Thursday, March 15, 2012

वैष्णो देवी चालीसा


वैष्णो देवी चालीसा



मात् स्वरूपा सर्व गुणी वैष्णो कष्ट निदान !!

शक्ति भक्ति दो हमको , दिव्य शक्ति की ख़ान !!

अभय दायिनी भय मोचनी, करुणा की अवतार !!

संकट त्रस्त भक्तों का,अब कर भी दो उद्धार !!

!! जय जय अंबे जय जगदम्बे !!

गुफा निवासिनी मंगला माता ! दया तुम्हारी जग विख्याता !!

अल्प बुद्धि हम हैं अज्ञानी ! ज्ञान उजियारा दो महारानी !!

दुख सागर से हमें निकालो ! भ्रम के भूतों से हमें बचा लो !!

पूत के सब अवरोध हटाना ! अपनी छाया में हमें छुपाना !!४

!! जय जय अंबे जय जगदम्बे !!

भक्त वत्सला भव भय हरिणी ! आदि अनंत मातु जग जननी !!

दिव्य ज्योति जहाँ होये उजागर ! वहाँ उदय हो धर्म दिवाकर !!

पाप नाशिनी पुण्य की गंगा ! तेरी सुधा से तरें कुसंगा !!

अमृतमयी तेरी मधुकर वाणी ! हर लेती अभिमान भवानी !!८

!! जय जय अंबे जय जगदम्बे !!

सुखद सामग्री दो भक्तन को ! करो फल दायक मेरी चिंतन को !!

दुख में न विचलित होने देना ! धीरज धर्म न खोने देना !!

उत्साह वर्धक कला तुम्हारी ! मार्ग दर्शक बनो तुम हमारी !!

घेरे कभी जो विषम अवस्था ! तू ही सुझाना माँ कोई रस्ता !!१२

!! जय जय अंबे जय जगदम्बे !!

माया द्वेष के विषधर काले ! हैं सदभाव को डसनेवाले !!

उनपर अंकुश सदा लगाना ! दुर्गुण को सद्गुण से मिटाना !!

परम तृप्ति का जल दे देना ! दुर्बल काया को बल देना !!

आत्मिक शांति के हम अभिलाषी ! हमें बना दे दृण विश्वासी !!१६

!! जय जय अंबे जय जगदम्बे !!

बसी हो तुम श्रीधर के मन में ! ज्योत तुम्हारी है कन कन में !!

हम अभिषेक माँ करें तुम्हारा ! कर दो माँ उद्धार हमारा !!

विकट लंगूर हैं प्रहरी तेरे ! भजे तुम्हे माँ सांझ सवेरे !!

विश्व विजयी है तेरी शक्ति ! भव निधि तारक पावन भक्ति !!२०

!! जय जय अंबे जय जगदम्बे !!

विघ्न हरण जग पालन कारी ! सिंह वाहिनी मैया प्यारी !!

कृपा दृष्टि हम पर कर देना ! सच्चे सुख की वृष्टि करना !!

यश गौरव सम्मान बढ़ाना ! प्रतिभा का सूरज चमकाना !!

स्वच्छ सार्थक श्रद्धा देना ! शरण में अपनी तुम ले लेना !!२४

!! जय जय अंबे जय जगदम्बे !!

शारदा, लक्ष्मी और महाकाली ! तीनो का संगम बलशाली !!

रखना सिरों पे हाथ हमारे ! सदा ही रहियो साथ हमारे !!

संकट विपदा भव भय हरना ! दुर्गम काज सुगम माँ करना !!

हे दिव्य ज्योति सर्व व्यापक ! तेरी दया के हम हैं याचक !!२८

!! जय जय अंबे जय जगदम्बे !!

बुद्धि विवेक विद्या दायिनी ! शक्ति तुम्हारी है रसायनी !!

रोग शोक संताप को हरती ! दुर्लभ वस्तु सुलभ है करती !!

जाप तेरा जब रंग दिखाता ! भावसागर जल सूख है जाता !!

रत्नो से घर भर दो मैया ! विष को अमृत कर दो मैया !!३२

!! जय जय अंबे जय जगदम्बे !!

भक्ति सुमन जो करते अर्पण ! धो देती उनके मन दर्पण !!

हे त्रिभुवन की सिरजन हारी ! सदा ही रखियो लाज हमारी !!

सुखमय जीवन का वर देना ! सकल मनोरथ सिद्ध कर देना !!

हिम पर्वत पर रहनेवाली ! करना आश्रित की रखवाली !!३६

!! जय जय अंबे जय जगदम्बे !!

दैत्यों की संघारक माता ! सबकी कष्ट निवारक माता !!

अखिल विश्व है तेरे सहारे ! रोम रोम तेरा नाम उच्चारे !!

स्वामिनी हो हम सब पूतन की ! त्रैलोकी के आवागमन की !!

हाथ दया का सिर पर रखना ! हे मंगला, अमंगल हरना !!४०

!! जय जय अंबे जय जगदम्बे !!

वैष्णो मैया रक्षा करना हम भक्तो की सर्वदा |

दूर भगाना जब भी आये हम पर कोई आपदा ||

हर हर हर महादेव।

हर हर हर महादेव।



सत्य, सनातन, सुन्दर शिव! सबके स्वामी।

अविकारी, अविनाशी, अज, अन्तर्यामी॥

हर हर हर महादेव।



आदि, अनन्त, अनामय, अकल कलाधारी।

अमल, अरूप, अगोचर, अविचल, अघहारी॥

हर हर हर महादेव।



ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, तुम त्रिमूर्तिधारी।

कर्ता, भर्ता, धर्ता तुम ही संहारी॥

हर हर हर महादेव।



रक्षक, भक्षक, प्रेरक, प्रिय औघरदानी।

साक्षी, परम अकर्ता, कर्ता, अभिमानी॥

हर हर हर महादेव।



मणिमय भवन निवासी, अति भोगी, रागी।

सदा श्मशान विहारी, योगी वैरागी॥

हर हर हर महादेव।



छाल कपाल, गरल गल, मुण्डमाल, व्याली।

चिताभस्मतन, त्रिनयन, अयनमहाकाली॥

हर हर हर महादेव।



प्रेत पिशाच सुसेवित, पीत जटाधारी।

विवसन विकट रूपधर रुद्र प्रलयकारी॥

हर हर हर महादेव।



शुभ्र-सौम्य, सुरसरिधर, शशिधर, सुखकारी।

अतिकमनीय, शान्तिकर, शिवमुनि मनहारी॥

हर हर हर महादेव।.



निर्गुण, सगुण, निर†जन, जगमय, नित्य प्रभो।

कालरूप केवल हर! कालातीत विभो॥

हर हर हर महादेव।



सत्, चित्, आनन्द, रसमय, करुणामय धाता।

प्रेम सुधा निधि, प्रियतम, अखिल विश्व त्राता।

हर हर हर महादेव।



हम अतिदीन, दयामय! चरण शरण दीजै।

सब विधि निर्मल मति कर अपना कर लीजै।

हर हर हर महादेव।

हर हर हर महादेव।.

Wednesday, March 14, 2012

शीतलाष्टकं .


शीतला अष्टक

वन्देऽहं शीतलां-देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम्।

मार्जनी-कलशोपेतां, शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम्।।



वन्देऽहं शीतलां-देवीं, सर्व-रोग-भयापहाम्।
यामासाद्य निवर्तन्ते, विस्फोटक-भयंमहत्।।



शीतले शीतले चेति, यो ब्रूयाद् दाह-पीडितः।
विस्फोटक-भयं घोरं, क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति।।



यस्त्वामुदक-मध्ये तु, ध्यात्वा पूजयते नरः।
विस्फोटक-भयं घोरं, गृहे तस्य न जायते।।



शीतले! ज्वर-दग्धस्य पूति-गन्ध-युतस्य च।
प्रणष्ट-चक्षुषां पुंसां , त्वामाहुः जीवनौषधम्।।



शीतले! तनुजान् रोगान्, नृणां हरसि दुस्त्यजान्।
विस्फोटक-विदीर्णानां, त्वमेकाऽमृत-वर्षिणी।।



गल-गण्ड-ग्रहा-रोगा, ये चान्ये दारुणा नृणाम्।
त्वदनुध्यान-मात्रेण, शीतले! यान्ति सङ्क्षयम्।।



न मन्त्रो नौषधं तस्य, पाप-रोगस्य विद्यते।
त्वामेकां शीतले! धात्री, नान्यां पश्यामि देवताम्।।


।।फल-श्रुति।।



मृणाल-तन्तु-सदृशीं, नाभि-हृन्मध्य-संस्थिताम्।
यस्त्वां चिन्तयते देवि! तस्य मृत्युर्न जायते।।



अष्टकं शीतलादेव्या यो नरः प्रपठेत्सदा।
विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते।।



श्रोतव्यं पठितव्यं च श्रद्धाभाक्तिसमन्वितैः।
उपसर्गविनाशाय परं स्वस्त्ययनं महत्।।



शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता।
शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः।।



रासभो गर्दभश्चैव खरो वैशाखनन्दनः।
शीतलावाहनश्चैव दूर्वाकन्दनिकृन्तनः।।



एतानि खरनामानि शीतलाग्रे तु यः पठेत्।
तस्य गेहे शिशूनां च शीतलारुङ् न जायते।।



शीतलाष्टकमेवेदं न देयं यस्यकस्यचित्।
दातव्यं च सदा तस्मै श्रद्धाभक्तियुताय वै।।


।।इति श्रीस्कन्दपुराणे शीतलाष्टकं सम्पूर्णम् ।।

Tuesday, March 13, 2012

संकटमोचन संकट हर लो

जय महावीर मारूतनंदन ,
आरती नमन स्‍वीकार करो।
संकटमोचन संकट हर लो ,
बाधाओं का प्रतिकार करो।।

सागर को पार किया तुमने,
अरिपुर को छार किया तुमने ,
सबपर उपकार किया तुमने ,
इस जन का भी उद्धार करो।।
संकटमोचन संकट हर लो ,
बाधाओं का प्रतिकार करो।।

जय कपिवर द्रोणाचल धारी ,
रघुनायक तक हैं आभारी ,
शरणागत के दुःख भयकारी ,
सुखमय सबका संसार करो।।
संकटमोचन संकट हर लो ,
बाधाओं का प्रतिकार करो।।

बलवान निरोग रहे काया,
व्‍यापे न कभी कलि की माया,
मन हो प्रभुपद में लपटाया,
ऐसा वरदान उदार करो।। 
संकटमोचन संकट हर लो ,
बाधाओं का प्रतिकार करो।।

विभीषणकृतं हनुमत्स्तोत्रम्

विभीषणकृतं हनुमत्स्तोत्रम्

श्रीसुदर्शनसंहिता में भक्त प्रवर विभीषण महात्मा गरुड़ को श्रीमारुति की महिमा सुनाते हुए कहते हैं कि सर्व प्रकार के भय, बाधा, संताप तथा दुष्ट गृहजन्य समस्त संकटों का उन्मूलन करने वाला श्री हनुमान जी का यह स्तोत्र है। कल्याणकांक्षी मनुष्य यदि नित्य प्रति इसका पाठ करता है तो वह सर्वबाधाजन्य संकटों से मुक्त हो मारुति की कृपा से सुख, शान्ति एवं समृद्धि को प्राप्त करता है। स्तोत्र इस प्रकार है –



नमो हनुमते तुभ्यं नमो मारुतसूनवे।
नम: श्रीरामभक्ताय श्यामास्याय च ते नम:।। 1।।



नमो वानरवीराय सुग्रीवसख्यकारिणे।
लंकाविदाहनार्थय हेलासागरतारिणे।। 2।।



सीताशोकविनाशाय राममुद्राधराय च।
रावणान्तकुलच्छेदकारिणे ते नमो नम:।। 3।।


मेघनादमखध्वंसकारिणे ते नमो नम:।

अशोकवनविध्वंसकारिणे भयहारिणे।। 4।।



वायुपुत्राय वीराय आकाशोदरगामिने।
वनपालशिरश्छेदलंकाप्रासादभज्जिने।। 5।।



ज्वल्तकनकवर्णाय दीर्घलाङ्गूलधारिणे।
सौमित्रिजयदात्रे च रामदूताय ते नम:।। 6।।



अक्षस्य वधकत्र्रे च बह्मपाशनिवारिणे।
लक्ष्मणांगमहाशक्तिघातक्षतविनाशिने।। 7।।



रक्षोघ्नाय निपुघ्नाय भूतघ्नाय च ते नम:।
ऋक्षवानरवीरौघप्राणदाय नमो नम:।। 8।।



परसैन्यबलध्नाय शस्त्रास्त्रघ्नाय ते मन:।
विषध्नाय द्विषघ्नाय ज्वरघ्नाय च ते नम:।। 9।।



महाभयरिपुघ्नाय भक्तत्राणैककारिणे।
परप्रेरितमन्त्राणां यन्त्राणां स्तम्भकारिणी।। 10।।



पय:पाषाणतरणकारणाय नमो नम:।
बालार्कमण्डलग्रासकारिणे भवतारिणे।। 11।।



नखायुधाय भीमाय दन्तायुधधराय च।
रिपुमायाविनाशाय रामाज्ञालोकरक्षिणे।। 12।।



प्रतिग्रामस्थितायाथ रक्षोभूतवधार्थिने।
करालशैलशस्त्राय दु्रमशस्त्राय ते नम:।। 13।।



बालैकब्रह्मचर्याय रुद्रमूर्तिधराय च।
विहंगमाय सर्वाय वज्रदेहाय ते नम:।। 14।।



कौपीनवाससे तुभ्यं रामभक्तिरताय च।
दक्षिणाशाभास्कराय शतचन्द्रोदयात्मने।। 15।।



कृत्याक्षतव्याथाघ्नाय सर्वक्लेशहराय च।
स्वाम्याज्ञापार्थसंग्रामसंख्ये संजयधारिणे।।16।।



भक्तान्तदिव्यवादेषु संग्रामे जयदायिने।
किल्किलाबुबुकोच्चारघोरशब्दकराय च।।17।।



सर्पाग्निव्याधिसंत्तम्भकारिणी वनचारिणे।
सदा वनफलाहारसंतृप्ताय विशेषत:।।18।।



महार्णवशिलाबद्धसेतुबन्धाय ते नम:।
वादे विवादे संग्रामे भये घोरे महावने।।19।।



सिंहव्याघ्रादिचौरेभ्य: स्तोत्रपाठाद् भयं न हिं
दिव्ये भूतभये व्याधौ विषे स्थावरजंगमे।।20।।



राजशस्त्रभये चोग्रे तथा ग्रहभयेषु च।
जले सर्वे महावृष्टौ दुर्भिक्षे प्राणसम्प्लवे।।21।।



पठेत् स्तोत्रं प्रमुच्यते भयेभ्य: सर्वतो नर:।
तस्य क्वापि भयं नास्ति हनुमत्स्तवपाठत:।।22।।



सर्वदा वै त्रिकालं च पठनीयमिमं स्तवम्।
सर्वान् कामानवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा।। 23।।



विभषणकृतं स्तोत्रं ताक्ष्र्येण समुदीरितम्।
ये पठिष्यन्ति भक्त्या वै सिद्धयस्तत्करे स्थिता:।। 24।।


इति श्रीसुदर्शनसंहितायां विभीषणगरुडसंवादे विभीषणकृतं हनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम्।

Sunday, March 11, 2012

भद्रा

भद्रा की उत्पत्रि के विषय में ऐसा माना जाता है कि दैत्यों को मारने के लिए भद्रा गर्दभ (गधा) के मुख और लंबे पुछँ और तीन पैर युक्त उत्पन्न हुई है। शुभ कार्यों में भद्रा त्यागना ही उचित माना जाता है |
भद्रा पंचांग के पांच अंगों में से एक करण पर आधारित है |यह एक अशुभ योग है। भद्रा (विष्टि करण ) में अग्नि लगाना, किसी को दंड देना इत्यादि दुष्ट कर्म तो किये जा सकते हैं पर मांगलिक कर्म करना वर्जित है |
पौराणिक कथा के अनुसार भद्रा भगवान सूर्य नारायण और पत्नी छाया की कन्या है | भद्रा का स्वरुप काले वर्ण, लंबे केश तथा बड़े दांतं वाली तथा भयंकर रूप वाली कन्या है।
जन्म लेते ही भद्रा यज्ञों में विघ्न -बाधा पहुंचाने लगी और मंगल-कार्यों में उपद्रव करने लगी तथा सम्पूर्ण जगत को पीड़ा पहुंचाने लगी। उसके दुष्ट स्वभाव को देख कर सूर्य देव को उसके विवाह की चिंता होने लगी और वे सोचने लगे कि इस दुष्टा कुरूपा कन्या का विवाह कैसे होगा |सभी ने सूर्य देव के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया
सूर्य देव ने तब ब्रह्मा जी से उचित परामर्श माँगा |ब्रह्मा जी तब विष्टि से कहा कि -'भद्रे, बव, बालव, कौलव आदि करणों के अंत में तुम निवास करो तथा जो व्यक्ति तुम्हारे समय में गृह प्रवेश तथा अन्य मांगलिक कार्य करे, तो तुम उन्ही में विघ्न डालो , जो तुम्हारा आदर न करे, उनका कार्य तुम बिगाड़ देना। इस प्रकार विष्टि को उपदेश देकर बृह्मा जी अपने लोक चले गए ।
बृह्मा जी की सुनकर विष्टि अपने समय में ही देव-दानव-मानव समस्त प्राणियों को कष्ट देती हुई घूमने लगी। इस प्रकार भद्रा की उत्पत्ति हुई।
भद्रा का दूसरा नाम विष्टि करण है । कृष्णपक्ष की तृतीया , दशमी और शुक्ल पक्ष की चर्तुथी, एकादशी के उत्तरार्ध में एवं कृष्णपक्ष की सप्तमी चतुर्दसी , शुक्लपक्ष की अष्टमी पूर्णमाशी के पूर्वार्ध में भद्रा रहती है।
जिस भद्रा के समय चन्द्रमा मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिक राशि में स्थित तो भद्रा निवास स्वर्ग में होता है ।यदि चन्द्रमा कन्या, तुला, धनु, मकर राशि में हो तो भद्रा पाताल में निवास करती है और कर्क , सिंह, कुंभ, मीन राशी का चन्द्रमा हो तो भद्रा का भुलोक पर निवास रहता है। शास्त्रों के अनुसार भुलोक की भद्रा सबसे अधिक अशुभ मानी जाती है। तिथि के पूर्वार्ध की दिन की भद्रा कहलाती है। तिथि के उत्तरार्ध की भद्रा को रात की भद्रा कहते हैं | यदि दिन की भद्रा रात के समय और रात्री की भद्रा दिन के समय आ जाय तो भद्रा को शुभ मानते हैं |
यदि भद्रा के समय कोई अति आवश्यक कार्य करना हो तो भद्रा की प्रारम्भ की ५ घटी जो भद्रा का मुख होती है , अवश्य त्याग देना चाहिए |

भद्रा पांच घटी मुख में , दो घटी कंठ में , ग्यारह घटी ह्रदय में और चार घटी पुच्छ में स्थित रहती है।
शास्त्रोक्त मत
• जब भद्रा मुख में रहती है तो कार्य का नाश होता है ।
• जब भद्रा कण्ठ में रहती है तो धन का नाश होता है ।
• जब भद्रा हृदय में रहती है तो प्राण का नाश होता है ।
• जब भद्रा पुच्छ में होती हं, तो विजय की प्राप्त एवं कार्य सिद्ध होते है।
भद्रा के दुष्प्रभावों से बचने के लिए व्रत इत्यादि बताया गया है | पर एक आसान उपाय भद्रा के १२ नामों का जप करना है |
धन्या दधमुखी भद्रा महामारी खरानना।
कालारात्रिर्महारुद्रा विष्टिस्च कुल पुत्रिका |
भैरवी च महाकाली असुराणां क्षयन्करी |
द्वादशैव तु नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्॥
न च व्याधिर्भवैत तस्य रोगी रोगात्प्रमुच्यते |
गृह्यः सर्वेनुकूला: स्यर्नु च विघ्रादि जायते |

Sunday, March 4, 2012

द्वादशज्योतिर्लिंगस्तोत्रम्.


द्वादशज्योतिर्लिंगस्तोत्रम्
सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये।।1।।

श्रीशैलशृंगे विबुधातिसंगे तुलाद्रितुंगेऽपि मुदा वसन्तम्।
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम्।।2।।

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्।।3।।

कावेरिकानर्मदयो: पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय।
सदैव मान्धातृपुरे वसन्तमोंकारमीशं शिवमेकमीडे।।4।।

पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम्।
सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि।।5।।

याम्ये सदंगे नगरेतिऽरम्ये विभूषितांगम् विविधैश्च भोगै:।
सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये।।6।।

महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।
सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यै: केदारमीशं शिवमेकमीडे।।7।।

सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरीतीरपवित्रदेशे।
यद्दर्शनात् पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्रयम्बकमीशमीडे।।8।।

सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यै:।
श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि।।9।।

यं डाकिनीशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च।
सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शंकरं भक्तहितं नमामि।।10।।

सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम्।
वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये।।11।।

लापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम्।
वन्दे महोदारतरं स्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये॥ 12॥

ज्योतिर्मयद्वादशलिंगकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण।
स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च॥ 13॥