Monday, November 26, 2012

आज मंगलवार है महावीर का वार है

आज मंगलवार है महावीर का वार है, ये सच्चा दरबार है .
सच्चे  मन सो जो कोइ ध्यावे उसका बेड़ा पार है .

चेत सुदी पूनम मंगल को  जन्म वीर ने पाया है, जन्म वीर ने पाया है,
लाल लंगोट गदा हाथ है, सिर पर मुकुट सजाया है, सिर पर मुकुट सजाया है
शंकर का अवतार है, महावीर का वार है,

सच्चे  मन सो जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है.
आज मंगलवार है, महावीर का वार है, यह सच्चा दरबार है…

ब्रह्माजी के ब्रह्म ज्ञान का फल भी तुम ने पाया है, फल भी तुमने पाया है
राम काज शिव शंकर ने वानर रूपी अवतार  लिया है, वानर रूपी अवतार लिया है
लीला अपारम्पार है, महावीर का वार है,

सच्चे  मन सो जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है
आज मंगलवार है, महावीर का वार है, यह सच्चा दरबार है

बालापन में महावीर ने हरदम ध्यान लगाया है, हरदम ध्यान लगाया है
शरण दिया ऋषियों को  तुम को, ब्रह्म का ध्यान लगाया है, ब्रह्म का ध्यान लगाया है
राम नाम तो अपार  है, महावीर का वार है

सच्चे  मन से जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है
आज मंगलवार है, महावीर का वार है, यह  सच्चा दरबार है

राम जन्म जब हुआ अयोध्या, कैसा नाच नचाया है, कैसा नाच नचाया है
कहा राम ने लक्ष्मण से, यह वानर मन को भाया है वानर मन को भाया है
राम चरण से प्यार है महावीर का वार है

सच्चे  मन जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है
आज मंगलवार है, महावीर का वार है, यह सच्चा दरबार है

पंचवटी से माता को जब रावण लेकर आया है, रावण लेकर आया है
लंका में जाकर तुम ने माता का पता लगाया है, माता का पता लगाया है
अक्षय का संहार  है, महावीर का वार है,

सच्चे  मन से जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है
आज मंगलवार है, महावीर का वार है, यह सच्चा दरबार है

मेघनाथ ने ब्रह्म पाश में तुमको आन फँसाया है, तुमको आन फँसाया है
ब्रह्मपाश फँस  ब्रह्माजी तुमने  मान बढ़ाया है,ब्रह्मा का मान बढ़ाया है,
बजरंगी  की मार है, महावीर का वार है,

सच्चे  मन सो जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है,
आज मंगलवार है, महावीर का वार है, यह सच्चा दरबार है

लंका जलाई तुमने तब  रावण भी घबराया है, तब  रावण भी घबराया है
राम लखन को वापस आ माँ का संदेश सुनाया है, माँ का संदेश सुनाया है
सीता को शोक  अपार है, महावीर का वार है,

सच्चे  मन सो जो कोई ध्यावे  उसका बेड़ा पार है
आज मंगलवार है, महावीर का वार है,यह सच्चा दरबार है

 

Friday, November 23, 2012

शनैश्चर स्तवराज

 शनैश्चर स्तवराज

शनि के कोप से बचने के लिये ही शास्त्रों में दोपहर में शनि पूजा कर शनैश्चर स्तवराज का पाठ बहुत असरदार माना गया है। विशेष तौर पर शनि दशा में यह शनि को अनुकूल बनाता है। अगर आप शनि दशा से गुजर रहे हैं या शनि दशा लगने वाली हो तो नीचे लिखी सरल विधि से शनि पूजा और मंत्र स्तुति करें - शनिवार के दिन दोपहर में शनि मंदिर में शनि प्रतिमा को गंध, तिल का तेल, काले तिल, उड़द, काला कपड़ा व तेल से बने व्यजंन चढ़ाकर नीचे लिखे शनैश्चर स्तवराज का पाठ करें -

ध्यात्वा गणपतिं राजा धर्मराजो युधिष्ठिरः।
धीरः शनैश्चरस्येमं चकार स्तवमुत्तमम।।
शिरो में भास्करिः पातु भालं छायासुतोवतु।
कोटराक्षो दृशौ पातु शिखिकण्ठनिभः श्रुती ।।
घ्राणं मे भीषणः पातु मुखं बलिमुखोवतु।
स्कन्धौ संवर्तकः पातु भुजौ मे भयदोवतु ।।
सौरिर्मे हृदयं पातु नाभिं शनैश्चरोवतु ।
ग्रहराजः कटिं पातु सर्वतो रविनन्दनः ।।
पादौ मन्दगतिः पातु कृष्णः पात्वखिलं वपुः ।
रक्षामेतां पठेन्नित्यं सौरेर्नामबलैर्युताम।।
सुखी पुत्री चिरायुश्च स भवेन्नात्र संशयः ।
सौरिः शनैश्चरः कृष्णो नीलोत्पलनिभः शन।।
शुष्कोदरो विशालाक्षो र्दुनिरीक्ष्यो विभीषणः ।
शिखिकण्ठनिभो नीलश्छायाहृदयनन्दनः ।।
कालदृष्टिः कोटराक्षः स्थूलरोमावलीमुखः ।
दीर्घो निर्मांसगात्रस्तु शुष्को घोरो भयानकः ।।
नीलांशुः क्रोधनो रौद्रो दीर्घश्मश्रुर्जटाधरः।
मन्दो मन्दगतिः खंजो तृप्तः संवर्तको यमः ।।
ग्रहराजः कराली च सूर्यपुत्रो रविः शशी ।
कुजो बुधो गुरूः काव्यो भानुजः सिंहिकासुत।।
केतुर्देवपतिर्बाहुः कृतान्तो नैऋतस्तथा।
शशी मरूत्कुबेरश्च ईशानः सुर आत्मभूः ।।
विष्णुर्हरो गणपतिः कुमारः काम ईश्वरः।
कर्ता हर्ता पालयिता राज्यभुग् राज्यदायकः ।।
छायासुतः श्यामलाङ्गो धनहर्ता धनप्रदः।
क्रूरकर्मविधाता च सर्वकर्मावरोधकः ।।
तुष्टो रूष्टः कामरूपः कामदो रविनन्दनः ।
ग्रहपीडाहरः शान्तो नक्षत्रेशो ग्रहेश्वरः ।।
स्थिरासनः स्थिरगतिर्महाकायो महाबलः ।
महाप्रभो महाकालः कालात्मा कालकालकः ।।
आदित्यभयदाता च मृत्युरादित्यनंदनः।
शतभिद्रुक्षदयिता त्रयोदशितिथिप्रियः ।।
तिथ्यात्मा तिथिगणनो नक्षत्रगणनायकः ।
योगराशिर्मुहूर्तात्मा कर्ता दिनपतिः प्रभुः ।।
शमीपुष्पप्रियः श्यामस्त्रैलोक्याभयदायकः ।
नीलवासाः क्रियासिन्धुर्नीलाञ्जनचयच्छविः ।।
सर्वरोगहरो देवः सिद्धो देवगणस्तुतः।
अष्टोत्तरशतं नाम्नां सौरेश्छायासुतस्य यः ।।
पठेन्नित्यं तस्य पीडा समस्ता नश्यति ध्रुवम् ।
कृत्वा पूजां पठेन्मर्त्यो भक्तिमान्यः स्तवं सदा ।।
विशेषतः शनिदिने पीडा तस्य विनश्यति।
जन्मलग्ने स्थितिर्वापि गोचरे क्रूरराशिगे ।।
दशासु च गते सौरे तदा स्तवमिमं पठेत् ।
पूजयेद्यः शनिं भक्त्या शमीपुष्पाक्षताम्बरैः ।।
विधाय लोहप्रतिमां नरो दुःखाद्विमुच्यते ।
वाधा यान्यग्रहाणां च यः पठेत्तस्य नश्यति ।।
भीतो भयाद्विमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
रोगी रोगाद्विमुच्येत नरः स्तवमिमं पठेत् ।।
पुत्रवान्धनवान् श्रीमान् जायते नात्र संशयः ।।
स्तवं निशम्य पार्थस्य प्रत्यक्षोभूच्छनैश्चरः ।
दत्त्वा राज्ञे वरः कामं शनिश्चान्तर्दधे तदा ।।

Thursday, November 15, 2012

श्री संकटमोचन हनुमानाष्टक

श्री संकटमोचन हनुमानाष्टक हिन्दी अर्थ सहित

बाल समय रबि भक्षि लियो तब, तीनहुँ लोक भयो अँधियारो।
ताहि सो त्रास भयो जग को, यह संकट काहुँ सो जात न टारो।
देवन आनि क
री बिनती तब, छाँड़ि दियो रवि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जग मे कपि, संकट मोचन नाम तिहारो॥१॥

अर्थ - हे हनुमान जी ! आप बालक थे तब आपने सूर्य को अपने मूख मे रख लिया जिससे तीनो लोकों मे अँधेरा हो गया। इससे संसार भर मे विपति छा गई, और उस संकट को कोई भी दूर नही कर सका। देवताओं ने आकर आपकी विनती की और आपने सूर्य को मुक्त कर दिया। इस प्रकार संकट दूर हुआ। हे हनुमान जी, संसार में ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नहीं जानता।

बालि की त्रास कपीस बसै गिरि, जात महा प्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महामुनि साप दियो तब, चाहिए कौन बिचार बिचारो।
कै द्विज रुप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो॥२॥

अर्थ - बालि के डर से सुग्रीव पर्वत पर रहते थे। उन्होनें श्री रामचन्द्रजी को आते देखा, उन्होनें आपको पता लगा के लिए भेजा। आपने अपना ब्राह्मण का रुप धर कर के श्री रामचन्द्र जी से भेंट की और उनको अपने साथ लिवा लाये, जिससे आपने सुग्रीव के शोक का निवारण किया। हे, हनुमानजी, संसार मे ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नहीं जानता।

अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सों जु, बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो।
हेरि थके तट सिंधु सबै तब, लाए सिया सुधि प्रान उबारो।
को नही जानत है, जग मे कपि संकट मोचन नाम तिहारो॥३॥

अर्थ- सुग्रीव ने अंगद के साथ सीता जी की खोज के लिए अपनी सेना को भेजते समय कह दिया था कि यदि सीता जी का पता लगाकर नही लाए तो हम तुम सब को मार डालेंगे। सब ढ़ूँढ़ ढ़ूँढ़कर हार गये। तब आप समुद्र के तट से कूद कर सीता जी का पता लगाकर लाये, जिससे सबके प्राण बचे। हे हनुमान जी संसार मे ऐसा कौन है, जो आपका संकट मोचन नाम नही जानता।

रावण त्रास दई सिय को सब, राक्षसि सो कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु , जाय महा रजनीचर मारो।
चाहत सिय अशोक सों आगि सु, दै प्रभु मुद्रिका शोक निवारो।
को नहीं जानत हैं, जग मे कपि संकट मोचन नाम तिहारो॥४॥

अर्थ - जब रावण ने श्री सीता जी को भय दिखाया और कष्ट दिया और सब राक्षसियों से कहा कि सीता जी को मनावें, हे महावीर हनुमानजी, उस समय आपने पहुँच कर महान राक्षसों को मारा। सीता जी ने अशोक वृक्ष से अग्नि माँगी परन्तु आपने उसी वृक्ष पर से श्री रामचन्द्रजी कि अँगूठी डाल दी जिससे सीता जी कि चिन्ता दूर हुई। हे हनुमान जी,संसार मे ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नही जानता।

बान लग्यो उर लक्षिमण के तब, प्राण तजे सुत रावन मारो।
लै गृह वैद्य सुषेन समेत, तबै गृह द्रोन सु बीर उपारो।
आनि सजीवन हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्रान उबारो।
को नहिं जानत हैं जग मे कपि संकट मोचन नाम तिहारो॥५॥

अर्थ - रावन के पुत्र मेघनाद ने बाण मारा जो लक्ष्मण जी की छाती पर लगा और उससे उनके प्राण संकट मे पड़ गए। तब आपही सुषेन वैद्य को घर सहित उठा लाए और द्रोणाचल पर्वत सहित संजीवनी बूटी ले आये जिससे लक्ष्मण जी के प्राण बच गये। हे हनुमान जी,संसार मे ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नही जानता।

रावन जुद्ध अजान कियो तब, नाग की फाँस सबै सिर डारो।
श्री रघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो।
आनि खगेस तबै हनुमान जु, बन्धन काटि सुत्रास निवारो।
को नहि जानत है जग मे कपि,संकट मोचन नाम तिहारो॥६॥

अर्थ - रावण ने घोर युद्ध करते हुए सबको नागपाश मे बाँध लिया तब श्री रघुनाथ सहित सारे दल मे यह मोह छा गया की यह तो बहुत भारी संकट है। उस समय, हे हनुमान जी आपने गरुड़ जी को लाकर बँधन को कटवा दिया जिससे संकट दूर हुआ। हे हनुमान जी,संसार मे ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नही जानता।

बंधु समेत जबै अहिरावण, लै रघुनाथ पाताल सिधारो।
देविहिं पूजि भली विधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो।
जाय सहाय भयो तब ही, अहिरावन सैन्य समेत संहारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकट मोचन नाम तिहारो॥७॥

अर्थ - अब अहिरावन श्री रघुनाथ जी को लक्षमण सहित पाताल को ले गया, और भलिभांति देवि जी की पूजा करके सबके परामर्श से यह निशचय किया कि इन दोनों भाइयों की बलि दूंगा, उसी समय आपने वहाँ पहुंच कर अहिरावन को उसकी सेना समेत मार डाला। हे हनुमानजी, संसार मे ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नहीं जानता॥

काज किए बड़ देवन के तुम, बीर महाप्रभु बेखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसो नहिं जात है टारो।
बेगि हरौ हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥८॥

अर्थ - हे महाबीर आपने बड़े बड़े देवों के कार्य संवारे है। अब आप देखिये और सोचीए कि मुझ दीन हीन का ऐसा कौन सा संकट है जिसको आप दुर नहीं कर सकते। हे महाबीर हनुमानजी, हमारा जो कुछ भी संकट हो आप उसे शीघ्र ही दूर कर दीजीए। हे हनुमानजी, संसार में ऐसा कौन है जो आपका संकट मोचन नाम नहीं जानता।

॥दोहा॥

लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर।
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥

अर्थ- आपका शरीर लाल है, आपकी पूँछ लाल है और आपने लाल सिंदूर धारण कर रखा है, आपके वस्त्र भी लाल है। आपका शरीर बज्र है, और आप दुष्टों का नाश कर देते है। हे हनुमानजी आपकी जय हो, जय हो, जय हो॥

Tuesday, October 30, 2012

श्री खंड महादेव यात्रा




श्री खंड महादेव यात्रा

देवभूमि हिमाचल प्रदेश देवी-देवताओं की भूमि है। यहां पर कई धार्मिक धाम हैं। कई प्रकार की वार्षिक यात्राएं होती हैं। कई यात्राएं तो काफी प्रचलित हो चुकी हैं परन्तु कई यात्राएं असुविधा और प्रचार नहीं होने के कारण बहुत ही कम धर्म प्रेमी लोग उनके बारे में जान पाते हैं। इनमें से एक यात्रा प्रभु शंकर जी की श्री खंड महादेव कैलाश यात्रा है जो श्रावण मास में शुरू होती है और लगभग 10 दिन की यात्रा में हजारों लोग 70 फुट ऊंची शंकर स्वरूप पिंडी के दर्शन करके पुण्य के भागी बनते हैं। हर साल  जुलाई से यात्रा का शुभारंभ होता  है |यह अत्यंत कठिन और साहसिक यात्रा है। इसे शारीरिक तौर पर स्वस्थ लोग ही कर पाते हैं।
                             श्री खंड महादेव की यात्रा हिमाचल के जिला कुल्लू के निरमंड इलाके से शुरू होती है परन्तु इसका प्रचलित मार्ग शिमला से रामपुर बुशहर होते हुए कुल्लू जिला की तहसील निरमंड में पहुंच जाता है। वहां से बागीपुल तक सड़क मार्ग से जाते हैं। बागीपुल से 7 किलोमीटर कच्ची सड़क से जांव तक पहुंचा जा सकता है। यहीं से२५ किलोमीटर की  पैदल यात्रा का शुभारंभ होता है। शिव भक्त शिव के जयकारे लगाते हुए प्रकृति की गोद में आगे बढ़ते चले जाते हैं। 3 किलोमीटर की दूरी तय करने पर पहले पड़ाव सिंह गाड नामक स्थल पर पहुंचा जाता है। जहां श्री खंड सेवा दल के सदस्य शिव भक्तों के इंतजार में सेवा के लिए तत्पर दिखाई देते हैं। यात्री विश्राम, रहने की व्यवस्था, भोजन और चाय पानी की प्रत्येक वस्तु का ध्यान रखा जाता है। रात के समय सेवा दल के सदस्यों द्वारा आनंदमय संकीर्तन का आयोजन भी किया जाता है।
              अगले दिन आगे की यात्रा आरंभ की जाती है। दूसरा पड़ाव थाचडू नामक स्थल आता है। अधिकतर यात्री यहीं विश्राम करते हैं। यहां भी सेवा दल के सदस्यों द्वारा शिव भक्तों के लिए प्रत्येक प्रबंध होता है। अगली सुबह नाश्ता  आदि करने के बाद भक्तजन तीसरे पड़ाव भीमद्वार के लिए जयकारों के साथ प्रस्थान करते हैं। भीमद्वार में रात्रि विश्राम की पूर्ण व्यवस्था होती है। भीमद्वार में ही बकासुर नामक स्थल है। कहते हैं कि पांडव जब अज्ञात वास के दौरान यहां से गुजर रहे थे तो उनका सामना बकासुर नामक राक्षस से हुआ। भीम ने उस राक्षस को जमीन पर पटक कर दे मारा था। जिस स्थल पर राक्षस को पटक कर मारा गया था वह स्थल आज भी लाल रंग का है और अंदर से निरंतर जलधारा प्रवाहित होती रहती है।रास्ते मे नैन सर स्थान आता है | कहते है जब भस्मासुर भगवान शिव पर हाथ रखने के आया तब पार्वती जी दर गयी थी | उनके आंसू निकाल आये और इन्ही आंसुओं से यह नैन सर झील बन गयी |
             भीमद्वार से यात्रा अगले दिन जल्द से जल्द शुरू करनी पड़ती है क्योंकि 7 किलोमीटर लम्बी यात्रा में ग्लेशियर और कठिन चढ़ाई को पार करने पर भोले शंकर के दर्शनीय स्थल पर पहुंचा जाता है। वहां पर शंकर जी के पूरे परिवार अर्थात प्रभु शंकर, मां पार्वती, गणेश जी और भगवान कार्तिकेय जी के पिंडी स्वरूप के दर्शन होते हैं। कहते हैं कि आसपास कितनी भी बर्फबारी हो लेकिन इस पिंडी पर जरा भी बर्फ नहीं टिक पाती। इस स्थल की ऊंचाई समुद्र स्थल से लगभग 19985 फुट की है।
              शिव भक्तों से निवेदन है कि इस यात्रा को यात्रा समझा जाए न कि मौज मस्ती और पिकनिक। अत्यंत सर्दी होने के कारण गर्म कपड़ों का विशेष ध्यान रखा जाए तथा पर्यावरण को साफ़  रखते हुए प्लास्टिक लिफाफों का बिल्कुल प्रयोग न करें। श्री कैलाश खंड महादेव यात्रा सच में एक सम्पूर्ण यात्रा है। इस यात्रा को करके भगवान शिव का आशीर्वाद लें और पुण्य के भागी बनें।

Monday, October 15, 2012

हनुमान जी की मूर्छा

हनुमान जी  की मूर्छा :
हनुमान जी जब पर्वत लेकर लौटते है तो भगवान से कहते है.प्रभु आपने मुझे संजीवनी
बूटी लेने नहीं भेजा था.आपने तो मुझे मेरी मूर्छा दूर करने के लिए भेजा था.
 "सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू"


अर्थात - हनुमान्‌जी ने पवित्र नाम का स्मरण करके श्री रामजी को अपने वश में कर रखा
है,प्रभु आज मेरा ये भ्रम टूट गया कि मै ही सबसे बड़ा भक्त,राम नाम का जप करने वाला
हूँ.भगवान बोले कैसे ?

हनुमान जी बोले - वास्तव में तो भरत जी संत है और उन्होंने ही राम नाम जपा है.आपको
पता है जब लक्ष्मण जी को शक्ति लगी तो मै संजीवनी लेने गया पर जब मुझे भरत जी ने
बाण मारा और मै गिरा,तो भरत जी ने, न तो संजीवनी मंगाई, न वैद्य  बुलाया. कितना भरोसा
है उन्हें आपके नाम पर, आपको पता है उन्होंने क्या किया.

"जौ मोरे मन बच अरू काया,प्रीति राम पद कमल अमाया"

तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला,जौ मो पर रघुपति अनुकूला

सुनत बचन उठि बैठ कपीसा ,कहि जय जयति कोसलाधीसा"


यदि मन वचन और शरीर से श्री राम जी के चरण कमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो तो यदि
रघुनाथ जी मुझ पर प्रसन्न हो तो यह वानर थकावट और पीड़ा से रहित हो जाए.यह वचन
सुनते हुई मै श्री राम, जय राम, जय-जय राम कहता हुआ उठ बैठा.
प्रभुजी , मै नाम तो आपका लेता हूँ पर
भरोसा भरत जी जैसा नहीं किया, वरना मै संजीवनी लेने क्यों जाता,

बस ऐसा ही हम करते है हम नाम तो भगवान का लेते है पर भरोसा नही करते,बुढ़ापे में
बेटा ही सेवा करेगा,बेटे ने नहीं की तो क्या होगा? उस समय हम भूल जाते है जिस
भगवान का नाम हम जप रहे है वे है न,पर हम भरोसा नहीं करते.बेटा सेवा करे न करे पर
भरोसा हम उसी पर करते है.


2. - दूसरी बात प्रभु ! बाण लगते ही मै गिरा, पर्वत नहीं गिरा, क्योकि पर्वत तो आप
उठाये हुए थे और मै अभिमान कर रहा था कि मै उठाये हुए हूँ.मेरा दूसरा अभिमान टूट
गया, इसी तरह हम भी यही सोच लेते है कि गृहस्थी के बोझ को मै उठाये हुए हूँ,पर असल मे सारा बोझ तो भगवान ही उठाते हैं .

3. - फिर हनुमान जी कहते है -और एक बात प्रभु ! आपके तरकस में भी ऐसा बाण नहीं है
जैसे बाण भरत जी के पास है.आपने सुबाहु मारीच को बाण से बहुत दूर गिरा दिया,आपका
बाण तो आपसे दूर गिरा देता है,पर भरत जी का बाण तो आपके चरणों में ला देता है.मुझे
बाण पर बैठाकर आपके पास भेज दिया.


भगवान बोले - हनुमान जब मैंने ताडका को मारा और भी राक्षसों को मारा, तो वे सब मरकर
मुक्त होकर मेरे ही पास तो आये,इस पर हनुमान जी बोले प्रभु आपका बाण तो मारने के
बाद सबको आपके पास लाता है पर भरत जी का बाण तो जिन्दा ही भगवान के पास ले आता
है.भरत जी संत है और संत का बाण क्या है? संत का बाण है उसकी वाणी लेकिन हम करते
क्या है,हम संत वाणी को समझते तो है पर सटकते नहीं है,और औषधि सटकने पर ही फायदा
करती है.



4. - हनुमान जी को भरत जी ने पर्वत सहित अपने बाण पर बैठाया तो उस समय हनुमान जी को
थोडा अभिमान हो गया कि मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा ? परन्तु जब उन्होंने रामचंद्र
जी के प्रभाव पर विचार किया तो वे भरत जी के चरणों की वंदना करके चले.


इसी तरह हम भी कभी-कभी संतो पर संदेह करते है,कि ये हमें कैसे भगवान तक पहुँचा
देगे, संत ही तो है जो हमें सोते से जागते है जैसे हनुमान जी को जगाया, क्योकि उनका
मन,वचन,कर्म सब भगवान में लगा है.अरे उन पर भरोसा तो करो तुम्हे तुम्हारे बोझ सहित
भगवान के चरणों तक पहुँचा देगे.




Friday, October 12, 2012

नवदुर्गा यानी दिव्य नौ औषधियाँ

नवदुर्गा यानी दिव्य नौ औषधियाँ

माँ जगदम्बा दुर्गा के नौ रूप मनुष्य को शांति, सुख, वैभव, निरोगी काया एवं भौतिक आर्थिक इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं। माँ अपने बच्चों को हर प्रकार का सुख प्रदान कर अपने आशीष की छाया में बैठाती है।
नवदुर्गा के नौ रूप औषधियों के रूप में भी कार्य करते हैं। यह नवरात्रि इसीलिए सेहत नवरात्रि के रूप में भी जानी जाती है। सर्वप्रथम इस पद्धति को मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया परंतु गुप्त ही रहा। भक्तों की जिज्ञासा की संतुष्टि करते हुए नौ दुर्गा के औषधि रूप दे रहे हैं। इस चिकित्सा प्रणाली के रहस्य को ब्रह्माजी ने अपने उपदेश में दुर्गाकवच कहा है। नौ प्रमुख दुर्गा का विवेचन किया है। ये नवदुर्गा वास्तव में दिव्य गुणों वाली नौ औषधियाँ हैं।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी,
तृतीयं चंद्रघण्टेति कुष्माण्डेती चतुर्थकम।।
पंचम स्कन्दमा‍तेति षष्ठमं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौ‍र‍ीति चाष्टम।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता।

ये औषधियाँ प्राणियों के समस्त रोगों को हरने वाली और रोगों से बचाए रखने के लिए कवच का काम करने वाली है। ये समस्त प्राणियों की पाँचों ज्ञानेंद्रियों व पाँचों कमेंद्रियों पर प्रभावशील है। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष की आयु भोगता है।
ये आराधना मनुष्य विशेषकर नौरात्रि, चैत्रीय एवं अगहन (क्वार) में करता है। इस समस्त देवियों को रक्त में विकार पैदा करने वाले सभी रोगाणुओं को काल कहा जाता है।




भय दूर करती है शैलपुत्री :
प्रथम शैलपुत्री (हरड़)- प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। इस भगवती देवी शैलपुत्री को हिमावती हरड़ कहते हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है जो सात प्रकार की होती है।
हरीतिका (हरी) जो भय को हरने वाली है। 
पथया - जो हित करने वाली है।
कायस्थ - जो शरीर को बनाए रखने वाली है।
अमृता - अमृत के समान
हेमवती - हिमालय पर होने वाली।
चेतकी - जो चित्त को प्रसन्न करने वाली है।
श्रेयसी (यशदाता) शिवा - कल्याण करने वाली।


स्मरण शक्ति को बढ़ाती है ब्रह्मचारिणी : द्वितीय ब्रह्मचारिणी (ब्राह्मी) - दुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी को ब्राह्मी कहा है। ब्राह्मी आयु को बढ़ाने वाली स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर विकारों को नाश करने के साथ-साथ स्वर को मधुर करने वाली है। ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा जाता है।
क्योंकि यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है। यह वायु विकार और मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति ने ब्रह्मचारिणी की आराधना करना चाहिए।


हृदय रोग ठीक करती है देवी चंद्रिका : तृतीय चंद्रघंटा (चन्दुसूर) - दुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे चनदुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। (इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है। ये कल्याणकारी है। इस औषधि से मोटापा दूर होता है। इसलिए इसको चर्महन्ती भी कहते हैं। शक्ति को बढ़ाने वाली, खत को शुद्ध करने वाली एवं हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है।अत: इस बीमारी से संबंधित रोगी ने चंद्रघंटा की पूजा करना चाहिए।



रक्त विकार को ठीक करती हैं कुष्माण्डा : चतुर्थ कुष्माण्डा (पेठा) - दुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। ये औषधि से पेठा मिठाई बनती है। इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। इसे कुम्हडा भी कहते हैं। यह कुम्हड़ा पुष्टिकारक वीर्य को बल देने वाला (वीर्यवर्धक) व रक्त के विकार को ठीक करता है एवं पेट को साफ करता है। मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत है। यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है। कुम्हड़ा रक्त पित्त एवं गैस को दूर करता है। यह दो प्रकार की होती है। इन बीमारी से पीड़ित व्यक्ति ने पेठा का उपयोग के साथ कुष्माण्डा देवी की आराधना करना चाहिए।



कफ रोगों का नाश करती हैं स्कंदमाता : पंचम स्कंदमाता (अलसी) - दुर्गा का पाँचवा रूप स्कंद माता है। इसे पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी के रूप में जानी जाती है। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है।
अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा।अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।।उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति ने स्कंदमाता की आराधना करना चाहिए



कंठ रोग का शमन करती हैं कात्यायनी : षष्ठम कात्यायनी (मोइया) - दुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। इस आयुर्वेद औषधि में कई नामों से जाना जाता है। जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका इसको मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है। इससे पीड़ित रोगी ने कात्यायनी की माचिका प्रस्थिकाम्बष्ठा तथा अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका, खताविसार पित्तास्त्र कफ कण्डामयापहस्य।



मस्तिष्क विकारों को हरती हैं कालरात्रि : सप्तम कालरात्रि (नागदौन) - दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है। यह नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली औषधि है।
इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगा ले तो घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली एवं सभी विषों की नाशक औषधि है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।




रक्त शोधक होती हैं महागौरी : अष्टम महागौरी (तुलसी) - दुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है। जिसे प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो प्रत्येक घर में लगाई जाती है। तुलसी सात प्रकार की होती है। सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक, षटपत्र। ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है। रक्त शोधक है एवं हृदय रोग का नाश करती है।
तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्‍नी देवदुन्दुभि: तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् । मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघु:।
इस देवी की आराधना हर सामान्य एवं रोगी व्यक्ति को करना चाहिए।





बलबुद्धि बढ़ाती हैं सिद्धिदात्री : नवम सिद्धिदात्री (शतावरी) - दुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है। जिसे नारायणी या शतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक है। हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है। सिद्धिदात्री का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए।

इस प्रकार प्रत्येक देवी आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय पुराण के अनुसार नौ औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन उचित एवं साफ कर मनुष्य को स्वस्थ करती है। अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना चाहिए।

जय जय महावीर हनुमान

जय जय महावीर हनुमान |
असुर निकंदन, भव भय भंजन,रघुनन्दन प्रिय प्राण ||

अंजनि पुत्र केसरी नंदन, पवन पुत्र गुण वान,
अष्टम रूद्र महा बलशाली बजरंगी बलवान ||

बालक पन में सूरज निगला कौतुक करा महान,
वज्र इन्द्र का निष्फल कीन्हा, नाम पड़ा हनुमान ||

माँ सीता का हरण हुआ फिर मिले राम भगवान्,
निर्वासित सुग्रीव मिला कर हुई मित्र पहचान ||

सौ योजन का सागर लांघा ऐसी भरी कुदान,
लंका फूँक दशानन का सब तोड़ दिया अभिमान ||

राम मुद्रिका दे सीता को फूँक दिए नव प्राण,
दिया मुग्ध हो कर माता ने अष्ट सिद्धि वरदान ||

एक निष्ठ सेवक रघुवर के राम कथा में बसते प्राण,
जगत रांम मय कण कण में प्रभु, जयति जयति जय जय हनुमान ||