Sunday, February 21, 2016

उज्जैन के 84 महादेव -भाग 18

84 महादेव : श्री रामेश्वर महादेव (29)


की कथा महाकाल वन की महत्ता दर्शाती है। परशुरामजी ने कई तीर्थों के दर्शन एवं तप किए लेकिन उनका ब्रह्म  हत्या दोष निवारण महाकाल वन में स्थित श्री रामेश्वर महादेव के पूजन से ही हुआ।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार त्रेता युग में शास्त्रों को धारण करने वाले सर्वगुण संपन्न परशुराम हुए। वे विष्णु के अवतार थे जिनका जन्म भृगु ऋषि के शाप के कारण हुआ था। उनकी माता रेणुका थी और पिता जमदग्नि थे। परशुराम के चार बड़े भाई थे लेकिन सभी में परशुराम सबसे अधिक योग्य एवं तेजस्वी थे। एक बार जमदग्नि ने रेणुका को हवन हेतु गंगा तट पर जल लाने के लिए भेजा। गंगा तट पर गंधर्वराज चित्ररथ अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे जिन्हें देख रेणुका आसक्त हो गई और कुछ देर तक वहीँ रुक गई। इस कारण हुए विलंब के फलस्वरूप हवन काल व्यतीत हो गया। इससे जमदग्नि बेहद क्रोधित हुए और उन्होंने रेणुका के इस कृत्य को आर्य विरोधी आचरण माना। क्रुद्ध हो उन्होंने अपने सभी पुत्रों को रेणुका का वध करने का आदेश दे डाला। लेकिन मातृत्व मोहवश कोई पुत्र ऐसा ना कर सका। पुत्रों को आज्ञा पालन न करते देख जमदग्नि ने उन्हें विचार शक्ति नष्ट होने का श्राप दे दिया।
 
 
तभी पिता के तपोबल से प्रभावित परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता रेणुका का शिरोच्छेद कर दिया। परशुराम की कर्तव्यपरायणता देख जमदग्नि बेहद प्रसन्न हुए और परशुराम से वरदान मांगने को कहा। वरदान स्वरुप पशुराम ने अपनी माता रेणुका को पुनर्जीवित करने एवं भाइयों को पुनः विचारशील करने की प्रार्थना की। वरदान में भी स्वयं के लिए कुछ ना मांग माता एवं भाइयों के लिए की गई प्रार्थना से जमदग्नि और अत्यधिक प्रसन्न हुए एवं उन्होंने परशुराम द्वारा मांगे गए वरदानों को प्रदान करने के साथ कहा- कि इस संसार में तुम्हें कोई परास्त नहीं कर पाएगा, तुम अजेय रहोगे। तुम अग्नि से उत्पन्न होने वाले इस दृढ़ परशु को ग्रहण करो। इसी तीक्ष्ण धार वाले परशु से तुम विख्यात होंगे। वरदान के फलस्वरूप माता रेणुका पुनर्जीवित हो गई पर परशुराम पर ब्रह्म ह्त्या का दोष चढ़ गया।
 
कुछ समय के बाद हैहयवंश में कार्तवीर्य अर्जुन राजा हुआ। वह सहस्त्रबाहु था। उसने कामधेनु के लिए जमदग्नि ऋषि को मार डाला। पिता के वध से क्रुद्ध हो परशुराम ने परशु से अर्जुन की हजार भुजाएं काट डाली। फिर परशु ने उसकी सेना का भी नाश कर डाला। इसी अपराध को लेकर उन्होंने क्षत्रियों का 21 बार पृथ्वी से नामोंनिशान मिटा दिया। फिर ब्रह्म हत्या पाप के निवारण हेतु परशुराम ने अश्वमेध यज्ञ किया और कश्यप मुनि को पृथ्वी का दान कर दिया। इसके साथ ही अश्व, रथ, सुवर्ण आदि नाना प्रकार के दान किए। लेकिन फिर भी ब्रह्म हत्या का पाप दूर नहीं हुआ। फिर वे रैवत पर्वत पर तपस्या करने चले गए जहां उन्होंने घोर तपस्या की। फिर भी दोष दूर नहीं हुआ तो वे हिमालय पर्वत तथा बद्रिकाश्रम गए। उसके बाद नर्मदा, चन्द्रभागा, गया, कुरुक्षेत्र, नैमीवर, पुष्कर, प्रयाग, केदारेश्वर आदि तीर्थों के दर्शन कर स्नान किया। फिर भी उनकी ब्रह्म हत्या के दोष का निवारण नहीं हुआ। तब वे अत्यंत दुखी हुए एवं उनका दृष्टिकोण नकारात्मक होने लगा। वे सोचने लगे कि शास्त्रों में जो तीर्थ, दान इत्यादि का महात्मय बताया गया है वह सब मिथ्या है। तभी वहां नारद मुनि पहुंचे। परशुराम नारद मुनि से बोले कि मैंने पिता की आज्ञा पर माता का वध किया, क्षत्रियों का विनाश किया जिसके फलस्वरूप मुझे ब्रह्म हत्या का दोष लगा। इस दोष के निवारण के लिए मैंने अश्वमेध यज्ञ किया, पर्वतों पर तप किया, कई तीर्थों में स्नान किया लेकिन फिर भी मेरी ब्रह्म हत्या दूर नहीं हो रही है। तब नारदजी बोले कि आप कृपया महाकाल वन में जाइए। वहां जटेश्वर के पास स्थित दिव्य लिंग का पूजन अर्चन करें। उससे आपकी ब्रह्महत्या दूर हो जाएगी। नारदमुनि के कथनानुसार परशुराम महाकाल वन आए और नारदमुनि द्वारा बताए गए दिव्य लिंग का पूजन अर्चन किया। उनके श्रद्धापूर्वक किए गए पूजन अर्चन से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्हें ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त कर दिया।
 
दर्शन लाभ:
मान्यतानुसार श्री रामेश्वर महादेव के दर्शन करने से दोषों का नाश होता है। ऐसा माना जाता है कि यहां दर्शन करने पर विजयश्री प्राप्त होती है। श्री रामेश्वर महादेव का मंदिर सती दरवाजे के पास रामेश्वर गली में स्थित है।

उज्जैन के 84 महादेव-भाग 17

84 महादेव : श्री जटेश्वर महादेव(28)

की कथा राजा वीरधन्वा और उनके द्वारा वन में किए गए दोषों के निवारण से जुडी हुई है। प्रस्तुत कथा ऋषि-मुनियों की महत्ता दर्शाती है। मुनि द्वारा बताए गए मार्ग पर ही राजा को शांति प्राप्त हो सकी।
 
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार वीरधन्वा नाम के एक राजा थे। वे धर्मस्वी, यशस्वी तथा पृथ्वी पर विख्यात थे। एक बार वे शिकार करने के लिए वन में गए। वहां उन्होंने मृग रूपी आकृति देख बाण चला दिए। जहां उन्होंने बाण चलाए वे वास्तविकता में संवर्त ब्राम्हण के पांच पुत्र थे जो मृगरूप में विचर रहे थे। उनका मृग रूप उन्हें मिले एक शाप की कथा में निहित है। उस कथा के अनुसार एक बार उन ब्राम्हण पुत्रों द्वारा हिरन के पांच छोटे बच्चों का वध हो गया था। घर जाकर बालकों ने अपने पिता को सारा वृत्तांत सुनाया और प्रायश्चित का मार्ग पूछा। तभी वहां भृगु ऋषि, अत्रि ऋषि और अभी ऋषि आ गए। सारी बातें जानने पर वे बोले कि प्रायश्चित हेतु तुम पांचों पांच वर्ष तक मृग चर्म ओढ़ कर वन में रहो। इस प्रकार वे पांचों वन में भटक रहे थे और एक वर्ष के पश्चात राजा वीरधन्वा ने उन्हें मृग समझ मार डाला।
जब राजा को यह ज्ञात हुआ कि वे ब्राह्मण पुत्र थे तो वे अत्यंत दुखी हुए। भय से कांपते हुए वे देवरात मुनि के पास पहुंचे एवं उन्हें सारी बातें कहीं। देवरात मुनि ने उन्हें शांत रहने को कहा और कहा कि भगवान जनार्दन की कृपा से तुम्हारा पाप दूर हो जाएगा। मुनि की सामान्य सी प्रतिक्रिया सुन कर राजा को क्रोध आ गया और उसने तलवार से मुनि की हत्या कर दी। इस हत्या के बाद वे और ज्यादा क्रोधित हुए, संतुलन खोते हुए वन में भटकने लगे और वहीँ उन्होंने गालव ऋषि की कपिल गाय का भी वध कर दिया। जड़ीभूत बुद्धि से वे दिशाहीन होकर वन में भटकते रहे।
 
राजा को वन में भटकते हुए एक बार मुनि वामदेव ने देखा। राजा को देखते ही वे सारा अतीत जान गए। राजा उनसे कहने लगा कि उसने ब्राह्मण हत्या की है, गौ हत्या की है, वह इस दोष से अत्यधिक दुखी है। तब मुनि राजा से बोले कि आपकी बुद्धि पूर्व काल के कुछ कर्मों के कारण जड़ हुई है और इसी वजह से आपको ब्रह्म हत्या का दोष लगा है। आप तुरंत महाकाल वन जाइए। वहां अनरकेश्वर के उत्तर में स्थित दिव्य लिंग का दर्शन कीजिए। उनके दर्शन करने से ही आपका उद्धार हो सकता है। मुनि के कहे अनुसार राजा महाकाल वन पहुंचे और वहां पहुंच कर उन्होंने मुनि वामदेव द्वारा बताए गए शिवलिंग का पूजन अर्चन किया। उनकी पूजा के फलस्वरूप उस लिंग में से जटाधारी शिव प्रकट हुए और राजा को ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त कर उनकी जड़ीभूत बुद्धि निर्मल करने का वरदान दिया। तभी से वह लिंग जटेश्वर कहलाया।
 
दर्शन लाभ:
मान्यतानुसार श्री जटेश्वर महादेव के दर्शन करने से पाप-दोष नष्ट होते हैं। भ्रष्ट बुद्धि वाले मनुष्य की स्थिति सुधर जाती है। ऐसा कहा जाता है कि श्राद्ध के समय जो जटेश्वर की इस कथा को पढ़ता है उसका श्राद्ध पितरों को प्रसन्न करता है। उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री जटेश्वर महादेव गया कोठा में रावण दहन के स्थान पर स्थित है।
 

उज्जैन के 84 महादेव-भाग 16

84 महादेव : श्री अनरकेश्वर महादेव (27)

प्राचीन समय में एक राजा थे निमि। अपने पुण्य कर्मो के कारण यमराज के दूत उन्हे विमान में लेकर स्वर्ग जा रहे थे। यमदूत उन्हें  दक्षिण मार्ग से नरक के सामने से लेकर जा रहा था। राजा निमि ने वहां करोड़ों लोगों को अपने पापों का फल भुगतते देखा, जिससे उन्हें पीड़ा हो रही थी। उन्होंने यमदूत से पूछा कि मुझे किस कर्म के कारण नरक के सामने से गुजरना पड़ा है, दूत ने कहा कि आपने श्राद्ध के दिन दक्षिणा नहीं दी उसी कर्म के कारण आपको यह फल मिल रहा है। इसके बाद राजा ने पूछा मुझे किस कर्म के कारण स्वर्ग की प्राप्ति हो रही है। इस पर यमदूत ने कहा कि आपने महाकाल वन में अश्विन में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भगवान मनकेश्वर का दर्शन-पूजन किया था, जिसके फलस्वरूप आपको स्वर्ग की प्राप्ति हुई है। 

जैसे ही वे लोग आगे चलने लगे नरक के पापियों ने कहा कि हे राजन आप थोड़ी देर ओर रूकें, आपके शरीर को स्पर्श कर आने वाली वायु पीड़ा में राहत दे रही है। राजा निमि ने दूत से कहा कि वे अब स्वर्ग नहीं जाएंगे ओर यही खड़े रहकर पापियों को सुख देगे। इस पर इंद्र वहां उपस्थित हुए और राजा से स्वर्ग चलने का विनय किया। राजा ने मना किया ओर पूछा कि ये पापी अपने कर्म फल से कैसे मुक्त होंगे? तब इंद्र ने कहा कि यदि आप अपने भगवान के दर्शन का पुण्य फल इन्हें दान कर दें तो सभी मुक्त हो जाएंगे। राजा निमि ने अपना पुण्य फल सभी पापियों  को दान कर दिया, जिससे सभी पापी अपने पाप से मुक्त हो गए। मान्यता है कि अनरकेश्वर के दर्शन मात्र से नरक से मुक्ति मिलती है। अश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को पूजन करने से मनुष्य के सौ जन्मों के पाप नष्ट होते हैं  ओर वह स्वर्ग के सुखों का भोग करता है।

Thursday, February 18, 2016

उज्जैन के 84 महादेव -भाग 14

84 महादेव : श्री मुक्तेश्वर महादेव (25)

पुराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में मुक्ति नामक एक जितेन्द्रिय ब्राह्मण थे। मुक्ति की कामना से वे नित तपस्या में लीन रहते थे। तपस्या में रत हुए उन्हें 13 साल हो गए। फिर एक दिन वे स्नान करने के लिए महाकाल वन स्थित पवित्र क्षिप्रा नदी पर गए। क्षिप्रा में उन्होंने स्नान किया फिर वे वहीँ नदी के तट पर जप करने लगे। तभी उन्होंने वहां एक भीषण देह वाले मनुष्य को आते हुए देखा जिसके हाथ में धनुष बाण था। वहां पहुंच कर वह व्यक्ति ब्राह्मण से बोला कि वह उन्हें मारने आया है। उसकी बात सुन ब्राह्मण भयभीत हुए एवं नारायण भगवान का ध्यान लगा कर बैठ गए। ब्राह्मण के तप के भव्य प्रताप से उस व्यक्ति ने धनुष बाण फैक दिए और बोला कि – हे ब्राह्मण, आपके तप के प्रभाव से मेरी बुद्धि निर्मल हो गई है। मैंने बहुत दुष्कर्म किए हैं लेकिन अब मैं आपके साथ तप कर मुक्ति प्राप्त करना चाहता हूं। ब्राह्मण के उत्तर की प्रतीक्षा किए बगैर वह व्यक्ति वहीं बैठ कर भगवान का ध्यान करने लगा। उसके तप के फलस्वरूप वह मुक्ति को प्राप्त हो गया। यह देख ब्राह्मण आश्चर्यचकित रह गए और सोचने लगे कि उनको इतने वर्षों के तप बाद भी मुक्ति नहीं मिली। ऐसे विचार कर ब्राह्मण नदी के मध्य जल में जाकर जप करने लगे।
 
 
कुछ दिनों तक वे ऐसे ही जप करने लगे फिर एक बाघ वहां पर आया जो जल में खड़े ब्राह्मण को खाना चाहता था। तब ब्राह्मण ने ‘नमो नारायण’ का उच्चारण शुरू कर दिया। ब्राह्मण के मुख से निकले नमो नारायण के उच्चारण सुनते ही वह बाघ अपनी देह त्याग उत्तम पुरुष के रूप में परिवर्तित हो गया। ब्राह्मण के पूछने पर उसने बताया कि पूर्वजन्म में वह दीर्घबाहु नाम का प्रतापी राजा था और वह समस्त वेद वेदांत में पारंगत था। इस पर वह अभिमान करता था और ब्राह्मणों को कुछ नही समझता था। ब्राह्मणों के अनादर करने पर उन्होंने क्रोधित हो उसे शाप दिया कि वह वह बाघ योनि को प्राप्त हो कष्ट भोगेगा। तब उसने ब्राह्मणों की स्तुति की एवं कहा- हे ब्राह्मण श्रेष्ठजन, में आप सभी का तेज जान गया हूं। आप ही में से अगस्त्य मुनि ने समुद्र को जब अभिमान हुआ तो उसे पीकर खारा कर दिया था। उसका जल पीने योग्य नहीं रहा। ब्राह्मणों के शाप से ही वातापि राक्षस नष्ट हुआ। भृगु ऋषि के क्रोध से सर्व भक्षी अग्नि हुआ। गौतम मुनि के शाप से इंद्र सहस्त्रयोनि हुए। ब्राह्मणों के शाप से विष्णु को भी दस अवतार लेने पड़े। च्यवन मुनि की कृपा से देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों को सोमरस पीने को मिला। ब्राह्मणों के पराक्रम के ऐसे वचनों को कहता हुआ वह बारम्बार ब्राह्मणों से क्षमा याचना करने लगा।
 
उसकी प्रार्थना से ब्राह्मण प्रसन्न हुए और बोले कि जब तुम क्षिप्रा नदी जाओगे और वहां जल में खड़े किसी ब्राह्मण के मुख से नमो नारायण कहते हुए सुनोगे तो तुम शाप से मुक्त हो बाघ योनि से भी मुक्त हो जाओगे। इस प्रकार ब्राह्मण के मुख से भगवान नारायण का नाम सुनकर उसकी मुक्ति हुई। तब ब्राह्मण उस राजा से बोले कि मेरी मुक्ति कैसे होगी? मुझे तप करते हुए वर्षों हो गए लेकिन अब तक मुझे मुक्ति का मार्ग नहीं मिला। तब उस राजा ने कहा कि आप कृपया महाकाल वन में स्थित मुक्तिलिंग के दर्शन करें। आगे वह बोला, मुक्तिलिंग की महिमा बताने वाले को भी मुक्ति प्राप्त होती है। तब राजा और ब्राह्मण दोनों महाकाल वन स्थित दिव्य मुक्तिलिंग के पास आए और उनके दर्शन मात्र से वे दोनों उस लिंग में समा गए जिससे उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई।
 
दर्शन लाभ:
मान्यतानुसार श्री मुक्तेश्वर महादेव के दर्शन करने से मुक्ति प्राप्त होती है। इस लिंग की पूजा ऋषि-मुनि-देवता आदि भी करते हैं। उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री मुक्तेश्वर महादेव का मंदिर खत्रीवाड़ा में स्थित है।

उज्जैन के 84 महादेव-भाग 13

उज्जैन के 84 महादेव : श्री अनरकेश्वर महादेव (27)

 
प्राचीन समय में एक राजा थे निमि। अपने पुण्य कर्मो के कारण यमराज के दूत उन्हे विमान में लेकर स्वर्ग जा रहे थे। यमदूत उन्हें  दक्षिण मार्ग से नरक के सामने से लेकर जा रहा था। राजा निमि ने वहां करोड़ों लोगों को अपने पापों का फल भुगतते देखा, जिससे उन्हें पीड़ा हो रही थी। उन्होंने यमदूत से पूछा कि मुझे किस कर्म के कारण नरक के सामने से गुजरना पड़ा है, दूत ने कहा कि आपने श्राद्ध के दिन दक्षिणा नहीं दी उसी कर्म के कारण आपको यह फल मिल रहा है। इसके बाद राजा ने पूछा मुझे किस कर्म के कारण स्वर्ग की प्राप्ति हो रही है। इस पर यमदूत ने कहा कि आपने महाकाल वन में अश्विन में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भगवान मनकेश्वर का दर्शन-पूजन किया था, जिसके फलस्वरूप आपको स्वर्ग की प्राप्ति हुई है। 

जैसे ही वे लोग आगे चलने लगे नरक के पापियों ने कहा कि हे राजन आप थोड़ी देर ओर रूकें, आपके शरीर को स्पर्श कर आने वाली वायु पीड़ा में राहत दे रही है। राजा निमि ने दूत से कहा कि वे अब स्वर्ग नहीं जाएंगे ओर यही खड़े रहकर पापियों को सुख देगे। इस पर इंद्र वहां उपस्थित हुए और राजा से स्वर्ग चलने का विनय किया। राजा ने मना किया ओर पूछा कि ये पापी अपने कर्म फल से कैसे मुक्त होंगे? तब इंद्र ने कहा कि यदि आप अपने भगवान के दर्शन का पुण्य फल इन्हें दान कर दें तो सभी मुक्त हो जाएंगे। राजा निमि ने अपना पुण्य फल सभी पापियों  को दान कर दिया, जिससे सभी पापी अपने पाप से मुक्त हो गए। मान्यता है कि अनरकेश्वर के दर्शन मात्र से नरक से मुक्ति मिलती है। अश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को पूजन करने से मनुष्य के सौ जन्मों के पाप नष्ट होते हैं  ओर वह स्वर्ग के सुखों का भोग करता है।

Tuesday, February 16, 2016

उज्जैन के 84 महादेव-भाग 12

उज्जैन के 84 महादेव में 23 वें स्थान पर मेघनादेश्वर महादेव आते हैं .
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय द्वापर और कलियुग की संधि पर मदांध नामक अहंकारी राजा हुआ था। वह राजा दुष्ट प्रवत्ति का था। राजा के दोषों व पापों के कारण बारह वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। वर्षावृष्टि न होने की स्थिति में नदियां सुख गई, तालाब अदृश्य हो गए, यज्ञ वेदाध्ययन आदि सब बंद हो गए। पृथ्वी पर सभी दिशाओं में हाहाकार मच गया। यह देखकर इंद्र आदि देवता क्षीरसागर के उत्तर में श्वेतद्वीप स्थित भगवान जनार्दन के पास गए। वहां पहुंच उन्होंने भगवान को प्रणाम किया एवं उनकी स्तुति करने लगे। तब भगवान ने पूछा कि आप लोग क्यों क्यों पधारे हैं एवं आपकी अभिलाषा क्या है? तब देवतागण बोले कि प्रभु कई वर्षों से वृष्टि नहीं हुई है, कृपया कोई उपाय कीजिए।
देवताओं की बात सुन भगवान जनार्दन कुछ देर के लिए ध्यानमग्न हो गए फिर बोले कि आप सभी कृपया महाकाल वन जाएं। वहां प्रतिहारेश्वर के ईशान कोण में एक दिव्य लिंग है जिसमें वृष्टि करने वाले मेघ निवास करते हैं। आप सब वहां जाएं और भक्ति भाव से उस लिंग का पूजन-अर्चन करें। उनके पूजन-अर्चन से वृष्टि जरूर होगी। श्री भगवान की बात सुन सभी देवगण महाकाल वन स्थित उस दिव्य लिंग के पास पहुंचे और भक्तिमय भाव से स्तुति करने लगे। स्तुति के फलस्वरूप उस लिंग से कई मेघ प्रकट हुए और आकाश में छाकर वृष्टि करने लगे। सम्पूर्ण सृष्टि फिर से सुस्थिर हुई और पृथ्वी के सभी जीव-जंतुओं, पक्षियों तथा मानवों का संताप दूर हुआ। देवतागण इसे अमृत वर्षा मान बेहद प्रसन्न हुए एवं उन्होंने उस लिंग का नाम मेघनादेश्वर रखा।

दर्शन लाभ:
मान्यतानुसार श्री मेघनादेश्वर महादेव के पूजन अर्चन करने से वृष्टि में वृद्धि होती है। ऐसा माना जाता है कि यहां दर्शन करने से पितरों को शांति मिलती है। उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री मेघनादेश्वर महादेव छोटा सराफा में नृसिंह मंदिर के पीछे स्थित है।
24वें स्थान पर महालयेश्वर महादेव आते हैं .
एक बार पार्वती जी ने शिव जी से पूछा कि सारे संसार में चर-अचर जो दिखाई देता है ओर जो सुनाई देता है सभी आप ने उत्पन्न किया है। इसके साथ ही संपूर्ण जगत आप में ही लीन होता है। इस पर शिव ने कहा देवी पार्वती महाकाल वन में प्रलय के समय मेरे लिंग का नाम महालयेश्वर है।
इस शिवलिंग से ब्रम्हा, विष्णु, देवी-देवता, भूत, बुद्धि, प्रज्ञा, धृति, ख्याति, स्मृति, लज्जा, सरस्वति सभी उत्पन्न हुए हैं और प्रलय के समय सभी इसी में लीन होते हैं। मान्यता है कि जो भी इस शिवलिंग का पूजन करता है। वह त्रिलोक विजयी होता है।

उज्जैन के 84 महादेव-भाग 11

उज्जैन के 84 महादेव में 21 वें स्थान पर श्री कुक्कुटेश्वर महादेव आते हैं .
प्राचीन समय में कौषिक नाम के राजा हुआ करते थे। वे अपनी प्रजा का ध्यान रखते थे और उनके राज्य में सभी सुख सुविधाएं थीं। राजा कौषिक दिनभर मनुष्य रूप में रहते थे और रात को कुक्कुट (मुर्गे) का रूप ले लेते थे। इस कारण उनकी रानी विशाला हमेशा दुःखी रहती थी। राजा के कुक्कुट रूप लेने के कारण वे रति सुख का आनंद नहीं ले पाती थीं। एक दिन रानी ने दुःख के कारण मरने का विचार किया और वह गालव ऋषि के पास पहुंची। विशाला ने अपना दुख गालव ऋषि को बताते हुए इसका कारण पूछा।
गालव ऋषि ने बताया कि तुम्हारा पति पूर्व जन्म में राजा विदूरत का पुत्र था। वह विषयासक्त होकर मांसाहारी हो गया एवं अनेक कुक्कुटों का भक्षण किया। इस कारण क्रुद्ध होकर कुक्कुटों के राजा ताम्रचूड़ ने उसे श्राप दिया कि वह क्षय रोग से पीडित होगा। श्राप के कारण वह क्षीण होने लगा। राजकुमार कौषिक वामदेव मुनि के पास गया और अपने रोग का कारण पूछा। वामदेव मुनि ने ताम्रचूड़ की बात बताई। राजकुमार ने मुनि से श्रापमुक्ति का उपाय पूछा। मुनि ने उसे ताम्र्चूर्ण के पास जाने को कहा . ताम्रचुड़ ने कहा तुम निरोगी रहोगे और शासन करोगे परन्तु रात को अदृश्य हो जाओगे।
रानी ने गालव ऋषि से श्राप मुक्ति का उपाय पूछा तो उन्होनें बताया कि महाकाल वन में पक्षी योनि विमोचन लिंग जबलेश्वर के पास स्थित है वहां जाओ और उनका पूजन करो। राजा रानी महाकाल वन में आए और शिवलिंग का पूजन किया। रात्रि होने पर राजा कौषिक अदृश्य नहीं हुआ और रानी के साथ रति सुख को प्राप्त किया। मान्यता है कि इस कुक्कुटेश्वर शिवलिंग के दर्शन से कोई भी पितृ नरक को प्राप्त नहीं होता।
22 वें स्थान पर श्री कर्कटेश्वर महादेव आते हैं .
कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में धर्ममूर्ति नामक एक प्रतापी राजा थे। देवराज इंद्र की सहायता से उन्होंने सैकड़ों दैत्यों का संहार किया। वह तेजस्वी राजा इच्छानुसार अपना शरीर बनाने में सक्षम थे एवं सदा युद्ध में विजयी होते थे जिससे उनकी कीर्ति समस्त दिशाओं में फैली हुई थी। उनकी पत्नी भानुमति थी जो उनकी दस हज़ार रानियों में श्रेष्ठ थी और जो सदैव धर्म परायण रहती थी। पूर्ण वैभव, कीर्ति और सुख से सुसज्जित राजा ने एक बार अपने महर्षि वशिष्ठ से पूछा कि मुझे कीर्ति व उत्तम लक्ष्मी स्त्री किस कृपा से, किस पुण्य से प्राप्त हुई है।

प्रत्युत्तर में वशिष्ठ मुनि बोले कि पहले पूर्वजन्म में आप शुद्र राजा थे और कई दोषों से युक्त थे। आपकी यह स्त्री भी दुष्ट स्वभाव वाली थी। जब आपने शरीर त्यागा तब आप नरक में गए जहां कई यातनाएं आपको सहनी पड़ीं। वहां अनेक यातनाओं के बाद आपको यमराज ने केकड़े के रूप में जन्म दिया और आप महाकाल वन के रुद्रसागर में रहने लगे। महाकाल वन स्थित रुद्रसागर में जो मनुष्य दान, जप, तप आदि करता है वो अक्षय पुण्य को प्राप्त होता है। पांच वर्ष तक आप उसमें रहे फिर आप जब बाहर निकले तब एक कौआ आपको अपनी चोंच में भरकर आसमान में उड़ने लगा। तब आपने अपने पैरों से कौवे से बचने के लिए प्रहार किए जिसके फलस्वरूप आप उसकी चोंच से छूट गए। कौवे की चोंच से छूट आप स्वर्गद्वारेश्वर के पूर्व में स्थित एक दिव्य लिंग के पास गिरे और गिरते ही उस दिव्य लिंग के प्रभाव से आपने केकड़े का देह त्याग दिव्य विद्याधर के समान देह प्राप्त की। फिर जब आप अन्य शिवगणों के साथ शामिल हो स्वर्ग की ओर जा रहे थे तभी मार्ग में देवताओं ने शिवगणों से आपके बारे में पूछा। तब उन शिवगणों ने शिव लिंग के प्रभाव से आपके केकड़ा योनि से मुक्त होने के बारे में बताया तभी से इस दिव्य लिंग का नाम कर्कटेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी लिंग के माहात्म्य के कारण ही आपको पहले स्वर्ग की और फिर राज की प्राप्ति हुई है। महर्षि की बातें सुनकर राजा तुरंत महाकाल वन स्थित स्वर्गद्वारेश्वर के पूर्व में स्थित शिवालय पहुंचे और वहां ध्यानमग्न हो गए।
दर्शन लाभ:
मान्यतानुसार जो भी श्रद्धालु श्री कर्कटेश्वर महादेव के दर्शन करते हैं उनके योनि दोष दूर होते हैं एवं वे शिवलोक को प्राप्त करते हैं। यहां दर्शन बारह मास किए जा सकते हैं लेकिन अष्टमी और चतुर्दशी के दिन दर्शन का विशेष महत्व माना गया है। उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री कर्कटेश्वर महादेव का मंदिर खटिकवाड़ा में स्थित है।