गोवर्धन
पर्वत धारण करने पर नीचे की भुमि जलमग्न क्यों नहीं हुई? एक समय शिवजी ने
पार्वती जी के सामने सन्तों की बड़ी महिमा गाई। सन्तों की महिमा सुनकर
पार्वती जी की श्रद्धा उमड़ी और उसी दिन उन्होंने श्री अगस्त्य मुनि को
भोजन का निमन्त्रण दे डाला तथा शिवजी को बाद में इस बाबत बतलाया तो सुनकर
शिवजी हंसे और कहा “आज ही तो सन्तों में श्रद्धा हुई और आज ही ऐसे सन्त को
न्यौता दे दिया। अगर किसी को भोजन कराना ही था, तो किसी कम भोजन करने वाले
मुनि को ही न्यौता दे देती। तुम अगस्त्य को नहीं जानती तीन चुल्लू में
समुद्र सोख गए थे। भला इनका पेट भरना कोई हंसी खेल है। यदि भुखे रह गए तो
लोक में बड़ी निन्दा होगी। जीवन में एक बार शिव के यहाँ गए और भूखे ही
लौटे। भद्रे! कार्य विचार कर नहीं किया।” पार्वती जी बोलीं-“अब तो न्यौता
दे ही दिया उसमें उलट-फेर होने की नहीं, चाहे जो भी हो।” शिवजी बोले-“तो
तुम जानो तुम्हारा काम जाने, मैं तो चुपचाप राम-राम जपूँगा।” पार्वती जी तो
साक्षात् अन्नपूर्णा ठहरी उन्होनें सोचा जब मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को
पूर्ण भोजन करा देती हूँ, तो एक ऋषि का पेट नहीं भर सकती। अवश्य तृप्त ही
नहीं महातृप्त करके भेजूँगी। फिर क्या था, बड़े जोर-शोर से तैयारी हुई।
खाद्यान्नों के पहाड़ लग गए। आखिर कितना खायेंगे ऋषि। जब अगस्त्य जी खाने
को बैठे तो भोजन का कोई हिसाब ही नही। आखिर परोसने वाली साक्षात्
अन्नपूर्णा, इतना मधुर और इतना स्वादिष्ट भोजन। पार्वती जी अपनी समस्त
सखियों-सहेलियों सहित दौड़-दौड़कर परोसती रहीं कि भोजन का तारतम्य न टूटे।
टोकरी की टोकरी थाल में पलट दी जाती थी, किन्तु इधर यह भी खूब रही कि
क्षणभर में थाली साफ। खाते-खाते जब अगस्त्य जी की जठराग्नि धधकी तो उन्हें
भोजन को हाथ से उठा-उठाकर ग्रास-ग्रास खाने की जरुरत ही नहीं रही। भोजन
स्वयं खिंचकर उनके मुँह मे जाने लगा। परोसने वाली सखियां घबरायी कि कहीं
भोजन के साथ हम सब भी न खिंची चली जायें। ऋषि जी का ढ़ंग देखकर माता
अन्नपूर्णा भी अचम्भे में पड़ गई। सोचने लगी अब तो भगवान् ही मर्यादा
रखेंगे। ठीक कहा था शम्भूजी ने, किन्तु साथ ही पार्वती को शिव पर झुंझलाहट
भी हो रही थी कि देखो तो, मैं तो हैरान हूँ। ऐसे समय पर मेरी सहायता के
बजाय मुँह फेरे बैठे हैं। निरुपाय अन्नपूर्णा ने भगवान का द्वार खटखटाया।
ठीक भी है ‘हारे को हरिनाम’ प्रसिद्ध ही है। भगवान तुरन्त ही बाल
ब्रह्मचारी का रुप धारणकर आ पहुँचे और बोले-“भगवती भिक्षां देही।” पार्वती
जी घबरायी “मैं तो एक ही को पूर्ण करने में परेशान हूँ। ये दूसरे समाज सेवक
भी आ धमके, सो भी भूखे ही।” परन्तु धर्म से विवश होकर ब्रह्मचारी जी के
लिए भी ऋषि के समीप ही आसन लगाया जाने लगा। अगस्त्य जी अपने समीप आसन नहीं
लगाने देते थे, किन्तु ब्रह्मचारी भी पूरे जिद्दी थे। अड़ गये कि बैठूंगा
तो यहीं। हारकर अगस्त्य जी चुप हो गए। बाल ब्रह्मचारी जी ने थोड़ा सा भोजन
पाकर ही आचमन कर लिया। माता पार्वती ने पूछा-“प्रभो! इतनी जल्दी खाना क्यों
बन्द कर दिया?” वे बोले-“हम ब्रह्मचारी हैं अधिक खाने से आलस्य प्रमाद आता
है, जिससे भजन में बाधा होती है और क्या हम इनकी तरह भूखे थोड़े ही हैं,
कि पूर्ण ही न हों।” उधर अगस्त्य जी ने भी संकोच के कारण खाना बन्द कर
दिया, कि पंगत में एक खाता रहे और दूसरा आचमन कर ले। दूसरी बात यह कि जो
बाद में आया वह पहले खा चुका। खाना तो बन्द कर दिया, किन्तु अगस्त्य जी ने
जल नहीं पिया था। वह ब्रह्मचारी पर बिगड़े-“तुमने मुझे जल नहीं पीने दिया।”
भगवान ने कृपा करके अपने स्वरुप के दर्शन कराए और कहा-“आप धैर्य धरें।
आपको जल मैं द्वापर में पिलाऊँगा। निमन्त्रण मैं आज ही देता हूँ।” जब
इन्द्र ने अपने लिए होने वाले यज्ञ के बन्द होने पर ब्रज डुबोने के लिए
अतिवृष्टि की थी तब भगवान ने उस जल का शोषण करने कि लिए अगस्त्य ऋषि को
नियुक्त किया था। इस कारण नीचे की जमीन जलमग्न नहीं होने पायी।
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गोलू देव का मंदिर
गोलू
देव का मंदिर अल्मोड़ा से छह किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ मोटर मार्ग के समीप
है।मंदिर में घोड़े में सवार और धनुष बाण लिए गोलू देवता की
प्रतिमा है।
मंदिर परिसर में हरे-भरे पेड़, टंगी हुई असंख्य छोटी-बड़ी घंटियां और अर्जियां लोगों को आकर्षित करती हैं। अन्याय,क्लेश व विपदा से पीड़ित लोग इस मंदिर में अपनी पुकार लगाने व मनौती मांगने प्रतिदिन आते रहते हैं।
मंदिर के अंदर और बाहर सैकड़ों की तादाद में लगे आवेदन पत्र इसकी गवाही देते हैं। गोलू देवता के दरबार में अधिकतर कानूनी मुकदमे, न्याय, व्यवसाय, स्वास्थ्य, मानसिक परेशानी, नौकरी, गलत अभियोग,
जमीन जायदाद व मकान निर्माण से जुड़े विषयों पर अर्जियां लगाई जाती हैं। मनौती पूर्ण होने लोग मंदिर में अपनी सामर्थ्य के अनुसार घंटियां चढ़ाते हैं।
इस मंदिर में कितनी घंटियाँ है , यह गिनना संभव नहीं है | समय समय पर घंटियाँ निकाल कर अलग रख दी जाती हैं जिससे नई घंटियाँ लगाने की जगह बन सके.
प्रतिमा है।
मंदिर परिसर में हरे-भरे पेड़, टंगी हुई असंख्य छोटी-बड़ी घंटियां और अर्जियां लोगों को आकर्षित करती हैं। अन्याय,क्लेश व विपदा से पीड़ित लोग इस मंदिर में अपनी पुकार लगाने व मनौती मांगने प्रतिदिन आते रहते हैं।
मंदिर के अंदर और बाहर सैकड़ों की तादाद में लगे आवेदन पत्र इसकी गवाही देते हैं। गोलू देवता के दरबार में अधिकतर कानूनी मुकदमे, न्याय, व्यवसाय, स्वास्थ्य, मानसिक परेशानी, नौकरी, गलत अभियोग,
जमीन जायदाद व मकान निर्माण से जुड़े विषयों पर अर्जियां लगाई जाती हैं। मनौती पूर्ण होने लोग मंदिर में अपनी सामर्थ्य के अनुसार घंटियां चढ़ाते हैं।
इस मंदिर में कितनी घंटियाँ है , यह गिनना संभव नहीं है | समय समय पर घंटियाँ निकाल कर अलग रख दी जाती हैं जिससे नई घंटियाँ लगाने की जगह बन सके.
वैष्णो देवी की विवाह की प्रतीक्षा
त्रेतायुग की बात है. दक्षिण भारत के रामेश्वरम में समुद्र तट पर एक गांव में
रत्नाकर पंडित रहते थे. रत्नाकर शिवजी और मां आदि शक्ति के बड़े भक्त थे पर उन्हें कोई संतान न थी.रत्नाकर की पत्नी हमेशा मां आदिशक्ति से संतान की गुहार लगाती रहती थीं. उन्होंने लगातार कई वर्षों तक मां की पूजा अर्चना की. कई सालों से संतानहीन रत्नाकर की पत्नी की प्रार्थना एक दिन मां सुन ली.
वह गर्भवती हुई तो एक रात रत्नाकर के सपने में एक बालिका ने आकर कहा- मैं तुम्हारे घर आ रही हूं पर एक शर्त पर, मैं जो कुछ करना चाहूं, रोकोगे नहीं.
पुजारी और सिद्ध पंडित रत्नाकर को यह आभास हो गया कि मां आदिशक्ति के सत, रज और तम को दिखाने वाले तीन रूप महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा ने मिलकर ही इस कन्या का रूप लिया है.
नियत समय पर इस दिव्य कन्या का जन्म हुआ. रत्नाकर को यह भी पता चल गया था कि यह कन्या मां आदिशक्ति ने धर्म की रक्षा के लिए ही प्रकट की है. रत्नाकर उसी भाव से कन्या का लालन पालन करने लगे. तीनों महाशक्तियों के मिलन के उस स्वरूप को उन्होंने त्रिकुटा नाम दिया. त्रिकुटा
का स्वभाव जन्म से ही अनूठा था. बचपन से ही वह पूजा पाठ और धार्मिक कार्यक्रमों को देख कर प्रसन्न होती.
अभी दसवां साल शुरु भी नहीं हुआ था कि त्रिकुटा को यह पता चल गया था कि भगवान विष्णु ने भगवान श्रीराम के रूप में धरती पर अवतार ले लिया है. त्रिकुटा ने यह व्रत ले लिया कि वह भगवान श्रीराम से ही विवाह करेगी अन्यथा नहीं.
त्रिकुटा ने अपने पिता से कहा कि वह रामेश्वरम के तट पर रहकर तपस्या करना चाहती हैं. शर्त के मुताबिक रत्नाकर ने उसे नहीं रोका. दस बरस की उम्र से ही त्रिकुटा, समुद्रतट पर एक कुटी बना कर रहने लगी.
वह भगवान श्रीराम को पति मानकर उनको पाने के लिए कठोर तप करने लगी. इसी तरह बहुत बरस बीत गए. सीताहरण के बाद भगवान श्रीराम लक्ष्मण के साथ दलबल लेकर सीता की खोज करते हुए रामेश्वर पहुंचे. श्रीराम को पुल बांधने तक यहां रुकना था. इस दौरान समुद्र तट पर एक ध्यानमग्न कन्या को देख बहुत चकित हुए. भगवान श्रीराम ने उस कन्या से पूछा कि तुम कौन हो और इस उम्र
में इतना कठोर तप करने का क्या अर्थ है. कन्या ने अपना परिचय पंडित रत्नाकर की पुत्री त्रिकुटा के रूप में देकर अपनी प्रतिज्ञा बतायी. त्रिकुटा ने भगवान श्रीराम से निवेदन किया कि वे उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार कर लें.
इस पर भगवान श्रीराम ने कहा- यह संभव नहीं है. जब त्रिकुटा ने अपने कठोर तप का वास्ता दिया तो भगवान ने कहा- जब मैं सीता का पता लगाकर लौटूंगा तब तुम्हारे पास आऊंगा. यदि तुम मुझे पहचान लोगी तो मैं तुम्हें अपनाने के बारे में सोचूंगा.
भगवान श्रीराम जब लंका विजय के बाद पुष्पक विमान से लौट रहे थे तब रामेश्वरम के तट पर पहुंचते ही उन्होंने विमान रुकवाकर सारी सेना से कहा- थोड़ी देर रुकें मैं आता हूं. श्रीराम एक अत्यंत बूढे का वेश बनाकर त्रिकुटा के पास पहुंचे. त्रिकुटा उन्हें पहचान न सकी. तब भगवान श्रीराम अपने असली रूप में आ गए. उन्होंने त्रिकुटा से कहा- देवि आप इस परीक्षा में सफल न हो पाईं. वैसे भी इस जन्म में सीता से विवाह कर मैंने एक पत्नीव्रत का प्रण लिया है. इसलिए तुम्हारे साथ विवाह तो असंभव ही था. पर कलियुग में मैं कल्कि अवतार लूंगा तब तुम्हें पत्नी रूप में अवश्य स्वीकार करुंगा. उस समय तक तुम हिमालय स्थित त्रिकूट पर्वत जाकर भक्तों के कष्ट और दु:खों का नाश कर संसार का भला करती रहो. विष्णु का अंश होने, उनके वंश में पैदा होने और विष्णु पूजक होने के नाते सारा संसार तुम्हें मां वैष्णों के रूप में पूजेगा.
तभी से तीन पहाड़ों वाले त्रिकूट पर्वत पर माता वैष्णों देवी के नाम से विराजमान है. श्रीहरि का वरदान होने के कारण वैष्णों माता भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं
रत्नाकर पंडित रहते थे. रत्नाकर शिवजी और मां आदि शक्ति के बड़े भक्त थे पर उन्हें कोई संतान न थी.रत्नाकर की पत्नी हमेशा मां आदिशक्ति से संतान की गुहार लगाती रहती थीं. उन्होंने लगातार कई वर्षों तक मां की पूजा अर्चना की. कई सालों से संतानहीन रत्नाकर की पत्नी की प्रार्थना एक दिन मां सुन ली.
वह गर्भवती हुई तो एक रात रत्नाकर के सपने में एक बालिका ने आकर कहा- मैं तुम्हारे घर आ रही हूं पर एक शर्त पर, मैं जो कुछ करना चाहूं, रोकोगे नहीं.
पुजारी और सिद्ध पंडित रत्नाकर को यह आभास हो गया कि मां आदिशक्ति के सत, रज और तम को दिखाने वाले तीन रूप महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा ने मिलकर ही इस कन्या का रूप लिया है.
नियत समय पर इस दिव्य कन्या का जन्म हुआ. रत्नाकर को यह भी पता चल गया था कि यह कन्या मां आदिशक्ति ने धर्म की रक्षा के लिए ही प्रकट की है. रत्नाकर उसी भाव से कन्या का लालन पालन करने लगे. तीनों महाशक्तियों के मिलन के उस स्वरूप को उन्होंने त्रिकुटा नाम दिया. त्रिकुटा
का स्वभाव जन्म से ही अनूठा था. बचपन से ही वह पूजा पाठ और धार्मिक कार्यक्रमों को देख कर प्रसन्न होती.
अभी दसवां साल शुरु भी नहीं हुआ था कि त्रिकुटा को यह पता चल गया था कि भगवान विष्णु ने भगवान श्रीराम के रूप में धरती पर अवतार ले लिया है. त्रिकुटा ने यह व्रत ले लिया कि वह भगवान श्रीराम से ही विवाह करेगी अन्यथा नहीं.
त्रिकुटा ने अपने पिता से कहा कि वह रामेश्वरम के तट पर रहकर तपस्या करना चाहती हैं. शर्त के मुताबिक रत्नाकर ने उसे नहीं रोका. दस बरस की उम्र से ही त्रिकुटा, समुद्रतट पर एक कुटी बना कर रहने लगी.
वह भगवान श्रीराम को पति मानकर उनको पाने के लिए कठोर तप करने लगी. इसी तरह बहुत बरस बीत गए. सीताहरण के बाद भगवान श्रीराम लक्ष्मण के साथ दलबल लेकर सीता की खोज करते हुए रामेश्वर पहुंचे. श्रीराम को पुल बांधने तक यहां रुकना था. इस दौरान समुद्र तट पर एक ध्यानमग्न कन्या को देख बहुत चकित हुए. भगवान श्रीराम ने उस कन्या से पूछा कि तुम कौन हो और इस उम्र
में इतना कठोर तप करने का क्या अर्थ है. कन्या ने अपना परिचय पंडित रत्नाकर की पुत्री त्रिकुटा के रूप में देकर अपनी प्रतिज्ञा बतायी. त्रिकुटा ने भगवान श्रीराम से निवेदन किया कि वे उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार कर लें.
इस पर भगवान श्रीराम ने कहा- यह संभव नहीं है. जब त्रिकुटा ने अपने कठोर तप का वास्ता दिया तो भगवान ने कहा- जब मैं सीता का पता लगाकर लौटूंगा तब तुम्हारे पास आऊंगा. यदि तुम मुझे पहचान लोगी तो मैं तुम्हें अपनाने के बारे में सोचूंगा.
भगवान श्रीराम जब लंका विजय के बाद पुष्पक विमान से लौट रहे थे तब रामेश्वरम के तट पर पहुंचते ही उन्होंने विमान रुकवाकर सारी सेना से कहा- थोड़ी देर रुकें मैं आता हूं. श्रीराम एक अत्यंत बूढे का वेश बनाकर त्रिकुटा के पास पहुंचे. त्रिकुटा उन्हें पहचान न सकी. तब भगवान श्रीराम अपने असली रूप में आ गए. उन्होंने त्रिकुटा से कहा- देवि आप इस परीक्षा में सफल न हो पाईं. वैसे भी इस जन्म में सीता से विवाह कर मैंने एक पत्नीव्रत का प्रण लिया है. इसलिए तुम्हारे साथ विवाह तो असंभव ही था. पर कलियुग में मैं कल्कि अवतार लूंगा तब तुम्हें पत्नी रूप में अवश्य स्वीकार करुंगा. उस समय तक तुम हिमालय स्थित त्रिकूट पर्वत जाकर भक्तों के कष्ट और दु:खों का नाश कर संसार का भला करती रहो. विष्णु का अंश होने, उनके वंश में पैदा होने और विष्णु पूजक होने के नाते सारा संसार तुम्हें मां वैष्णों के रूप में पूजेगा.
तभी से तीन पहाड़ों वाले त्रिकूट पर्वत पर माता वैष्णों देवी के नाम से विराजमान है. श्रीहरि का वरदान होने के कारण वैष्णों माता भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं
हनुमान जी की मूर्छा
हनुमान जी की मूर्छा :
हनुमान जी जब पर्वत लेकर लौटते है तो भगवान से कहते है.प्रभु आपने मुझे संजीवनी
बूटी लेने नहीं भेजा था.आपने तो मुझे मेरी मूर्छा दूर करने के लिए भेजा था.
"सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू"
अर्थात - हनुमान्जी ने पवित्र नाम का स्मरण करके श्री रामजी को अपने वश में कर रखा
है,प्रभु आज मेरा ये भ्रम टूट गया कि मै ही सबसे बड़ा भक्त,राम नाम का जप करने वाला
हूँ.भगवान बोले कैसे ?
हनुमान जी बोले - वास्तव में तो भरत जी संत है और उन्होंने ही राम नाम जपा है.आपको
पता है जब लक्ष्मण जी को शक्ति लगी तो मै संजीवनी लेने गया पर जब मुझे भरत जी ने
बाण मारा और मै गिरा,तो भरत जी ने, न तो संजीवनी मंगाई, न वैद्य बुलाया. कितना भरोसा
है उन्हें आपके नाम पर, आपको पता है उन्होंने क्या किया.
"जौ मोरे मन बच अरू काया,प्रीति राम पद कमल अमाया"
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला,जौ मो पर रघुपति अनुकूला
सुनत बचन उठि बैठ कपीसा ,कहि जय जयति कोसलाधीसा"
यदि मन वचन और शरीर से श्री राम जी के चरण कमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो तो यदि
रघुनाथ जी मुझ पर प्रसन्न हो तो यह वानर थकावट और पीड़ा से रहित हो जाए.यह वचन
सुनते हुई मै श्री राम, जय राम, जय-जय राम कहता हुआ उठ बैठा.
प्रभुजी , मै नाम तो आपका लेता हूँ पर
भरोसा भरत जी जैसा नहीं किया, वरना मै संजीवनी लेने क्यों जाता,
बस ऐसा ही हम करते है हम नाम तो भगवान का लेते है पर भरोसा नही करते,बुढ़ापे में
बेटा ही सेवा करेगा,बेटे ने नहीं की तो क्या होगा? उस समय हम भूल जाते है जिस
भगवान का नाम हम जप रहे है वे है न,पर हम भरोसा नहीं करते.बेटा सेवा करे न करे पर
भरोसा हम उसी पर करते है.
2. - दूसरी बात प्रभु ! बाण लगते ही मै गिरा, पर्वत नहीं गिरा, क्योकि पर्वत तो आप
उठाये हुए थे और मै अभिमान कर रहा था कि मै उठाये हुए हूँ.मेरा दूसरा अभिमान टूट
गया, इसी तरह हम भी यही सोच लेते है कि गृहस्थी के बोझ को मै उठाये हुए हूँ,पर असल मे सारा बोझ तो भगवान ही उठाते हैं .
3. - फिर हनुमान जी कहते है -और एक बात प्रभु ! आपके तरकस में भी ऐसा बाण नहीं है
जैसे बाण भरत जी के पास है.आपने सुबाहु मारीच को बाण से बहुत दूर गिरा दिया,आपका
बाण तो आपसे दूर गिरा देता है,पर भरत जी का बाण तो आपके चरणों में ला देता है.मुझे
बाण पर बैठाकर आपके पास भेज दिया.
भगवान बोले - हनुमान जब मैंने ताडका को मारा और भी राक्षसों को मारा, तो वे सब मरकर
मुक्त होकर मेरे ही पास तो आये,इस पर हनुमान जी बोले प्रभु आपका बाण तो मारने के
बाद सबको आपके पास लाता है पर भरत जी का बाण तो जिन्दा ही भगवान के पास ले आता
है.भरत जी संत है और संत का बाण क्या है? संत का बाण है उसकी वाणी लेकिन हम करते
क्या है,हम संत वाणी को समझते तो है पर सटकते नहीं है,और औषधि सटकने पर ही फायदा
करती है.
4. - हनुमान जी को भरत जी ने पर्वत सहित अपने बाण पर बैठाया तो उस समय हनुमान जी को
थोडा अभिमान हो गया कि मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा ? परन्तु जब उन्होंने रामचंद्र
जी के प्रभाव पर विचार किया तो वे भरत जी के चरणों की वंदना करके चले.
इसी तरह हम भी कभी-कभी संतो पर संदेह करते है,कि ये हमें कैसे भगवान तक पहुँचा
देगे, संत ही तो है जो हमें सोते से जागते है जैसे हनुमान जी को जगाया, क्योकि उनका
मन,वचन,कर्म सब भगवान में लगा है.अरे उन पर भरोसा तो करो तुम्हे तुम्हारे बोझ सहित
भगवान के चरणों तक पहुँचा देगे.
हनुमान जी जब पर्वत लेकर लौटते है तो भगवान से कहते है.प्रभु आपने मुझे संजीवनी
बूटी लेने नहीं भेजा था.आपने तो मुझे मेरी मूर्छा दूर करने के लिए भेजा था.
"सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू"
अर्थात - हनुमान्जी ने पवित्र नाम का स्मरण करके श्री रामजी को अपने वश में कर रखा
है,प्रभु आज मेरा ये भ्रम टूट गया कि मै ही सबसे बड़ा भक्त,राम नाम का जप करने वाला
हूँ.भगवान बोले कैसे ?
हनुमान जी बोले - वास्तव में तो भरत जी संत है और उन्होंने ही राम नाम जपा है.आपको
पता है जब लक्ष्मण जी को शक्ति लगी तो मै संजीवनी लेने गया पर जब मुझे भरत जी ने
बाण मारा और मै गिरा,तो भरत जी ने, न तो संजीवनी मंगाई, न वैद्य बुलाया. कितना भरोसा
है उन्हें आपके नाम पर, आपको पता है उन्होंने क्या किया.
"जौ मोरे मन बच अरू काया,प्रीति राम पद कमल अमाया"
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला,जौ मो पर रघुपति अनुकूला
सुनत बचन उठि बैठ कपीसा ,कहि जय जयति कोसलाधीसा"
यदि मन वचन और शरीर से श्री राम जी के चरण कमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो तो यदि
रघुनाथ जी मुझ पर प्रसन्न हो तो यह वानर थकावट और पीड़ा से रहित हो जाए.यह वचन
सुनते हुई मै श्री राम, जय राम, जय-जय राम कहता हुआ उठ बैठा.
प्रभुजी , मै नाम तो आपका लेता हूँ पर
भरोसा भरत जी जैसा नहीं किया, वरना मै संजीवनी लेने क्यों जाता,
बस ऐसा ही हम करते है हम नाम तो भगवान का लेते है पर भरोसा नही करते,बुढ़ापे में
बेटा ही सेवा करेगा,बेटे ने नहीं की तो क्या होगा? उस समय हम भूल जाते है जिस
भगवान का नाम हम जप रहे है वे है न,पर हम भरोसा नहीं करते.बेटा सेवा करे न करे पर
भरोसा हम उसी पर करते है.
2. - दूसरी बात प्रभु ! बाण लगते ही मै गिरा, पर्वत नहीं गिरा, क्योकि पर्वत तो आप
उठाये हुए थे और मै अभिमान कर रहा था कि मै उठाये हुए हूँ.मेरा दूसरा अभिमान टूट
गया, इसी तरह हम भी यही सोच लेते है कि गृहस्थी के बोझ को मै उठाये हुए हूँ,पर असल मे सारा बोझ तो भगवान ही उठाते हैं .
3. - फिर हनुमान जी कहते है -और एक बात प्रभु ! आपके तरकस में भी ऐसा बाण नहीं है
जैसे बाण भरत जी के पास है.आपने सुबाहु मारीच को बाण से बहुत दूर गिरा दिया,आपका
बाण तो आपसे दूर गिरा देता है,पर भरत जी का बाण तो आपके चरणों में ला देता है.मुझे
बाण पर बैठाकर आपके पास भेज दिया.
भगवान बोले - हनुमान जब मैंने ताडका को मारा और भी राक्षसों को मारा, तो वे सब मरकर
मुक्त होकर मेरे ही पास तो आये,इस पर हनुमान जी बोले प्रभु आपका बाण तो मारने के
बाद सबको आपके पास लाता है पर भरत जी का बाण तो जिन्दा ही भगवान के पास ले आता
है.भरत जी संत है और संत का बाण क्या है? संत का बाण है उसकी वाणी लेकिन हम करते
क्या है,हम संत वाणी को समझते तो है पर सटकते नहीं है,और औषधि सटकने पर ही फायदा
करती है.
4. - हनुमान जी को भरत जी ने पर्वत सहित अपने बाण पर बैठाया तो उस समय हनुमान जी को
थोडा अभिमान हो गया कि मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा ? परन्तु जब उन्होंने रामचंद्र
जी के प्रभाव पर विचार किया तो वे भरत जी के चरणों की वंदना करके चले.
इसी तरह हम भी कभी-कभी संतो पर संदेह करते है,कि ये हमें कैसे भगवान तक पहुँचा
देगे, संत ही तो है जो हमें सोते से जागते है जैसे हनुमान जी को जगाया, क्योकि उनका
मन,वचन,कर्म सब भगवान में लगा है.अरे उन पर भरोसा तो करो तुम्हे तुम्हारे बोझ सहित
भगवान के चरणों तक पहुँचा देगे.
Thursday, September 17, 2015
‘सहस्त्रलिंगा’
आज हम आपको एक ऐसी जगह ले जाने वाले हैं जहां एक या दो नहीं, वरन् हज़ारों
शिवलिंग मौजूद हैं।इस जगह को ‘सहस्त्रलिंगा’ के नाम से जाना जाता है,
अर्थात् हज़ारों लिंग। ये ऐतिहासिक जगह कर्नाटक के उत्तर कन्नड ज़िले में
एक नदी पर स्थित है। इस नदी का नाम शामला है। यहां चट्टान पर शिवलिंग बने
हैं। यह शिवलिंग नदी के घटते जलस्तर के साथ ही दिखने लगते हैं |यहां आए
पर्यटक बहते हुए हज़ारों शिवलिंग को देखकर अचंभित हो जाते हैं। यह दृश्य ऐसा
लगता है मानो स्वयं भगवान शिव ‘शिवलिंग’ का रूप धारण कर नदी
से बाहर आ रहे हैं और भक्तों को आशीर्वाद दे रहे हैं। इस भव्य दृश्य को
देखने के लिए रोज़ाना पर्यटकों के साथ-साथ भगवान शिव पर आस्था रखने वाले
भक्तों का यहां तांता लगा रहता है। दरअसल सिरसी के राजा सदाऐश्वर्य
(1678-1718) ने इन शिवलिंगों का निर्माण करवाया था। शायद इतने वर्षों में
यह जगह जलाशय में तब्दील हो जाने के कारण राजा द्वारा बनाए गए शिवलिंग पाने
के नीचे छिप गए।कुछ छोटे आकार के और कुछ बड़े आकार के शिवलिंग यहां आसानी
से देखे जा सकते हैं।शिवलिंग के अलावा कई बार भक्तों ने यहां कुछ बड़ी-बड़ी
चट्टानें भी बहते पानी में देखी हैं, जिन पर पशु-पक्षियों की आकृतियां बनी
हुई हैं।एक चट्टान पर शिव के वाहन नन्दी भी विराजमान हैं।
गणेश जी की पत्नियां
पहले गणेशजी का चेहरा भी मनुष्य के चेहरे की तरह था। लेकिन एक बार भगवान
शिव जब माता पार्वती से मिलने पहुंचे तो गणेशजी ने उन्हें नहीं जाने दिया
तब शंकरजी ने गणेश जी का सिर त्रिशूल से अलग कर दिया था।
इसके बाद गणेशजी के सिर में हाथी का सिर जोड़ा गया। हाथी के सिर की सुंदरता बढ़ाने वाले उनके दो दांत भी थे। लेकिन परशुराम के साथ युद्ध में गणेशजी का एक दंत भी टूट गया। और वो एकदंत कहलाए। उनका शरीर भी बड़ा था।
इसलिए उनसे कोई भी सुशील कन्या विवाह के लिए राजी नहीं होती थी। गणेशजी इस बात से नाराज थे। उन्होंने कहा, 'अगर मेरा विवाह नहीं हो रहा तो मैं किसी ओर का विवाह भी नहीं होने दूंगा।'
उन्होंने अपने चूहे को आदेश दिया कि जिस रास्ते से किसी भी देवता की बारात गुजरे उस रास्ते को और विवाह मंडप की भूमि को अंदर से खोखला कर विघ्न डालो। चूहे ने गणेशजी के कहने पर वैसा ही किया। सारे देवता परेशान हो गए। शिवजी को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था| देवी पार्वती ने सलाह दी कि ब्रह्माजी से इस समस्या का हल पूंछा जाए।
तब ब्रह्माजी योग में लीन हुए और योग से ही दो कन्याएं ऋद्धि और सिद्धि अवतरित हुईं। दोनों ब्रह्माजी की मानस पुत्री थीं। उन दोनों को लेकर ब्रह्माजी गणेशजी के पास पहुंचे और कहा वह उन्हें शिक्षा दें। गणेशजी तैयार हो गये। जब भी चूहा गणेशजी के पास किसी के विवाह की सूचना लाता तो ऋद्धि और सिद्धि ध्यान बांटने के लिए कोई न कोई प्रसंग छेड़ देतीं।
इस तरह विवाह निर्विघ्न होने लगे। एक दिन चूहा आया और उसने देवताओं के निर्विघ्न विवाह के बारे में बताया तब गणेश जी को सारा मामला समझ में आया।
गणेशजी के क्रोधित होने से पहले ब्रह्माजी उनके पास ऋद्धि सिद्धि को लेकर प्रकट हुए। उन्होंने कहा, आपने स्वयं इन्हें शिक्षा दी है। मुझे इनके लिए कोई योग्य वर नहीं मिल रहा है। आप इनसे विवाह कर लें।
इसके बाद गणेशजी के सिर में हाथी का सिर जोड़ा गया। हाथी के सिर की सुंदरता बढ़ाने वाले उनके दो दांत भी थे। लेकिन परशुराम के साथ युद्ध में गणेशजी का एक दंत भी टूट गया। और वो एकदंत कहलाए। उनका शरीर भी बड़ा था।
इसलिए उनसे कोई भी सुशील कन्या विवाह के लिए राजी नहीं होती थी। गणेशजी इस बात से नाराज थे। उन्होंने कहा, 'अगर मेरा विवाह नहीं हो रहा तो मैं किसी ओर का विवाह भी नहीं होने दूंगा।'
उन्होंने अपने चूहे को आदेश दिया कि जिस रास्ते से किसी भी देवता की बारात गुजरे उस रास्ते को और विवाह मंडप की भूमि को अंदर से खोखला कर विघ्न डालो। चूहे ने गणेशजी के कहने पर वैसा ही किया। सारे देवता परेशान हो गए। शिवजी को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था| देवी पार्वती ने सलाह दी कि ब्रह्माजी से इस समस्या का हल पूंछा जाए।
तब ब्रह्माजी योग में लीन हुए और योग से ही दो कन्याएं ऋद्धि और सिद्धि अवतरित हुईं। दोनों ब्रह्माजी की मानस पुत्री थीं। उन दोनों को लेकर ब्रह्माजी गणेशजी के पास पहुंचे और कहा वह उन्हें शिक्षा दें। गणेशजी तैयार हो गये। जब भी चूहा गणेशजी के पास किसी के विवाह की सूचना लाता तो ऋद्धि और सिद्धि ध्यान बांटने के लिए कोई न कोई प्रसंग छेड़ देतीं।
इस तरह विवाह निर्विघ्न होने लगे। एक दिन चूहा आया और उसने देवताओं के निर्विघ्न विवाह के बारे में बताया तब गणेश जी को सारा मामला समझ में आया।
गणेशजी के क्रोधित होने से पहले ब्रह्माजी उनके पास ऋद्धि सिद्धि को लेकर प्रकट हुए। उन्होंने कहा, आपने स्वयं इन्हें शिक्षा दी है। मुझे इनके लिए कोई योग्य वर नहीं मिल रहा है। आप इनसे विवाह कर लें।
इस तरह
ऋद्धि(बुद्धि- विवेक की देवी) और सिद्धि (सफलता की देवी) से गणेशजी का
विवाह हो गया। और फिर बाद में गणेश जी के शुभ और लाभ दो पुत्र भी हुए।
“मनोकामना इच्छा पूर्ती श्री सिद्धि विनायक मंदिर”
“मनोकामना इच्छा पूर्ती श्री सिद्धि विनायक मंदिर”
श्री सिद्धि विनायक मंदिर भारत वर्ष की राजधानी दिल्ली में मधुबन चौक के पास बरगद के पेड़ में स्थापित है| यह बरगद का पेड़ वर्षो पुराना है| श्रद्धालूओं एवं भक्तजनो की ऐसी आस्था है कि श्री सिद्धि विनायक जी का निवास इस बरगद के पेड़ के नीचे है, जहाँ वास्तविकता में साक्षात गणपति जी के होने का आभास होता है | शायद इसी आस्था के कारण वर्षो से इस बरगद के नीचे भक्त जन दीपक जलाकर पेड़ पर कलावा व धागा बांधकर पूजा अर्चना करते है | लोगो की ऐसी आस्था है कि श्री सिद्धि विनायक जी सभी भक्त जनो की मनोकामना पूरी करते है |
भक्तजन पूजन, भजन कीर्तन करते हुए भगवान सिद्धि विनायक के मंदिर में मनोकामना के लिए वट वृक्ष पर मोली व कलावा तथा दीपक जलाकर अचर्ना करते है |

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