वही ‘गु’ है । इस अंधकार को हटाकर जीवन का अर्थ समझानेवाला गुरु है । जीवन का लक्ष्य क्या है ? ‘भगवद्प्राप्ती हमारे जीवन का लक्ष्य है । अदृश्य के पास जाना है अदृश्य शक्ति पर प्रेम करना है तो जीवनमें मार्गदर्शक गुरु की आवश्यकता पडेगी ही । तुलसीदासजी को भगवान श्रीराम के दर्शन हनुमानजी की कृपा तथा मार्गदर्शन से ही प्राप्त हुए थे ।
अध्यात्म में गुरु की आवश्यकता होती है । क्योंकि गुरु तथा संतो के चरण रज की महिमा अनंत बतायी गयी है । गुरु तथा संतों की महत्ता, श्रेष्ठता से हम शुध्द होतें है, पवित्र होते हैं । इसीलिए हमारी संस्कृति में संतों के चरणरज की महिमा अनंत गायी गई है।
एक समय भक्त पुंडलिक अपने माता पिता को लेकर उत्तर भारत में तीर्थयात्रा के लिए गये । तीर्थयात्रा करते करते वे एक दिन कुकुट ऋषि के आश्रम पहुँचे । रात्रि के समय ब्रम्ह मुहूर्तमें चित्त एकाग्र करने पुंडलिक उठे । उस समय उन्होने देखा तीन कुरुप स्त्रियाँ आश्रम की ओर आ रही है । उन्होने सोंचा इस पवित्र जगह यह कुरुप स्त्रियाँ किसलिए आती होगी ? । पुंडलिक ने देखा तीनों स्त्रियोंने समूचा आश्रम झाडकर स्वच्छ किया और वे अतिशय सुंदर रुपवती बनकर चली गई । ऐसा रोज 2-3 दिन उन्होने देखा, तीसरे दिन वे स्त्रियाँ जब बाहर जाने लगी कि पुंडलिक ने भागते हुए उनके चरण पकड लिये तथा पूछा कि मातायें आप कौन है ? । मैं सतत तीन दिन से देख रहा हूँ आप तीनों कुरुप, मलिन ऐसी स्थितमें आती है और सुन्दर रुपवती बनकर जाती हैं । उन्होने कहा हम गंगा, यमुना और सरस्वती हैं । सब लोग स्वत: के पाप हममें धोतें है इसलिए हम काली, कुरुप और मलिन हो जाती हैं, इन पापों से आयी यह मलिनता हम कहाँ धोयें ? । कुकुट ऋषि के यहाँ नित्य हजारों लोगों को ऋषी महाराज भक्ति मार्ग समझाकर कर्मयोग की दीक्षा देते हैं । भगवान का काम करनेवाले, प्रेरणा देनेवाले कुकुट ऋषी के चरण-रज से इस आश्रम की धूलि पवित्र हो गयी है । हम जब झाडू लगाती हैं तो यह पवित्र रज कण हमारे शरीर पर पडते हैं जिससे हम सुंदर बन जाती है । ऐसी महत्ता है संतोंके चरण रज की ।
इसलिए तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा के प्रारंभ में गुरु के चरण रज से मन रुपी दर्पण को स्वच्छ करने की प्रार्थना की है ।
हमें यदि भगवान का बनना है तो प्रथम हमारे मन को स्वच्छ करना होगा इसलिए तुलसीदासजी ने लिखा है ‘निज मन मुकूरु सुधारि’ मानव जीवन में मन का असाधारण स्थान है । मन को शक्तिशाली, संस्कारी, संवेदनशील और प्रतिकार क्षम बनाना चाहिये । यह केवल स्वाध्याय से हो सकता है । मन प्रभुकी विभूति है, और मानव जीवन का परिवर्तन करनेवाला गुरु है । अत: मन को जितना उँचा ले जायेंगे उतना ही जीवन उच्च बनेगा। मन चाहे तो मनुष्य को भगवान भी बना सकता है और चाहें तो पशु बना सकता है। मनुष्य को कहीं भी ले जाने की शक्ति मन के पास है । मन और बुध्दि शरीर के वाहक हैं अत: उनको स्वाध्याय से शक्तिशाली बनाना चाहिये । जिस प्रकार घुडदौड की स्पर्धा में प्रशिक्षित घोडा प्रथम आता है और न सिखाया घोडा चाबुक मारने पर भी ठीक नहीं चलता, उसी प्रकार मन और बुध्दिको जितना सुसंस्कृत करेंगे, जीवन उतना ही उन्नत होगा ।
स्नान से शरीर स्वच्छ बनता है और प्रार्थना से मन । हमारे जीवनमें मन काफी महत्वपूर्ण है । जीवन की प्रत्येक क्रिया में मन आवश्यक है । गीतामें भी भगवान ने जीवात्मा से मन ही मांगा है । ‘‘मन्मना भव’’ या ‘‘मय्येव मन आधत्स्व’’ परन्तु हमारा मन तो मलिन और कलुषित है, काला बना हुआ है, ऐसे मन को भगवान को कैसे अर्पण करें इसीलिए ‘निज मन मुकुरु सुधारि’
जीवन विकास के लिए मन का शुध्दिकरण आवश्यक है। तथा भगवान को भी मन देना है तो उसको शुध्द स्वच्छ करके देना होगा । अस्वच्छ, काला कलूटा मन भगवान कैसे स्वीकार करेंगे? मन को स्वच्छ कैसे करेंगे ? मन का रंग कैसे बदला जा सकता है ? और यदि हमें कोयले का रंग बदलना हो तो हम कैसे बदलेंगे ? कोयले को साबून और पानी से धोयेंगे तो पानी और साबून दोनों ही समाप्त हो जायेंगे लेकिन कोयला कोयला ही रहेगा । कोयले का रंग नही बदलेगा । कोयले का रंग बदलने का एक ही रास्ता है कि उसे अग्नि में डाल दो, दो मिनट में उसका रंग बदल जाएगा, लाल हो जाएगा । इसी प्रकार हमारा मन जहाँ से हमें मिला है वहाँ याने परमात्मा में जोड देने से उसका रंग बदल जाएगा । स्वच्छ, निर्मल, तथा पवित्र बन जाएगा । इसीलिए तुलसीदासजी ने मन को स्वच्छ करने के लिए परमात्मा में मन को जोडने के लिये लिखा है, ‘निज मन मुकुरु सुधारि’ तथा भगवान के गुणोंका यशगान करने से मनुष्यको चारों फल की प्राप्ति होती है। चारों फल यानी चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) ।
हमारी भारतीय संस्कृति में चार पुरुषार्थ बताये गये है । चार पुरुषार्थ में प्रथम धर्म है, तथा अन्तमें मोक्ष है । अर्थात धर्म और मोक्ष के बीचमें जो अर्थ और काम का विवेकपूर्ण उपभोग करता है वही सबसे बडा बुध्दिमान है । तथा वही मानव जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है । वही सफल जिज्ञासु है । इसके विपरीत जो दिन रात अर्थ एवं काम के पीछे दौड लगाते है, उनका धर्म एवं अंतिम मोक्ष का लक्ष्य भी निष्क्रिय हो जाता है, क्योंकि अर्थ और काम की ऐसी मार है कि आदमी जीवन भर उपभोग करते करते स्वयं को काल के हवाले कर देता है तथा सदा के लिये चौरासी के चक्कर में फंस जाता है ।
भगवान विष्णु को चतुर्भुज बताया गया है । विष्णु भगवान के चार हाथ है । एक-एक हाथ में एक-एक बात पुरुषार्थ देने के लिए है । धर्मको ही लेकर बैठेंगे तो आप भक्त नही है, उसी प्रकार केवल अर्थ का ही विचार करेंगे, सुबह से रात्रि तक पैसे का ही विचार, मंदिर में भी पैसे के लिए ही जाना, तो भी आप भक्त नही है । धर्म, अर्थ और काम सममेव सेव्य: । कितनी सुंदर व्यवस्था दी है हमारे धर्मशास्त्र ने तीनों के लिये समान समय देना चाहिये । और धर्म, अर्थ , काम का मुँह मोक्ष की ओर रखना चाहिये ।
धर्म शास्त्रों और ऋषियों ने धर्म, अर्थ, काम तथा प्रभुकार्य के लिए समय का समान निर्धारण किया है। अर्थात् दिन-रात के चौबीस घंटों में से प्रत्येक को छ घंटे देने चाहिए । यह मानव जीवन की आदर्श समय-सारिणी है ।
तुलसीदासजी कहते है कि पौरुष हमें भगवान से भेंट रुपमें मिलता है । ‘‘बरनऊं रघुवर बिमल जसु जो दायक फल चारि’’ यहॉँ गोस्वामीजी का लिखने का अभिप्राय यह है कि पौरुष हमें भगवान से मिली हुयी भेंट है, परन्तु हमने पौरुष का उपयोग किया है या नही उसका विचार करना पडेगा । प्रत्येक को उपभोग लेना है । उपभोग के साधन कमाने और संभालने के लिए पौरुष है । जगतमें कुछ भी मुफ्त में नही मिलता सब कमाना पडता है । किये बिना कुछ नहीं मिलता, बोने पर ही अनाज मिलता है, खोदनेपर ही पानी मिलता है अन्न तथा पानी के लिए भी कर्म करने पडते है। मनुष्य को पौरुष का उपयोग करना चाहिये।
जीवन विकास के लिए भी पौरुष चाहिए । मनुष्य को विचार करना चाहिए कि अपने पौरुष का एक दशांश भाग भी क्या मैने अपने विकास के लिए इस्तेमाल किया है ? लोगों के पास कितना पौरुष होता है ? क्या उसमे से थोडा भी उन्होने भगवद्कार्य के लिए उपयोग किया है ? भारतीय संस्कृति ने काम को भी पुरुषार्थ माना है। संस्कृतिमें तीन बातें आती है
1) जीवन प्रणाली (Way of Life)
२) विचार प्रणाली (Way of Thinking),
3) भक्ति प्रणाली (Way of Worship)
इन तीनो के संयोग से संस्कृति खडी होती है । भारतीय संस्कृतिमें बौध्दिक, भावनात्मक और लैंगिक इन तीनों स्तरपर विचार करके काम को पुरुषार्थ माना है । आज काम का अर्थ केवल शारीरिक सुख माना जाता है । बुध्दि, भावना और लिंग देह मिलकर वश: होता है । एक दुसरे के लिए परस्पर आकर्षण को वश: कहते हैं, उसे उन्नत करना चाहिए। भगवान ने स्त्री-पुरुष के बीच जो आकर्षण रखा है उसे भगवान तक ले जाना है । उसीको मधुराभक्ति कहते हैं । इससें पता चलता है कि ऋषि मुनियों ने इसका कितना विचार किया होगा तभी उसे पुरुषार्थ माना गया है । सहजीवन से तात्विक जीवन और आध्यात्मिक जीवन श्रेष्ठ बनते हैं ।
जीवन क्या है, कैसा है, मेरे पास कौन कौनसी बातें है और भगवान ने मुझे क्यों दी है ? इन्हे समझकर उपयोग मे लाना चाहिए, इसलिए आत्म निरीक्षण (Introspection) की जरुरत है । सभी ज्ञानेन्द्रिय, कामेंद्रियोंको पौरुष युक्त बनाना चाहिए । आज ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेंद्रिय भोग से पतित हो गयी है । उनमें से पौरुष चला गया है, किसी के मनमें बुध्दिमें, इन्द्रियोंमें तथा उपभोगमें भी पौरुष नही है । हमने पौरुष का उपयोग नही किया है । समर्थ शरीर तथा समर्थ मन बनाना जरुरी है इसीलिए आगे के दोहे में तुलसीदास जी हनुमानजी से बल, बुध्दि और विद्या प्रदान करने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं |
( शेष भाग – ३ )
दोहा:- श्रीगुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुरु सुधारि ।
बरनऊं रघुवर बिमल जसु जो दायक फल चारि ।।
अर्थ : श्रीगुरुजी महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूं , जो चारों फल ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) देने वाला है ।
गूढार्थ : तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा का प्रारंभ गुरु वंदना से किया है । भारतीय संस्कृति में गुरु को बहुत अधिक महत्व दिया गया है । निर्जीव वस्तु को उपर फेंकने के लिए जिस तरह सजीव की जरुरत होती है, उसी प्रकार लगभग जीवन हीन और पुश तुल्य बने मानव को देवत्व की ओर ले जाने के लिए जिस तेजस्वी व्यक्ति की आवश्यकता रहती है, वह गुरु ही है । गुरु याने जो लघु नहीं है और लघु को गुरु बनाता है ।गुरु का अर्थ है वाह जिससे हम कुछ सीखते है या ज्ञान प्राप्त करते हैं | अज्ञान के अंधकार को दूर करने के लिए ज्ञान की ज्योति जलानेवाले गुरु होतें है । कहते हैं कि :
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर: ।
गुरु: साक्षात् परब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नम: ।।
ब्रम्हा की तरह सद्गुणोंका सर्जक, विष्णु की तरह सद्वृत्ति के पालक और महादेव की तरह दुर्गूण और दुवृत्ति के संहारक और जीव-शिव का मिलन करानेवाले गुरु साक्षात् परब्रम्ह के समान हैं। ऐसे गुरु का पूजन भारतीय संस्कृति का सुमधुर काव्य है ।
गुरु अनेक प्रकार के होतें है, जैसे कि मार्गदर्शक गुरु, पृच्छक गुरु, दोष विसर्जक गुरु, चंदन गुरु, विचार गुरु, अनुग्रह गुरु, स्पर्श गुरु, वात्सल्य गुरु, कुर्मगुरु, चंद्रगुरु, दर्पण गुरु इत्यादि | प्रत्येक गुरु की अपनी अपनी विशिष्टता है ।
तुलसीदासजी के गुरु श्री नरहरि जी शिक्षा गुरु, तथा हनुमानजी मार्गदर्शक गुरु थे, जिनके मार्गदर्शन तथा कृपा से ही उन्हे भगवान श्रीराम के दर्शन प्राप्त हुए । जो सामान्य विद्या देता है वह गुरु ही है, परन्तु जो विद्याओंमें श्रेष्ठ विद्या, अध्यात्म विद्या देता है, वही सच्चा गुरु है ।
गुरु शिक्षक अथवा आचार्य नहीं है । शिक्षक तथा आचार्य कुछ विषय हमें समझाते हैं, परन्तु गुरु हमें ज्ञान के गर्भागार में ले जाते हैं । गुरु हमें जीवन के प्रांगण में ले जाते है । हिन्दी में एक कहावत है -
‘पीना पानी छानके और गुरु करना जानके’।
गुरु सोच समझकर ही बनाना चाहिए । संस्कृत में एक सुभाषित है ।
बहवो गुरुवो लोके शिष्य वित्तापहारका: ।
क्वचितु तत्र दृशन्ते शिष्यचित्तापहारका: ।।
जगतमें अनेक गुरु शिष्यका वित्त हरण करनेवाले होते हैं, परन्तु शिष्यका चित्त हरण करनेवाले गुरु क्वचित ही दिखायी देते हैं ।
‘गुरु’ शब्द का अर्थ क्या है ? ‘गु’ शब्द का अर्थ है ‘अंधकार’ और ‘रु’ शब्द का अर्थ है - निवर्तक - निकालनेवाला । अंधकार का जो निवारण करता है वह गुरु है ।
जीवन क्या है ? किसलिए है ? इस सम्बन्धमें सब के मन में अंधकार है । अंधकार में प्रकाश कौन देगा ? कोई कहेगा प्रकाश सूर्य देता है । सच बात है । सूर्य ही अंधकार का नाश करता है । वह अंधकार अलग है, परंतु जीवन के सम्बन्ध में जो अंधकार है वही ‘गु’ है । इस अंधकार को हटाकर जीवन का अर्थ समझानेवाला गुरु है । जीवन का लक्ष्य क्या है ? ‘भगवद्प्राप्ती हमारे जीवन का लक्ष्य है । अदृश्य के पास जाना है अदृश्य शक्ति पर प्रेम करना है तो जीवनमें मार्गदर्शक गुरु की आवश्यकता पडेगी ही । तुलसीदासजी को भगवान श्रीराम के दर्शन हनुमानजी की कृपा तथा मार्गदर्शन से ही प्राप्त हुए थे ।
अध्यात्म में गुरु की आवश्यकता होती है । क्योंकि गुरु तथा संतो के चरण रज की महिमा अनंत बतायी गयी है । गुरु तथा संतों की महत्ता, श्रेष्ठता से हम शुध्द होतें है, पवित्र होते हैं । इसीलिए हमारी संस्कृति में संतों के चरणरज की महिमा अनंत गायी गई है।
एक समय भक्त पुंडलिक अपने माता पिता को लेकर उत्तर भारत में तीर्थयात्रा के लिए गये । तीर्थयात्रा करते करते वे एक दिन कुकुट ऋषि के आश्रम पहुँचे । रात्रि के समय ब्रम्ह मुहूर्तमें चित्त एकाग्र करने पुंडलिक उठे । उस समय उन्होने देखा तीन कुरुप स्त्रियाँ आश्रम की ओर आ रही है । उन्होने सोंचा इस पवित्र जगह यह कुरुप स्त्रियाँ किसलिए आती होगी ? । पुंडलिक ने देखा तीनों स्त्रियोंने समूचा आश्रम झाडकर स्वच्छ किया और वे अतिशय सुंदर रुपवती बनकर चली गई । ऐसा रोज 2-3 दिन उन्होने देखा, तीसरे दिन वे स्त्रियाँ जब बाहर जाने लगी कि पुंडलिक ने भागते हुए उनके चरण पकड लिये तथा पूछा कि मातायें आप कौन है ? । मैं सतत तीन दिन से देख रहा हूँ आप तीनों कुरुप, मलिन ऐसी स्थितमें आती है और सुन्दर रुपवती बनकर जाती हैं । उन्होने कहा हम गंगा, यमुना और सरस्वती हैं । सब लोग स्वत: के पाप हममें धोतें है इसलिए हम काली, कुरुप और मलिन हो जाती हैं, इन पापों से आयी यह मलिनता हम कहाँ धोयें ? । कुकुट ऋषि के यहाँ नित्य हजारों लोगों को ऋषी महाराज भक्ति मार्ग समझाकर कर्मयोग की दीक्षा देते हैं । भगवान का काम करनेवाले, प्रेरणा देनेवाले कुकुट ऋषी के चरण-रज से इस आश्रम की धूलि पवित्र हो गयी है । हम जब झाडू लगाती हैं तो यह पवित्र रज कण हमारे शरीर पर पडते हैं जिससे हम सुंदर बन जाती है । ऐसी महत्ता है संतोंके चरण रज की ।
इसलिए तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा के प्रारंभ में गुरु के चरण रज से मन रुपी दर्पण को स्वच्छ करने की प्रार्थना की है ।
हमें यदि भगवान का बनना है तो प्रथम हमारे मन को स्वच्छ करना होगा इसलिए तुलसीदासजी ने लिखा है ‘निज मन मुकूरु सुधारि’ मानव जीवन में मन का असाधारण स्थान है । मन को शक्तिशाली, संस्कारी, संवेदनशील और प्रतिकार क्षम बनाना चाहिये । यह केवल स्वाध्याय से हो सकता है । मन प्रभुकी विभूति है, और मानव जीवन का परिवर्तन करनेवाला गुरु है । अत: मन को जितना उँचा ले जायेंगे उतना ही जीवन उच्च बनेगा। मन चाहे तो मनुष्य को भगवान भी बना सकता है और चाहें तो पशु बना सकता है। मनुष्य को कहीं भी ले जाने की शक्ति मन के पास है । मन और बुध्दि शरीर के वाहक हैं अत: उनको स्वाध्याय से शक्तिशाली बनाना चाहिये । जिस प्रकार घुडदौड की स्पर्धा में प्रशिक्षित घोडा प्रथम आता है और न सिखाया घोडा चाबुक मारने पर भी ठीक नहीं चलता, उसी प्रकार मन और बुध्दिको जितना सुसंस्कृत करेंगे, जीवन उतना ही उन्नत होगा ।
स्नान से शरीर स्वच्छ बनता है और प्रार्थना से मन । हमारे जीवनमें मन काफी महत्वपूर्ण है । जीवन की प्रत्येक क्रिया में मन आवश्यक है । गीतामें भी भगवान ने जीवात्मा से मन ही मांगा है । ‘‘मन्मना भव’’ या ‘‘मय्येव मन आधत्स्व’’ परन्तु हमारा मन तो मलिन और कलुषित है, काला बना हुआ है, ऐसे मन को भगवान को कैसे अर्पण करें इसीलिए ‘निज मन मुकुरु सुधारि’
जीवन विकास के लिए मन का शुध्दिकरण आवश्यक है। तथा भगवान को भी मन देना है तो उसको शुध्द स्वच्छ करके देना होगा । अस्वच्छ, काला कलूटा मन भगवान कैसे स्वीकार करेंगे? मन को स्वच्छ कैसे करेंगे ? मन का रंग कैसे बदला जा सकता है ? और यदि हमें कोयले का रंग बदलना हो तो हम कैसे बदलेंगे ? कोयले को साबून और पानी से धोयेंगे तो पानी और साबून दोनों ही समाप्त हो जायेंगे लेकिन कोयला कोयला ही रहेगा । कोयले का रंग नही बदलेगा । कोयले का रंग बदलने का एक ही रास्ता है कि उसे अग्नि में डाल दो, दो मिनट में उसका रंग बदल जाएगा, लाल हो जाएगा । इसी प्रकार हमारा मन जहाँ से हमें मिला है वहाँ याने परमात्मा में जोड देने से उसका रंग बदल जाएगा । स्वच्छ, निर्मल, तथा पवित्र बन जाएगा । इसीलिए तुलसीदासजी ने मन को स्वच्छ करने के लिए परमात्मा में मन को जोडने के लिये लिखा है, ‘निज मन मुकुरु सुधारि’ तथा भगवान के गुणोंका यशगान करने से मनुष्यको चारों फल की प्राप्ति होती है। चारों फल यानी चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) ।
हमारी भारतीय संस्कृति में चार पुरुषार्थ बताये गये है । चार पुरुषार्थ में प्रथम धर्म है, तथा अन्तमें मोक्ष है । अर्थात धर्म और मोक्ष के बीचमें जो अर्थ और काम का विवेकपूर्ण उपभोग करता है वही सबसे बडा बुध्दिमान है । तथा वही मानव जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है । वही सफल जिज्ञासु है । इसके विपरीत जो दिन रात अर्थ एवं काम के पीछे दौड लगाते है, उनका धर्म एवं अंतिम मोक्ष का लक्ष्य भी निष्क्रिय हो जाता है, क्योंकि अर्थ और काम की ऐसी मार है कि आदमी जीवन भर उपभोग करते करते स्वयं को काल के हवाले कर देता है तथा सदा के लिये चौरासी के चक्कर में फंस जाता है ।
भगवान विष्णु को चतुर्भुज बताया गया है । विष्णु भगवान के चार हाथ है । एक-एक हाथ में एक-एक बात पुरुषार्थ देने के लिए है । धर्मको ही लेकर बैठेंगे तो आप भक्त नही है, उसी प्रकार केवल अर्थ का ही विचार करेंगे, सुबह से रात्रि तक पैसे का ही विचार, मंदिर में भी पैसे के लिए ही जाना, तो भी आप भक्त नही है । धर्म, अर्थ और काम सममेव सेव्य: । कितनी सुंदर व्यवस्था दी है हमारे धर्मशास्त्र ने तीनों के लिये समान समय देना चाहिये । और धर्म, अर्थ , काम का मुँह मोक्ष की ओर रखना चाहिये ।
धर्म शास्त्रों और ऋषियों ने धर्म, अर्थ, काम तथा प्रभुकार्य के लिए समय का समान निर्धारण किया है। अर्थात् दिन-रात के चौबीस घंटों में से प्रत्येक को छ घंटे देने चाहिए । यह मानव जीवन की आदर्श समय-सारिणी है ।
तुलसीदासजी कहते है कि पौरुष हमें भगवान से भेंट रुपमें मिलता है । ‘‘बरनऊं रघुवर बिमल जसु जो दायक फल चारि’’ यहॉँ गोस्वामीजी का लिखने का अभिप्राय यह है कि पौरुष हमें भगवान से मिली हुयी भेंट है, परन्तु हमने पौरुष का उपयोग किया है या नही उसका विचार करना पडेगा । प्रत्येक को उपभोग लेना है । उपभोग के साधन कमाने और संभालने के लिए पौरुष है । जगतमें कुछ भी मुफ्त में नही मिलता सब कमाना पडता है । किये बिना कुछ नहीं मिलता, बोने पर ही अनाज मिलता है, खोदनेपर ही पानी मिलता है अन्न तथा पानी के लिए भी कर्म करने पडते है। मनुष्य को पौरुष का उपयोग करना चाहिये।
जीवन विकास के लिए भी पौरुष चाहिए । मनुष्य को विचार करना चाहिए कि अपने पौरुष का एक दशांश भाग भी क्या मैने अपने विकास के लिए इस्तेमाल किया है ? लोगों के पास कितना पौरुष होता है ? क्या उसमे से थोडा भी उन्होने भगवद्कार्य के लिए उपयोग किया है ? भारतीय संस्कृति ने काम को भी पुरुषार्थ माना है। संस्कृतिमें तीन बातें आती है
1) जीवन प्रणाली (Way of Life)
२) विचार प्रणाली (Way of Thinking),
3) भक्ति प्रणाली (Way of Worship)
इन तीनो के संयोग से संस्कृति खडी होती है । भारतीय संस्कृतिमें बौध्दिक, भावनात्मक और लैंगिक इन तीनों स्तरपर विचार करके काम को पुरुषार्थ माना है । आज काम का अर्थ केवल शारीरिक सुख माना जाता है । बुध्दि, भावना और लिंग देह मिलकर वश: होता है । एक दुसरे के लिए परस्पर आकर्षण को वश: कहते हैं, उसे उन्नत करना चाहिए। भगवान ने स्त्री-पुरुष के बीच जो आकर्षण रखा है उसे भगवान तक ले जाना है । उसीको मधुराभक्ति कहते हैं । इससें पता चलता है कि ऋषि मुनियों ने इसका कितना विचार किया होगा तभी उसे पुरुषार्थ माना गया है । सहजीवन से तात्विक जीवन और आध्यात्मिक जीवन श्रेष्ठ बनते हैं ।
जीवन क्या है, कैसा है, मेरे पास कौन कौनसी बातें है और भगवान ने मुझे क्यों दी है ? इन्हे समझकर उपयोग मे लाना चाहिए, इसलिए आत्म निरीक्षण (Introspection) की जरुरत है । सभी ज्ञानेन्द्रिय, कामेंद्रियोंको पौरुष युक्त बनाना चाहिए । आज ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेंद्रिय भोग से पतित हो गयी है । उनमें से पौरुष चला गया है, किसी के मनमें बुध्दिमें, इन्द्रियोंमें तथा उपभोगमें भी पौरुष नही है । हमने पौरुष का उपयोग नही किया है । समर्थ शरीर तथा समर्थ मन बनाना जरुरी है इसीलिए आगे के दोहे में तुलसीदास जी हनुमानजी से बल, बुध्दि और विद्या प्रदान करने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं |
( शेष भाग – ३ )
Thursday, March 29, 2012
विन्ध्येश्वेरी चालीसा


विन्ध्येश्वेरी चालीसा
दोहा
नमो नमो विन्ध्येश्वरी, नमो नमो जगदम्ब।
सन्तजनों के काज में करती नहीं विलम्ब।
चौपाई
जय जय जय विन्ध्याचल रानी, आदि शक्ति जग विदित भवानी।
सिंहवाहिनी जय जग माता, जय जय जय त्रिभुवन सुखदाता।
कष्ट निवारिणी जय जग देवी, जय जय जय असुरासुर सेवी।
महिमा अमित अपार तुम्हारी, शेष सहस्र मुख वर्णत हारी।
दीनन के दुख हरत भवानी, नहिं देख्यो तुम सम कोई दानी।
सब कर मनसा पुरवत माता, महिमा अमित जग विख्याता।
जो जन ध्यान तुम्हारो लावे, सो तुरतहिं वांछित फल पावै।
तू ही वैष्णवी तू ही रुद्राणी, तू ही शारदा अरु ब्रह्माणी।
रमा राधिका श्यामा काली, तू ही मातु सन्तन प्रतिपाली।
उमा माधवी चण्डी ज्वाला, बेगि मोहि पर होहु दयाला।
तू ही हिंगलाज महारानी, तू ही शीतला अरु विज्ञानी।
दुर्गा दुर्ग विनाशिनी माता, तू ही लक्ष्मी जग सुख दाता।
तू ही जाह्नवी अरु उत्राणी, हेमावती अम्बे निरवाणी।
अष्टभुजी वाराहिनी देवी, करत विष्णु शिव जाकर सेवा।
चौसठ देवी और कल्यानी, गौरी मंगला सब गुण खानी।
पाटन मुम्बा दन्त कुमारी, भद्रकाली सुन विनय हमारी।
वज्र धारिणी शोक नाशिनी, आयु रक्षिणी विन्ध्यवासिनी।
जया और विजया बैताली, मातु संकटी अरु विकराली।
नाम अनन्त तुम्हार भवानी, बरनै किमि मानुष अज्ञानी।
जापर कृपा मातु तव होई, तो वह करै चहै मन जोई।
कृपा करहुं मोपर महारानी, सिद्ध करिए अब यह मम बानी।
जो नर धरै मात कर ध्याना, ताकर सदा होय कल्याना।
विपति ताहि सपनेहु नहिं आवै, जो देवी का जाप करावै।
जो नर कहं ऋण होय अपारा, सो नर पाठ करै शतबारा।
निश्चय ऋण मोचन होइ जाई, जो नर पाठ करै मन लाई।
अस्तुति जो नर पढ़ै पढ़ावै, या जग में सो अति सुख पावै।
जाको व्याधि सतावे भाई, जाप करत सब दूर पराई।
जो नर अति बन्दी महं होई, बार हजार पाठ कर सोई।
निश्चय बन्दी ते छुटि जाई, सत्य वचन मम मानहुं भाई।
जा पर जो कछु संकट होई, निश्चय देविहिं सुमिरै सोई।
जा कहं पुत्र होय नहिं भाई, सो नर या विधि करे उपाई।
पांच वर्ष सो पाठ करावै, नौरातन में विप्र जिमावै।
निश्चय होहिं प्रसन्न भवानी, पुत्र देहिं ताकहं गुण खानी।
ध्वजा नारियल आनि चढ़ावै, विधि समेत पूजन करवावै।
नित्य प्रति पाठ करै मन लाई, प्रेम सहित नहिं आन उपाई।
यह श्री विन्ध्याचल चालीसा, रंक पढ़त होवे अवनीसा।
यह जनि अचरज मानहुं भाई, कृपा दृष्टि तापर होइ जाई।
जय जय जय जग मातु भवानी, कृपा करहुं मोहिं पर जन जानी।
Friday, March 23, 2012
नव रात्रि व्रत कथा
नव रात्रि व्रत कथा
प्रातः काल उठकर स्नान करके, मन्दिर में जाकर या घर पर ही नवरात्रों में दुर्गा जी का ध्यान करके यह कथा पढ़नी चाहिए। कन्याओं के लिए यह व्रत विशेष फलदायक है। श्री जगदम्बा की कृपा से सब विघ्न दूर होते हैं। कथा के अन्त में बारम्बार ‘दुर्गा माता तेरी सदा ही जय हो’ का उच्चारण करें।
कथा प्रारम्भ
बृहस्पति जी बोले- हे ब्राह्मण। आप अत्यन्त बुद्धिमान, सर्वशास्त्र और चारों वेदों को जानने वालों में श्रेष्ठ हो। हे प्रभु! कृपा कर मेरा वचन सुनो। नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों किया जाता है? हे भगवान! इस व्रत का फल क्या है? किस प्रकार करना उचित है? और पहले इस व्रत को किसने किया? सो विस्तार से कहो?
बृहस्पति जी का ऐसा प्रश्न सुनकर ब्रह्मा जी कहने लगे कि हे बृहस्पते! प्राणियों का हित करने की इच्छा से तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया। जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेवी, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं, यह नवरात्र व्रत सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इसके करने से पुत्र चाहने वाले को पुत्र, धन चाहने वाले को धन, विद्या चाहने वाले को विद्या और सुख चाहने वाले को सुख मिल सकता है। इस व्रत को करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाता है और कारागार हुआ मनुष्य बन्धन से छूट जाता है। मनुष्य की तमाम आपत्तियां दूर हो जाती हैं और उसके घर में सम्पूर्ण सम्पत्तियां आकर उपस्थित हो जाती हैं। बन्ध्या को इस व्रत के करने से पुत्र उत्पन्न होता है। समस्त पापों को दूर करने वाले इस व्रत के करने से ऐसा कौन सा मनोबल है जो सिद्ध नहीं हो सकता। जो मनुष्य अलभ्य मनुष्य देह को पाकर भी नवरात्र का व्रत नहीं करता वह माता-पिता से हीन हो जाता है अर्थात् उसके माता-पिता मर जाते हैं और अनेक दुखों को भोगता है। उसके शरीर में कुष्ठ हो जाता है और अंग से हीन हो जाता है | उसके सन्तानोत्पत्ति नहीं होती है। इस प्रकार वह मूर्ख अनेक दुख भोगता है। इस व्रत को न करने वला निर्दयी मनुष्य धन और धान्य से रहित हो, भूख और प्यास के मारे पृथ्वी पर घूमता है और गूंगा हो जाता है। जो स्त्री इस व्रत को नहीं करतीं वह पति हीन होकर नाना प्रकार के दुखों को भोगती हैं। यदि व्रत करने वाला मनुष्य सारे दिन का उपवास न कर सके तो एक समय भोजन करे और उस दिन बान्धवों सहित नवरात्र व्रत की कथा करे।
हे बृहस्पते! जिसने पहले इस व्रत को किया है उसका पवित्र इतिहास मैं तुम्हें सुनाता हूं। तुम सावधान होकर सुनो। इस प्रकार ब्रह्मा जी का वचन सुनकर बृहस्पति जी बोले- हे ब्राह्मण! मनुष्यों का कल्याण करने वाले इस व्रत के इतिहास को मेरे लिए कहो मैं सावधान होकर सुन रहा हूं। आपकी शरण में आए हुए मुझ पर कृपा करो।
ब्रह्मा जी बोले- पीठत नाम के मनोहर नगर में एक अनाथ नाम का ब्राह्मण रहता था। वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके सम्पूर्ण सद्गुणों से युक्त, मानो ब्रह्मा की सबसे पहली रचना हो, ऐसी सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दर पुत्री उत्पन्न हुई। वह कन्या सुमति अपने घर के बालकपन में अपनी सहेलियों के साथ क्रीड़ा करती हुई इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की कला बढ़ती है। उसका पिता प्रतिदिन दुर्गा की पूजा और होम करता था। उस समय वह भी नियम से वहां उपस्थित होती थी। एक दिन वह सुमति अपनी सखियों के साथ खेलने लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई। उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और पुत्री से कहने लगा कि हे दुष्ट पुत्री! आज प्रभात से तुमने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मैं किसी कुष्ठी और दरिद्री मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूंगा।
इस प्रकार कुपित पिता के वचन सुनकर सुमति को बड़ा दुख हुआ और पिता से कहने लगी कि हे पिताजी! मैं आपकी कन्या हूं। मैं आपके सब तरह से आधीन हूं। जैसी आपकी इच्छा हो वैसा ही करो। राजा, कुष्ठी अथवा और किसी के साथ, जैसी तुम्हारी इच्छा हो, मेरा विवाह कर सकते हो पर होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है मेरा तो इस पर पूर्ण विश्वास है।
मनुष्य जाने कितने मनोरथों का चिन्तन करता है, पर होता वही है जो भाग्य में विधाता ने लिखा है |जो जैसा करता है, उसको फल भी उस कर्म के अनुसार मिलता है, क्यों कि कर्म करना मनुष्य के आधीन है। पर फल दैव के आधीन है। जैसे अग्नि में पड़े तृणाति अग्नि को अधिक प्रदीप्त कर देते हैं उसी तरह अपनी कन्या के ऐसे निर्भयता से कहे हुए वचन सुनकर उस ब्राह्मण को अधिक क्रोध आया। तब उसने अपनी कन्या का एक कुष्ठी के साथ विवाह कर दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर पुत्री से कहने लगा कि जाओ- जाओ जल्दी जाओ, अपने कर्म का फल भोगो। देखें केवल भाग्य भरोसे पर रहकर तुम क्या करती हो?
इस प्रकार से कहे हुए पिता के कटु वचनों को सुनकर सुमति मन में विचार करने लगी कि - अहो! मेरा बड़ा दुर्भाग्य है जिससे मुझे ऐसा पति मिला। इस तरह अपने दुख का विचार करती हुई वह सुमति अपने पति के साथ वन चली गई और भयावने कुशयुक्त उस स्थान पर उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की। उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देखकर भगवती पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रकट होकर सुमति से कहने लगीं कि हे दीन ब्राह्मणी! मैं तुम पर प्रसन्न हूं, तुम जो चाहो वरदान मांग सकती हो। मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देने वाली हूं। इस प्रकार भगवती दुर्गा का वचन सुनकर ब्राह्मणी कहने लगी कि आप कौन हैं जो मुझ पर प्रसन्न हुई हैं, वह सब मेरे लिए कहो और अपनी कृपा दृष्टि से मुझ दीन दासी को कृतार्थ करो। ऐसा ब्राह्मणी का वचन सुनकर देवी कहने लगी कि मैं आदिशक्ति हूं और मैं ही ब्रह्मविद्या और सरस्वती हूं मैं प्रसन्न होने पर प्राणियों का दुख दूर कर उनको सुख प्रदान करती हूं। हे ब्राह्मणी! मैं तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूं।
तुम्हारे पूर्व जन्म का वृतान्त सुनाती हूं सुनो! तुम पूर्व जन्म में निषाद (भील) की स्त्री थी और अति पतिव्रता थी। एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की। चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और ले जाकर जेलखाने में कैद कर दिया। उन लोगों ने तेरे को और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया। इस प्रकार नवरात्रों के दिनों में तुमने न तो कुछ खाया और न ही जल ही पिया। इसलिए नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया। हे ब्राह्मणी! उन दिनों में जो व्रत हुआ उस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर तुम्हें मनवांछित वस्तु दे रही हूं। तुम्हारी जो इच्छा हो वह वरदान मांग लो।
इस प्रकार दुर्गा के कहे हुए वचन सुनकर ब्राह्मणी बोली कि अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे दुर्गे! आपको प्रणाम करती हूं। कृपा करके मेरे पति के कुष्ठ को दूर करो। देवी कहने लगी कि उन दिनों में जो तुमने व्रत किया था उस व्रत के एक दिन का पुण्य अपने पति का कुष्ठ दूर करने के लिए अर्पण करो | मेरे प्रभाव से तेरा पति कुष्ठ से रहित और सोने के समान शरीर वाला हो जायेगा।
ब्रह्मा जी बोले इस प्रकार देवी का वचन सुनकर वह ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और पति को निरोग करने की इच्छा से ठीक है, ऐसे बोली। तब उसके पति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कुष्ठहीन होकर अति कान्तियुक्त हो गया जिसकी कान्ति के सामने चन्द्रमा की कान्ति भी क्षीण हो जाती है | वह ब्राह्मणी पति की मनोहर देह को देखकर देवी को अति पराक्रम वाली समझ कर स्तुति करने लगी कि हे दुर्गे! आप दुर्गत को दूर करने वाली, तीनों जगत की सन्ताप हरने वाली, समस्त दुखों को दूर करने वाली, रोगी मनुष्य को निरोग करने वाली, प्रसन्न होने पर मनवांछित वस्तु को देने वाली और दुष्ट मनुष्य का नाश करने वाली हो। तुम ही सारे जगत की माता और पिता हो। हे अम्बे! मुझ अपराध रहित अबला की मेरे पिता ने कुष्ठी के साथ विवाह कर मुझे घर से निकाल दिया। घर से निकाली हुई मैं पृथ्वी पर घूमने लगी। आपने ही मेरा इस आपत्ति रूपी समुद्र से उद्धार किया है। हे देवी! आपको प्रणाम करती हूं। मुझ दीन की रक्षा कीजिए।
ब्रह्माजी बोले- हे बृहस्पते! इसी प्रकार उस सुमति ने मन से देवी की बहुत स्तुति की, उससे हुई स्तुति सुनकर देवी को बहुत सन्तोष हुआ और ब्राह्मणी से कहने लगी कि हे ब्राह्मणी! तुम्हे उदालय नाम का अति बुद्धिमान, धनवान, कीर्तिवान और जितेन्द्रिय पुत्र शीघ्र होगा। ऐसे कहकर वह देवी उस ब्राह्मणी से फिर कहने लगी कि हे ब्राह्मणी और जो कुछ तेरी इच्छा हो वही मनवांछित वस्तु मांग सकती है ऐसा भवगती दुर्गा का वचन सुनकर सुमति बोली कि हे भगवती दुर्गे अगर आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मुझे नवरात्रि व्रत विधि बतलाइये। हे दयावन्ती! जिस विधि से नवरात्र व्रत करने से आप प्रसन्न होती हैं उस विधि और उसके फल को मेरे लिए विस्तार से वर्णन कीजिए।
इस प्रकार ब्राह्मणी के वचन सुनकर देवी दुर्गा कहने लगी ,हे ब्राह्मणी! मैं तुम्हारे लिए सम्पूर्ण पापों को दूर करने वाली नवरात्र व्रत विधि को बतलाती हूं जिसको सुनने से तमाम पापों से छूटकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।चैत्र और आश्विन मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक विधि पूर्वक व्रत करे | यदि दिन भर का व्रत न कर सके तो एक समय भोजन करे। पढ़े लिखे ब्राह्मणों से पूछकर कलश स्थापना करें और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सींचे। महाकाली, महालक्ष्मी और महा सरस्वती इनकी मूर्तियां बनाकर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करे और पुष्पों से विधि पूर्वक अर्ध्य दें। बिजौरा के फूल से अर्ध्य देने से रूप की प्राप्ति होती है। जायफल से कीर्ति, दाख (किसमिस) से कार्य की सिद्धि होती है। आंवले से सुख और केले से आभूषण की प्राप्ति होती है। इस प्रकार फलों से अर्ध्य देकर यथा विधि हवन करें। खांड, घी, गेहूं, शहद, जौ, तिल, विल्व, नारियल, दाख और कदम्ब, इनसे हवन करें | गेहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। खीर व चम्पा के पुष्पों से धन और पत्तों से तेज और सुख की प्राप्ति होती है। आंवले से कीर्ति और केले से पुत्र होता है। कमल से राज सम्मान और दाखों से सुख सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। खांड , घी, नारियल, जौ और तिल से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है। व्रत करने वाला मनुष्य इस विधान से होम कर आचार्य को अत्यन्त नम्रता से प्रणाम करे और व्रत की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दे। इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इन नौ दिनों में जो कुछ दान आदि दिया जाता है, उसका करोड़ों गुना मिलता है। इस नवरात्र के व्रत करने से ही अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। हे ब्राह्मणी! इस सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले उत्तम व्रत को तीर्थ मंदिर अथवा घर में ही विधि के अनुसार करें।
ब्रह्मा जी बोले- हे बृहस्पते! इस प्रकार ब्राह्मणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अंतर्ध्यान हो गई। जो मनुष्य या स्त्री इस व्रत को भक्तिपूर्वक करता है वह इस लोक में सुख पाकर अन्त में दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त होता हे। हे बृहस्पते! यह दुर्लभ व्रत का माहात्म्य मैंने तुम्हारे लिए बतलाया है।
बृहस्पति जी कहने लगे- हे ब्रह्मा जी ! आपने मुझ पर अति कृपा की, जो अमृत के समान इस नवरात्र व्रत का माहात्म्य सुनाया। हे प्रभु! आपके बिना और कौन इस माहात्म्य को सुना सकता है? ऐसे बृहस्पति जी के वचन सुनकर ब्रह्मा जी बोले- हे बृहस्पते! तुमने सब प्राणियों का हित करने वाले इस अलौकिक व्रत को पूछा है इसलिए तुम धन्य हो। यह भगवती शक्ति सम्पूर्ण लोकों का पालन करने वाली है, इस महादेवी के प्रभाव को कौन जान सकता है।
प्रातः काल उठकर स्नान करके, मन्दिर में जाकर या घर पर ही नवरात्रों में दुर्गा जी का ध्यान करके यह कथा पढ़नी चाहिए। कन्याओं के लिए यह व्रत विशेष फलदायक है। श्री जगदम्बा की कृपा से सब विघ्न दूर होते हैं। कथा के अन्त में बारम्बार ‘दुर्गा माता तेरी सदा ही जय हो’ का उच्चारण करें।
कथा प्रारम्भ
बृहस्पति जी बोले- हे ब्राह्मण। आप अत्यन्त बुद्धिमान, सर्वशास्त्र और चारों वेदों को जानने वालों में श्रेष्ठ हो। हे प्रभु! कृपा कर मेरा वचन सुनो। नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों किया जाता है? हे भगवान! इस व्रत का फल क्या है? किस प्रकार करना उचित है? और पहले इस व्रत को किसने किया? सो विस्तार से कहो?
बृहस्पति जी का ऐसा प्रश्न सुनकर ब्रह्मा जी कहने लगे कि हे बृहस्पते! प्राणियों का हित करने की इच्छा से तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया। जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेवी, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं, यह नवरात्र व्रत सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इसके करने से पुत्र चाहने वाले को पुत्र, धन चाहने वाले को धन, विद्या चाहने वाले को विद्या और सुख चाहने वाले को सुख मिल सकता है। इस व्रत को करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाता है और कारागार हुआ मनुष्य बन्धन से छूट जाता है। मनुष्य की तमाम आपत्तियां दूर हो जाती हैं और उसके घर में सम्पूर्ण सम्पत्तियां आकर उपस्थित हो जाती हैं। बन्ध्या को इस व्रत के करने से पुत्र उत्पन्न होता है। समस्त पापों को दूर करने वाले इस व्रत के करने से ऐसा कौन सा मनोबल है जो सिद्ध नहीं हो सकता। जो मनुष्य अलभ्य मनुष्य देह को पाकर भी नवरात्र का व्रत नहीं करता वह माता-पिता से हीन हो जाता है अर्थात् उसके माता-पिता मर जाते हैं और अनेक दुखों को भोगता है। उसके शरीर में कुष्ठ हो जाता है और अंग से हीन हो जाता है | उसके सन्तानोत्पत्ति नहीं होती है। इस प्रकार वह मूर्ख अनेक दुख भोगता है। इस व्रत को न करने वला निर्दयी मनुष्य धन और धान्य से रहित हो, भूख और प्यास के मारे पृथ्वी पर घूमता है और गूंगा हो जाता है। जो स्त्री इस व्रत को नहीं करतीं वह पति हीन होकर नाना प्रकार के दुखों को भोगती हैं। यदि व्रत करने वाला मनुष्य सारे दिन का उपवास न कर सके तो एक समय भोजन करे और उस दिन बान्धवों सहित नवरात्र व्रत की कथा करे।
हे बृहस्पते! जिसने पहले इस व्रत को किया है उसका पवित्र इतिहास मैं तुम्हें सुनाता हूं। तुम सावधान होकर सुनो। इस प्रकार ब्रह्मा जी का वचन सुनकर बृहस्पति जी बोले- हे ब्राह्मण! मनुष्यों का कल्याण करने वाले इस व्रत के इतिहास को मेरे लिए कहो मैं सावधान होकर सुन रहा हूं। आपकी शरण में आए हुए मुझ पर कृपा करो।
ब्रह्मा जी बोले- पीठत नाम के मनोहर नगर में एक अनाथ नाम का ब्राह्मण रहता था। वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके सम्पूर्ण सद्गुणों से युक्त, मानो ब्रह्मा की सबसे पहली रचना हो, ऐसी सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दर पुत्री उत्पन्न हुई। वह कन्या सुमति अपने घर के बालकपन में अपनी सहेलियों के साथ क्रीड़ा करती हुई इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की कला बढ़ती है। उसका पिता प्रतिदिन दुर्गा की पूजा और होम करता था। उस समय वह भी नियम से वहां उपस्थित होती थी। एक दिन वह सुमति अपनी सखियों के साथ खेलने लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई। उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और पुत्री से कहने लगा कि हे दुष्ट पुत्री! आज प्रभात से तुमने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मैं किसी कुष्ठी और दरिद्री मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूंगा।
इस प्रकार कुपित पिता के वचन सुनकर सुमति को बड़ा दुख हुआ और पिता से कहने लगी कि हे पिताजी! मैं आपकी कन्या हूं। मैं आपके सब तरह से आधीन हूं। जैसी आपकी इच्छा हो वैसा ही करो। राजा, कुष्ठी अथवा और किसी के साथ, जैसी तुम्हारी इच्छा हो, मेरा विवाह कर सकते हो पर होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है मेरा तो इस पर पूर्ण विश्वास है।
मनुष्य जाने कितने मनोरथों का चिन्तन करता है, पर होता वही है जो भाग्य में विधाता ने लिखा है |जो जैसा करता है, उसको फल भी उस कर्म के अनुसार मिलता है, क्यों कि कर्म करना मनुष्य के आधीन है। पर फल दैव के आधीन है। जैसे अग्नि में पड़े तृणाति अग्नि को अधिक प्रदीप्त कर देते हैं उसी तरह अपनी कन्या के ऐसे निर्भयता से कहे हुए वचन सुनकर उस ब्राह्मण को अधिक क्रोध आया। तब उसने अपनी कन्या का एक कुष्ठी के साथ विवाह कर दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर पुत्री से कहने लगा कि जाओ- जाओ जल्दी जाओ, अपने कर्म का फल भोगो। देखें केवल भाग्य भरोसे पर रहकर तुम क्या करती हो?
इस प्रकार से कहे हुए पिता के कटु वचनों को सुनकर सुमति मन में विचार करने लगी कि - अहो! मेरा बड़ा दुर्भाग्य है जिससे मुझे ऐसा पति मिला। इस तरह अपने दुख का विचार करती हुई वह सुमति अपने पति के साथ वन चली गई और भयावने कुशयुक्त उस स्थान पर उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की। उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देखकर भगवती पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रकट होकर सुमति से कहने लगीं कि हे दीन ब्राह्मणी! मैं तुम पर प्रसन्न हूं, तुम जो चाहो वरदान मांग सकती हो। मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देने वाली हूं। इस प्रकार भगवती दुर्गा का वचन सुनकर ब्राह्मणी कहने लगी कि आप कौन हैं जो मुझ पर प्रसन्न हुई हैं, वह सब मेरे लिए कहो और अपनी कृपा दृष्टि से मुझ दीन दासी को कृतार्थ करो। ऐसा ब्राह्मणी का वचन सुनकर देवी कहने लगी कि मैं आदिशक्ति हूं और मैं ही ब्रह्मविद्या और सरस्वती हूं मैं प्रसन्न होने पर प्राणियों का दुख दूर कर उनको सुख प्रदान करती हूं। हे ब्राह्मणी! मैं तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूं।
तुम्हारे पूर्व जन्म का वृतान्त सुनाती हूं सुनो! तुम पूर्व जन्म में निषाद (भील) की स्त्री थी और अति पतिव्रता थी। एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की। चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और ले जाकर जेलखाने में कैद कर दिया। उन लोगों ने तेरे को और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया। इस प्रकार नवरात्रों के दिनों में तुमने न तो कुछ खाया और न ही जल ही पिया। इसलिए नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया। हे ब्राह्मणी! उन दिनों में जो व्रत हुआ उस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर तुम्हें मनवांछित वस्तु दे रही हूं। तुम्हारी जो इच्छा हो वह वरदान मांग लो।
इस प्रकार दुर्गा के कहे हुए वचन सुनकर ब्राह्मणी बोली कि अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे दुर्गे! आपको प्रणाम करती हूं। कृपा करके मेरे पति के कुष्ठ को दूर करो। देवी कहने लगी कि उन दिनों में जो तुमने व्रत किया था उस व्रत के एक दिन का पुण्य अपने पति का कुष्ठ दूर करने के लिए अर्पण करो | मेरे प्रभाव से तेरा पति कुष्ठ से रहित और सोने के समान शरीर वाला हो जायेगा।
ब्रह्मा जी बोले इस प्रकार देवी का वचन सुनकर वह ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और पति को निरोग करने की इच्छा से ठीक है, ऐसे बोली। तब उसके पति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कुष्ठहीन होकर अति कान्तियुक्त हो गया जिसकी कान्ति के सामने चन्द्रमा की कान्ति भी क्षीण हो जाती है | वह ब्राह्मणी पति की मनोहर देह को देखकर देवी को अति पराक्रम वाली समझ कर स्तुति करने लगी कि हे दुर्गे! आप दुर्गत को दूर करने वाली, तीनों जगत की सन्ताप हरने वाली, समस्त दुखों को दूर करने वाली, रोगी मनुष्य को निरोग करने वाली, प्रसन्न होने पर मनवांछित वस्तु को देने वाली और दुष्ट मनुष्य का नाश करने वाली हो। तुम ही सारे जगत की माता और पिता हो। हे अम्बे! मुझ अपराध रहित अबला की मेरे पिता ने कुष्ठी के साथ विवाह कर मुझे घर से निकाल दिया। घर से निकाली हुई मैं पृथ्वी पर घूमने लगी। आपने ही मेरा इस आपत्ति रूपी समुद्र से उद्धार किया है। हे देवी! आपको प्रणाम करती हूं। मुझ दीन की रक्षा कीजिए।
ब्रह्माजी बोले- हे बृहस्पते! इसी प्रकार उस सुमति ने मन से देवी की बहुत स्तुति की, उससे हुई स्तुति सुनकर देवी को बहुत सन्तोष हुआ और ब्राह्मणी से कहने लगी कि हे ब्राह्मणी! तुम्हे उदालय नाम का अति बुद्धिमान, धनवान, कीर्तिवान और जितेन्द्रिय पुत्र शीघ्र होगा। ऐसे कहकर वह देवी उस ब्राह्मणी से फिर कहने लगी कि हे ब्राह्मणी और जो कुछ तेरी इच्छा हो वही मनवांछित वस्तु मांग सकती है ऐसा भवगती दुर्गा का वचन सुनकर सुमति बोली कि हे भगवती दुर्गे अगर आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मुझे नवरात्रि व्रत विधि बतलाइये। हे दयावन्ती! जिस विधि से नवरात्र व्रत करने से आप प्रसन्न होती हैं उस विधि और उसके फल को मेरे लिए विस्तार से वर्णन कीजिए।
इस प्रकार ब्राह्मणी के वचन सुनकर देवी दुर्गा कहने लगी ,हे ब्राह्मणी! मैं तुम्हारे लिए सम्पूर्ण पापों को दूर करने वाली नवरात्र व्रत विधि को बतलाती हूं जिसको सुनने से तमाम पापों से छूटकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।चैत्र और आश्विन मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक विधि पूर्वक व्रत करे | यदि दिन भर का व्रत न कर सके तो एक समय भोजन करे। पढ़े लिखे ब्राह्मणों से पूछकर कलश स्थापना करें और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सींचे। महाकाली, महालक्ष्मी और महा सरस्वती इनकी मूर्तियां बनाकर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करे और पुष्पों से विधि पूर्वक अर्ध्य दें। बिजौरा के फूल से अर्ध्य देने से रूप की प्राप्ति होती है। जायफल से कीर्ति, दाख (किसमिस) से कार्य की सिद्धि होती है। आंवले से सुख और केले से आभूषण की प्राप्ति होती है। इस प्रकार फलों से अर्ध्य देकर यथा विधि हवन करें। खांड, घी, गेहूं, शहद, जौ, तिल, विल्व, नारियल, दाख और कदम्ब, इनसे हवन करें | गेहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। खीर व चम्पा के पुष्पों से धन और पत्तों से तेज और सुख की प्राप्ति होती है। आंवले से कीर्ति और केले से पुत्र होता है। कमल से राज सम्मान और दाखों से सुख सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। खांड , घी, नारियल, जौ और तिल से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है। व्रत करने वाला मनुष्य इस विधान से होम कर आचार्य को अत्यन्त नम्रता से प्रणाम करे और व्रत की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दे। इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इन नौ दिनों में जो कुछ दान आदि दिया जाता है, उसका करोड़ों गुना मिलता है। इस नवरात्र के व्रत करने से ही अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। हे ब्राह्मणी! इस सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले उत्तम व्रत को तीर्थ मंदिर अथवा घर में ही विधि के अनुसार करें।
ब्रह्मा जी बोले- हे बृहस्पते! इस प्रकार ब्राह्मणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अंतर्ध्यान हो गई। जो मनुष्य या स्त्री इस व्रत को भक्तिपूर्वक करता है वह इस लोक में सुख पाकर अन्त में दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त होता हे। हे बृहस्पते! यह दुर्लभ व्रत का माहात्म्य मैंने तुम्हारे लिए बतलाया है।
बृहस्पति जी कहने लगे- हे ब्रह्मा जी ! आपने मुझ पर अति कृपा की, जो अमृत के समान इस नवरात्र व्रत का माहात्म्य सुनाया। हे प्रभु! आपके बिना और कौन इस माहात्म्य को सुना सकता है? ऐसे बृहस्पति जी के वचन सुनकर ब्रह्मा जी बोले- हे बृहस्पते! तुमने सब प्राणियों का हित करने वाले इस अलौकिक व्रत को पूछा है इसलिए तुम धन्य हो। यह भगवती शक्ति सम्पूर्ण लोकों का पालन करने वाली है, इस महादेवी के प्रभाव को कौन जान सकता है।
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