जय माँ शैलपुत्री
जय माँ शैलपुत्री प्रथम, दक्ष की हो संतान।
नवरात्रे के पहले दिन करें आपका ध्यान ॥
अग्नि कुण्ड में जा कूदी, पति का हुआ अपमान।
अगले जनम में पा लिया शिव के पास स्थान ॥
राजा हिमाचल से मिला पुत्री बन सम्मान।
उमा नाम से पा लिया देवों का वरदान ॥
सजा है दाये हाथ में संघारक त्रिशूल।
बाए हाथ में ले लिया खिला कमल का फूल ॥
बैल है वाहन आपका, जपती हो शिव नाम।
दर्शन ने आनंद मिले अम्बे तुम्हे प्रणाम ॥
नवरात्रों की माँ, कृपा कर दो माँ।
जय माँ शैलपुत्री, जय माँ शैलपुत्री ॥
Thursday, March 22, 2012
Wednesday, March 21, 2012
अपनी भारत की संस्कृति को पहचाने
''अपनी भारत की संस्कृति को पहचाने ---
दो पक्ष - कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष !
तीन ऋण - देव ऋण, पित्र ऋण एवं ऋषि त्रण !
चार युग - सतयुग , त्रेता युग , द्वापरयुग एवं कलयुग !
चार धाम - द्वारिका , बद्रीनाथ, जगन्नाथ पूरी एवं रामेश्वरम धाम !
चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं श्रन्गेरिपीठ !
चर वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद !
चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास !
चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार !
पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र एवं गोबर , !
पञ्च देव - गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य !
पंच तत्त्व - प्रथ्वी , जल , अग्नि , वायु एवं आकाश !
छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय , सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं दक्षिण मिसांसा !
सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम , अत्री , वशिष्ठ और कश्यप !
सप्त पूरी - अयोध्या पूरी , मथुरा पूरी , माया पूरी ( हरिद्वार ) , कशी , कांची ( शिन कांची - विष्णु कांची ) , अवंतिका और द्वारिका पूरी !
आठ योग - यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान एवं समाधी !
आठ लक्ष्मी - आग्घ , विद्या , सौभाग्य , अमृत , काम , सत्य , भोग , एवं योग लक्ष्मी !
नव दुर्गा - शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा , कुष्मांडा , स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं सिद्धिदात्री !
दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण , इशान , नेत्रत्य , वायव्य आग्नेय ,आकाश एवं पाताल !
मुख्या ग्यारह अवतार - मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह , बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम , बुद्ध , एवं कल्कि !
बारह मास - चेत्र , वैशाख , ज्येष्ठ ,अषाड़ , श्रावन , भाद्रपद , अश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष . पौष , माघ , फागुन !
बारह राशी - मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह , तुला , ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ , एवं कन्या !
बारह ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ , मल्लिकर्जुना , महाकाल , ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ , त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर , भीमाशंकर एवं नागेश्वर !
पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा , द्वतीय , तृतीय , चतुर्थी , पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , एकादशी , द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावश्या !
स्मृतियाँ --मनु , विष्णु, अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य , उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , कात्यायन , ब्रहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष , शातातप , वशिष्ठ !
दो पक्ष - कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष !
तीन ऋण - देव ऋण, पित्र ऋण एवं ऋषि त्रण !
चार युग - सतयुग , त्रेता युग , द्वापरयुग एवं कलयुग !
चार धाम - द्वारिका , बद्रीनाथ, जगन्नाथ पूरी एवं रामेश्वरम धाम !
चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं श्रन्गेरिपीठ !
चर वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद !
चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास !
चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार !
पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र एवं गोबर , !
पञ्च देव - गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य !
पंच तत्त्व - प्रथ्वी , जल , अग्नि , वायु एवं आकाश !
छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय , सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं दक्षिण मिसांसा !
सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम , अत्री , वशिष्ठ और कश्यप !
सप्त पूरी - अयोध्या पूरी , मथुरा पूरी , माया पूरी ( हरिद्वार ) , कशी , कांची ( शिन कांची - विष्णु कांची ) , अवंतिका और द्वारिका पूरी !
आठ योग - यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान एवं समाधी !
आठ लक्ष्मी - आग्घ , विद्या , सौभाग्य , अमृत , काम , सत्य , भोग , एवं योग लक्ष्मी !
नव दुर्गा - शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा , कुष्मांडा , स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं सिद्धिदात्री !
दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण , इशान , नेत्रत्य , वायव्य आग्नेय ,आकाश एवं पाताल !
मुख्या ग्यारह अवतार - मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह , बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम , बुद्ध , एवं कल्कि !
बारह मास - चेत्र , वैशाख , ज्येष्ठ ,अषाड़ , श्रावन , भाद्रपद , अश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष . पौष , माघ , फागुन !
बारह राशी - मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह , तुला , ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ , एवं कन्या !
बारह ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ , मल्लिकर्जुना , महाकाल , ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ , त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर , भीमाशंकर एवं नागेश्वर !
पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा , द्वतीय , तृतीय , चतुर्थी , पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , एकादशी , द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावश्या !
स्मृतियाँ --मनु , विष्णु, अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य , उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , कात्यायन , ब्रहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष , शातातप , वशिष्ठ !
Tuesday, March 20, 2012
श्री हनुमान चालीसा (भाग-1)
।। श्री हनुमते नम: ।।
श्री हनुमान चालीसा
हमारी भारतीय संस्कृति में राम और कृष्ण की भांति हनुमानजी भी संस्कृति के आधार स्तंभ तथा निष्ठा के केन्द्र हैं । प्रत्येक भारतीय के हृदयमें उनका प्रेम शासन अभी भी चल रहा है । हनुमानजी भक्तों में ज्येष्ठ , श्रेष्ठ तथा अपूर्व हैं । ‘‘नर अपनी करनी करे तो नर का नारायण हो जाए’’ । इस प्रकार हनुमानजी ने अपने अंदर देवत्व स्वयं निर्माण किया है । मानव भी उच्च ध्येय और आदर्श रखें तो देवत्व प्राप्त कर सकता है । हनुमानजी ने अपने कर्तव्य से देवत्व प्राप्त किया है । हनुमान जी की स्वतंत्र उपासना की जा सकती है और उनका स्वतंत्र मंदिर भी हो सकता है । जिस प्रकार भगवान शिव का शिवालय नंदी के बिना अधूरा रहता है । उसी प्रकार भगवान श्रीराम के देवालय की पूर्णता हनुमान के मूर्ति के बिना अधूरी रहती है । परन्तु हनुमानजी के मंदिर में रामजी की मूर्ति नहीं भी है तो भी चलेगा , ऐसी अलौकिकता हनुमानजी में है । जन-समुदाय में रामजी के समान ही आदरणीय स्थान हनुमानजी को प्राप्त हुआ है । हनुमानजी की रामजी के प्रति एकनिष्ठता और एकनिष्ठ भक्ति अपूर्व है ।
गोस्वामी तुलसीदासजी को भगवान श्रीराम के दर्शन हनुमानजी की कृपासे ही प्राप्त हुए थे। इसीलिए गोस्वामीजी ने हनुमानजी को अपना गुरु माना है । तथा हनुमानजी के प्रति उनकी अपार श्रध्दा थी । तुलसीदासजी ने हनुमानजी पर कई रचनायें की है जैसे हनुमान चालीसा, बजरंगबाण, हनुमान बाहुक इत्यादि, उन्हीमें से हनुमान चालीसा एक है । ‘‘हनुमान चालीसा’’ उनके द्वारा रचित एक बहुत ही सिद्ध एवं लोकप्रिय ग्रंथ है ।
‘हनुमान चालीसा’ में उन्होने हनुमानजी के चरित्र तथा गुणों का वर्णन किया है । नियमित श्रध्दासे भक्ति-भावसे यदि हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तो मनुष्य मनवांछित फल पाता है तथा उसकी मनोकामना पूर्ण होती है ।
आज मानव जीवन जड, भोगवादी तथा भावशून्य बनता जा रहा है । जहाँ थोडी बहुत धार्मिकता एवं अध्यात्मिकता है, वहाँ दम्भ तथा दिखावे का प्रदर्शन ज्यादा हो रहा है । ऐसी विषम स्थिति में मनुष्यमात्र के लिए विषेश तया युवकों और बालकों के लिए भक्त श्रेष्ठ श्री महावीर हनुमानजी की उपासना अत्यंत आवश्यक है । क्योंकि उनके चरित्र से हमें ब्रम्हचर्य व्रतपालन, चरित्र रक्षण, बल, बुध्दि, विद्या इत्यादि गुणों का विकास करने की शिक्षा प्राप्त होती है । हनुमानजी अपने भक्तों को बुध्दि प्रदान कर के उनकी रक्षा करतें है ।
हनुमानजी में राम का नाम और राम का काम, भक्ति और सेवा का अद्भुत समन्वय दिखायी देता है । विचारोंकी उत्तमता के साथ भगवान में अनुरक्ति और सेवा व्यक्ति के पूर्ण विकास की द्योतक है, जो हनुमानजी के चरित्र में देखी जा सकती है । जीवनमें केवल राम-राम रटने से काम नहीं चलता। रामका नाम और राम का काम दोनों का जीवनमें समन्वय होना चाहिए, यह हनुमानजी के चरित्र से हमें सीखने को मिलता है । हनुमानजी जिस तरह हर पल रामजी का ध्यान तथा स्मरण करते थे उसी प्रकार रामजी का काम करने को हर पल तैयार रहते थे । ‘‘राम काज करिबे को आतुर’’ ऐसा ‘हनुमान चालीसा’ में उल्लेख है । उसी प्रकार हमें भी भगवान के कार्य के लिए हरपल कटिबद्ध होना चाहिए । तथा हनुमानजी की भांति हमारे मन को सुंदर, सुगंधित, हृदय को मृदुल तथा बुद्धि को सुन्दर बनाना होगा ।
माथेपर चंदन लगाकर आदमी अध्यात्मिक नहीं बनता और कोई गुरु बन कर प्रवचन देने से भी अध्यात्मिक नहीं बनता । अध्यात्मिकता जीवन का मानसिक और बौध्दिक विकास (Psychological and Intellectual development) है। दैवी गुणों से संपन्न हमारे उपास्य देवता के जीवनका अध्ययन कर उनके दिव्य गुणों को अपने जीवनमें लाने का प्रयत्न करना चाहिए ।
नैतिक मूल्योंपर अविचल निष्ठा रखनी पडती है । इस सृष्टिमें भगवान ने भेजा है यह मनुष्य को समझना चाहिए । इस सृष्टिमें हमारा आगमन होने पर शांति से जीवन व्यतीत करना, भक्तिपूर्ण अंत:करण से जीना और अंतमे सृष्टि से विदा लेना, यह अपना ध्येय होना चाहिए । मानव को प्रभु से मिली हुई दो शक्तियाँ है - मन और बुध्दि ! इन शक्तियों के विकास द्वारा मानव स्वयं को ऊपर ले जा सकता है । ‘मुझमें भी कंकड में से शंकर, नर से नारायण और जीव से शिव बनने की शक्ति है’ ऐसा विचार केवल मनुष्य को ही आ सकता है । अनंत जन्मों की साधना के बाद प्राप्त हुए इस चिंतामणि स्वरुप मानव देह को उज्वल बनाकर प्रभु के चरणों मे अर्पण करना ही श्रेष्ठ भक्ति है । इसलिए सृष्टि में कैसे रहें, किस तरह जीयें और प्रभु की तरफ कैसे जायें, यह हमारी संस्कृति हमें सिखाती है ।
जीवनमें ज्ञान-कर्म और भक्ति का समन्वय होना चाहिए । कर्मयोग का हाथ, ज्ञानी की आँख और भक्त का हृदय इन तीनों के समन्वय से त्रिवेणी संगम होता है । ऐसा त्रिवेणी संगम हमें हनुमानजी के चरित्र में दृष्टिगोचर होता है ।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने ‘‘हनुमान चालीसा’’ में इन सभी गुणोंका चित्रण किया है, तथा गागरमें सागर रूपी अमृत उन्होने हनुमान चालीसा में भरा है । श्री हनुमानजी के चरित्र पर कुछ कहना हम जैसे साधारण मनुष्य के लिए असंभव है ।
हनुमानजी हमारे आदर्श हों तथा भगवान श्रीराम हमारे सहायक बने, इन दो महापुरूषोंके चरित्र को दृष्टि के सन्मुख रख कर अपने जीवन को सुयोग्य रीति से गढने के लिये भगवान हम सब की बुध्दि को वैसा बनायें तथा हमें योग्य शक्ति प्रदान करें यही प्रार्थना है ।
( शेष भाग-२ में )
श्री हनुमान चालीसा
हमारी भारतीय संस्कृति में राम और कृष्ण की भांति हनुमानजी भी संस्कृति के आधार स्तंभ तथा निष्ठा के केन्द्र हैं । प्रत्येक भारतीय के हृदयमें उनका प्रेम शासन अभी भी चल रहा है । हनुमानजी भक्तों में ज्येष्ठ , श्रेष्ठ तथा अपूर्व हैं । ‘‘नर अपनी करनी करे तो नर का नारायण हो जाए’’ । इस प्रकार हनुमानजी ने अपने अंदर देवत्व स्वयं निर्माण किया है । मानव भी उच्च ध्येय और आदर्श रखें तो देवत्व प्राप्त कर सकता है । हनुमानजी ने अपने कर्तव्य से देवत्व प्राप्त किया है । हनुमान जी की स्वतंत्र उपासना की जा सकती है और उनका स्वतंत्र मंदिर भी हो सकता है । जिस प्रकार भगवान शिव का शिवालय नंदी के बिना अधूरा रहता है । उसी प्रकार भगवान श्रीराम के देवालय की पूर्णता हनुमान के मूर्ति के बिना अधूरी रहती है । परन्तु हनुमानजी के मंदिर में रामजी की मूर्ति नहीं भी है तो भी चलेगा , ऐसी अलौकिकता हनुमानजी में है । जन-समुदाय में रामजी के समान ही आदरणीय स्थान हनुमानजी को प्राप्त हुआ है । हनुमानजी की रामजी के प्रति एकनिष्ठता और एकनिष्ठ भक्ति अपूर्व है ।
गोस्वामी तुलसीदासजी को भगवान श्रीराम के दर्शन हनुमानजी की कृपासे ही प्राप्त हुए थे। इसीलिए गोस्वामीजी ने हनुमानजी को अपना गुरु माना है । तथा हनुमानजी के प्रति उनकी अपार श्रध्दा थी । तुलसीदासजी ने हनुमानजी पर कई रचनायें की है जैसे हनुमान चालीसा, बजरंगबाण, हनुमान बाहुक इत्यादि, उन्हीमें से हनुमान चालीसा एक है । ‘‘हनुमान चालीसा’’ उनके द्वारा रचित एक बहुत ही सिद्ध एवं लोकप्रिय ग्रंथ है ।
‘हनुमान चालीसा’ में उन्होने हनुमानजी के चरित्र तथा गुणों का वर्णन किया है । नियमित श्रध्दासे भक्ति-भावसे यदि हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तो मनुष्य मनवांछित फल पाता है तथा उसकी मनोकामना पूर्ण होती है ।
आज मानव जीवन जड, भोगवादी तथा भावशून्य बनता जा रहा है । जहाँ थोडी बहुत धार्मिकता एवं अध्यात्मिकता है, वहाँ दम्भ तथा दिखावे का प्रदर्शन ज्यादा हो रहा है । ऐसी विषम स्थिति में मनुष्यमात्र के लिए विषेश तया युवकों और बालकों के लिए भक्त श्रेष्ठ श्री महावीर हनुमानजी की उपासना अत्यंत आवश्यक है । क्योंकि उनके चरित्र से हमें ब्रम्हचर्य व्रतपालन, चरित्र रक्षण, बल, बुध्दि, विद्या इत्यादि गुणों का विकास करने की शिक्षा प्राप्त होती है । हनुमानजी अपने भक्तों को बुध्दि प्रदान कर के उनकी रक्षा करतें है ।
हनुमानजी में राम का नाम और राम का काम, भक्ति और सेवा का अद्भुत समन्वय दिखायी देता है । विचारोंकी उत्तमता के साथ भगवान में अनुरक्ति और सेवा व्यक्ति के पूर्ण विकास की द्योतक है, जो हनुमानजी के चरित्र में देखी जा सकती है । जीवनमें केवल राम-राम रटने से काम नहीं चलता। रामका नाम और राम का काम दोनों का जीवनमें समन्वय होना चाहिए, यह हनुमानजी के चरित्र से हमें सीखने को मिलता है । हनुमानजी जिस तरह हर पल रामजी का ध्यान तथा स्मरण करते थे उसी प्रकार रामजी का काम करने को हर पल तैयार रहते थे । ‘‘राम काज करिबे को आतुर’’ ऐसा ‘हनुमान चालीसा’ में उल्लेख है । उसी प्रकार हमें भी भगवान के कार्य के लिए हरपल कटिबद्ध होना चाहिए । तथा हनुमानजी की भांति हमारे मन को सुंदर, सुगंधित, हृदय को मृदुल तथा बुद्धि को सुन्दर बनाना होगा ।
माथेपर चंदन लगाकर आदमी अध्यात्मिक नहीं बनता और कोई गुरु बन कर प्रवचन देने से भी अध्यात्मिक नहीं बनता । अध्यात्मिकता जीवन का मानसिक और बौध्दिक विकास (Psychological and Intellectual development) है। दैवी गुणों से संपन्न हमारे उपास्य देवता के जीवनका अध्ययन कर उनके दिव्य गुणों को अपने जीवनमें लाने का प्रयत्न करना चाहिए ।
नैतिक मूल्योंपर अविचल निष्ठा रखनी पडती है । इस सृष्टिमें भगवान ने भेजा है यह मनुष्य को समझना चाहिए । इस सृष्टिमें हमारा आगमन होने पर शांति से जीवन व्यतीत करना, भक्तिपूर्ण अंत:करण से जीना और अंतमे सृष्टि से विदा लेना, यह अपना ध्येय होना चाहिए । मानव को प्रभु से मिली हुई दो शक्तियाँ है - मन और बुध्दि ! इन शक्तियों के विकास द्वारा मानव स्वयं को ऊपर ले जा सकता है । ‘मुझमें भी कंकड में से शंकर, नर से नारायण और जीव से शिव बनने की शक्ति है’ ऐसा विचार केवल मनुष्य को ही आ सकता है । अनंत जन्मों की साधना के बाद प्राप्त हुए इस चिंतामणि स्वरुप मानव देह को उज्वल बनाकर प्रभु के चरणों मे अर्पण करना ही श्रेष्ठ भक्ति है । इसलिए सृष्टि में कैसे रहें, किस तरह जीयें और प्रभु की तरफ कैसे जायें, यह हमारी संस्कृति हमें सिखाती है ।
जीवनमें ज्ञान-कर्म और भक्ति का समन्वय होना चाहिए । कर्मयोग का हाथ, ज्ञानी की आँख और भक्त का हृदय इन तीनों के समन्वय से त्रिवेणी संगम होता है । ऐसा त्रिवेणी संगम हमें हनुमानजी के चरित्र में दृष्टिगोचर होता है ।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने ‘‘हनुमान चालीसा’’ में इन सभी गुणोंका चित्रण किया है, तथा गागरमें सागर रूपी अमृत उन्होने हनुमान चालीसा में भरा है । श्री हनुमानजी के चरित्र पर कुछ कहना हम जैसे साधारण मनुष्य के लिए असंभव है ।
हनुमानजी हमारे आदर्श हों तथा भगवान श्रीराम हमारे सहायक बने, इन दो महापुरूषोंके चरित्र को दृष्टि के सन्मुख रख कर अपने जीवन को सुयोग्य रीति से गढने के लिये भगवान हम सब की बुध्दि को वैसा बनायें तथा हमें योग्य शक्ति प्रदान करें यही प्रार्थना है ।
( शेष भाग-२ में )
आञ्जनेय अष्टोत्तरशत नामावलि
1.ॐ आञ्जनेयाय नमः .
2.ॐ महावीराय नमः .
3.ॐ हनूमते नमः .
4.ॐ मारुतात्मजाय नमः .
5.ॐ तत्वज्ञानप्रदाय नमः .
6.ॐ सीतादेविमुद्राप्रदायकाय नमः .
7.ॐ अशोकवनकाच्छेत्रे नमः .
8.ॐ सर्वमायाविभंजनाय नमः .
9.ॐ सर्वबन्धविमोक्त्रे नमः .
10.ॐ रक्षोविध्वंसकारकाय नमः .
11.ॐ परविद्या परिहाराय नमः .
12.ॐ पर शौर्य विनाशकाय नमः .
13.ॐ परमन्त्र निराकर्त्रे नमः .
14.ॐ परयन्त्र प्रभेदकाय नमः .
15.ॐ सर्वग्रह विनाशिने नमः .
16.ॐ भीमसेन सहायकृथे नमः .
17.ॐ सर्वदुखः हराय नमः .
18.ॐ सर्वलोकचारिणे नमः .
19.ॐ मनोजवाय नमः .
20.ॐ पारिजात द्रुमूलस्थाय नमः .
21.ॐ सर्व मन्त्र स्वरूपाय नमः .
22.ॐ सर्व तन्त्र स्वरूपिणे नमः .
23.ॐ सर्वयन्त्रात्मकाय नमः .
24.ॐ कपीश्वराय नमः .
25.ॐ महाकायाय नमः .
26.ॐ सर्वरोगहराय नमः .
27.ॐ प्रभवे नमः .
28.ॐ बल सिद्धिकराय नमः .
29.ॐ सर्वविद्या सम्पत्तिप्रदायकाय नमः .
30.ॐ कपिसेनानायकाय नमः .
31.ॐ भविष्यथ्चतुराननाय नमः .
32.ॐ कुमार ब्रह्मचारिणे नमः .
33.ॐ रत्नकुन्डलाय नमः .
34.ॐ दीप्तिमते नमः .
35.ॐ चन्चलद्वालसन्नद्धाय नमः .
36.ॐ लम्बमानशिखोज्वलाय नमः .
37.ॐ गन्धर्व विद्याय नमः .
38.ॐ तत्वञाय नमः .
39.ॐ महाबल पराक्रमाय नमः .
40.ॐ काराग्रह विमोक्त्रे नमः .
41.ॐ शृन्खला बन्धमोचकाय नमः .
42.ॐ सागरोत्तारकाय नमः .
43.ॐ प्राज्ञाय नमः .
44.ॐ रामदूताय नमः .
45.ॐ प्रतापवते नमः .
46.ॐ वानराय नमः .
47.ॐ केसरीसुताय नमः .
48.ॐ सीताशोक निवारकाय नमः .
49.ॐ अन्जनागर्भ संभूताय नमः .
50.ॐ बालार्कसद्रशाननाय नमः .
51.ॐ विभीषण प्रियकराय नमः .
52.ॐ दशग्रीव कुलान्तकाय नमः .
53.ॐ लक्ष्मणप्राणदात्रे नमः .
54.ॐ वज्र कायाय नमः .
55.ॐ महाद्युथये नमः .
56.ॐ चिरंजीविने नमः .
57.ॐ राम भक्ताय नमः .
58.ॐ दैत्य कार्य विघातकाय नमः .
59.ॐ अक्षहन्त्रे नमः .
60.ॐ काञ्चनाभाय नमः .
61.ॐ पञ्चवक्त्राय नमः .
62.ॐ महा तपसे नमः .
63.ॐ लन्किनी भञ्जनाय नमः .
64.ॐ श्रीमते नमः .
65.ॐ सिंहिका प्राण भन्जनाय नमः .
66.ॐ गन्धमादन शैलस्थाय नमः .
67.ॐ लंकापुर विदायकाय नमः .
68.ॐ सुग्रीव सचिवाय नमः .
69.ॐ धीराय नमः .
70.ॐ शूराय नमः .
71.ॐ दैत्यकुलान्तकाय नमः .
72.ॐ सुवार्चलार्चिताय नमः .
73.ॐ तेजसे नमः .
74.ॐ रामचूडामणिप्रदायकाय नमः .
75.ॐ कामरूपिणे नमः .
76.ॐ पिन्गाळाक्षाय नमः .
77.ॐ वार्धि मैनाक पूजिताय नमः .
78.ॐ लोकपूज्याय नमः .
79.ॐ विजितेन्द्रियाय नमः .
80.ॐ रामसुग्रीव सन्धात्रे नमः .
81.ॐ महिरावण मर्धनाय नमः .
82.ॐ स्फटिकाभाय नमः .
83.ॐ वागधीशाय नमः .
84.ॐ नवव्याकृतपण्डिताय नमः .
85.ॐ चतुर्बाहवे नमः .
86.ॐ दीनबन्धुराय नमः .
87.ॐ मायात्मने नमः .
88.ॐ भक्तवत्सलाय नमः .
89.ॐ संजीवननगायार्था नमः .
90.ॐ सुचये नमः .
91.ॐ वाग्मिने नमः .
92.ॐ दृढव्रताय नमः .
93.ॐ कालनेमि प्रमथनाय नमः .
94.ॐ हरिमर्कट मर्कटाय नमः .
95.ॐ दान्ताय नमः .
96.ॐ शान्ताय नमः .
97.ॐ प्रसन्नात्मने नमः .
98.ॐ शतकन्टमुदापहर्त्रे नमः .
99.ॐ योगिने नमः .
100.ॐ रामकथा लोलाय नमः .
101.ॐ सीतान्वेशण पठिताय नमः .
102.ॐ वज्रद्रनुष्टाय नमः .
103.ॐ वज्रनखाय नमः .
104.ॐ रुद्र वीर्य समुद्भवाय नमः .
105.ॐ जाम्बवत्प्रीतिवर्धनाय नमः
106.ॐ पार्थ ध्वजाग्रसंवासिने नमः .
107.ॐ शरपंजरभेधकाय नमः .
108.ॐ दशबाहवे नमः .
इति आञ्जनेय अष्टोत्तरशत नामावलि सम्पूर्णं ||
2.ॐ महावीराय नमः .
3.ॐ हनूमते नमः .
4.ॐ मारुतात्मजाय नमः .
5.ॐ तत्वज्ञानप्रदाय नमः .
6.ॐ सीतादेविमुद्राप्रदायकाय नमः .
7.ॐ अशोकवनकाच्छेत्रे नमः .
8.ॐ सर्वमायाविभंजनाय नमः .
9.ॐ सर्वबन्धविमोक्त्रे नमः .
10.ॐ रक्षोविध्वंसकारकाय नमः .
11.ॐ परविद्या परिहाराय नमः .
12.ॐ पर शौर्य विनाशकाय नमः .
13.ॐ परमन्त्र निराकर्त्रे नमः .
14.ॐ परयन्त्र प्रभेदकाय नमः .
15.ॐ सर्वग्रह विनाशिने नमः .
16.ॐ भीमसेन सहायकृथे नमः .
17.ॐ सर्वदुखः हराय नमः .
18.ॐ सर्वलोकचारिणे नमः .
19.ॐ मनोजवाय नमः .
20.ॐ पारिजात द्रुमूलस्थाय नमः .
21.ॐ सर्व मन्त्र स्वरूपाय नमः .
22.ॐ सर्व तन्त्र स्वरूपिणे नमः .
23.ॐ सर्वयन्त्रात्मकाय नमः .
24.ॐ कपीश्वराय नमः .
25.ॐ महाकायाय नमः .
26.ॐ सर्वरोगहराय नमः .
27.ॐ प्रभवे नमः .
28.ॐ बल सिद्धिकराय नमः .
29.ॐ सर्वविद्या सम्पत्तिप्रदायकाय नमः .
30.ॐ कपिसेनानायकाय नमः .
31.ॐ भविष्यथ्चतुराननाय नमः .
32.ॐ कुमार ब्रह्मचारिणे नमः .
33.ॐ रत्नकुन्डलाय नमः .
34.ॐ दीप्तिमते नमः .
35.ॐ चन्चलद्वालसन्नद्धाय नमः .
36.ॐ लम्बमानशिखोज्वलाय नमः .
37.ॐ गन्धर्व विद्याय नमः .
38.ॐ तत्वञाय नमः .
39.ॐ महाबल पराक्रमाय नमः .
40.ॐ काराग्रह विमोक्त्रे नमः .
41.ॐ शृन्खला बन्धमोचकाय नमः .
42.ॐ सागरोत्तारकाय नमः .
43.ॐ प्राज्ञाय नमः .
44.ॐ रामदूताय नमः .
45.ॐ प्रतापवते नमः .
46.ॐ वानराय नमः .
47.ॐ केसरीसुताय नमः .
48.ॐ सीताशोक निवारकाय नमः .
49.ॐ अन्जनागर्भ संभूताय नमः .
50.ॐ बालार्कसद्रशाननाय नमः .
51.ॐ विभीषण प्रियकराय नमः .
52.ॐ दशग्रीव कुलान्तकाय नमः .
53.ॐ लक्ष्मणप्राणदात्रे नमः .
54.ॐ वज्र कायाय नमः .
55.ॐ महाद्युथये नमः .
56.ॐ चिरंजीविने नमः .
57.ॐ राम भक्ताय नमः .
58.ॐ दैत्य कार्य विघातकाय नमः .
59.ॐ अक्षहन्त्रे नमः .
60.ॐ काञ्चनाभाय नमः .
61.ॐ पञ्चवक्त्राय नमः .
62.ॐ महा तपसे नमः .
63.ॐ लन्किनी भञ्जनाय नमः .
64.ॐ श्रीमते नमः .
65.ॐ सिंहिका प्राण भन्जनाय नमः .
66.ॐ गन्धमादन शैलस्थाय नमः .
67.ॐ लंकापुर विदायकाय नमः .
68.ॐ सुग्रीव सचिवाय नमः .
69.ॐ धीराय नमः .
70.ॐ शूराय नमः .
71.ॐ दैत्यकुलान्तकाय नमः .
72.ॐ सुवार्चलार्चिताय नमः .
73.ॐ तेजसे नमः .
74.ॐ रामचूडामणिप्रदायकाय नमः .
75.ॐ कामरूपिणे नमः .
76.ॐ पिन्गाळाक्षाय नमः .
77.ॐ वार्धि मैनाक पूजिताय नमः .
78.ॐ लोकपूज्याय नमः .
79.ॐ विजितेन्द्रियाय नमः .
80.ॐ रामसुग्रीव सन्धात्रे नमः .
81.ॐ महिरावण मर्धनाय नमः .
82.ॐ स्फटिकाभाय नमः .
83.ॐ वागधीशाय नमः .
84.ॐ नवव्याकृतपण्डिताय नमः .
85.ॐ चतुर्बाहवे नमः .
86.ॐ दीनबन्धुराय नमः .
87.ॐ मायात्मने नमः .
88.ॐ भक्तवत्सलाय नमः .
89.ॐ संजीवननगायार्था नमः .
90.ॐ सुचये नमः .
91.ॐ वाग्मिने नमः .
92.ॐ दृढव्रताय नमः .
93.ॐ कालनेमि प्रमथनाय नमः .
94.ॐ हरिमर्कट मर्कटाय नमः .
95.ॐ दान्ताय नमः .
96.ॐ शान्ताय नमः .
97.ॐ प्रसन्नात्मने नमः .
98.ॐ शतकन्टमुदापहर्त्रे नमः .
99.ॐ योगिने नमः .
100.ॐ रामकथा लोलाय नमः .
101.ॐ सीतान्वेशण पठिताय नमः .
102.ॐ वज्रद्रनुष्टाय नमः .
103.ॐ वज्रनखाय नमः .
104.ॐ रुद्र वीर्य समुद्भवाय नमः .
105.ॐ जाम्बवत्प्रीतिवर्धनाय नमः
106.ॐ पार्थ ध्वजाग्रसंवासिने नमः .
107.ॐ शरपंजरभेधकाय नमः .
108.ॐ दशबाहवे नमः .
इति आञ्जनेय अष्टोत्तरशत नामावलि सम्पूर्णं ||
Friday, March 16, 2012
श्रीललितापञ्चरत्नं...
श्रीललितापञ्चरत्नं
प्रातः स्मरामि ललितावदनारविन्दं बिम्बाधरं पृथुलमौक्तिकशोभिनासम् । आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलाढ्यं मंदस्मितं मृगमदोज्ज्वलफालदेशम् ।। 1 ।।
प्रातर्भजामि ललिताभुजकल्पवल्लीँ रक्तांगुलीयलसदंगुलिपल्लवाढ्याम
् ।
माणिक्यहेमवलयाङ्गदशोभमानां पुण्ड्रेक्षुचापकुसुमेषुसृणीर्द
धानाम् ।। 2 ।।
प्रातर्नमामि ललिताचरणारविँदं भक्तेष्टदाननिरतं भवसिन्धुपोतम् ।
पद्मासनादिसुरनायकपूजनीयं पद्मांकुशध्वजसुदर्शनलाञ्छनाढ्य
म् ।। 3 ।।
प्रातः स्तुवे परशिवां ललितां भवानीं त्रय्यन्तवेद्यविभवां करुणानवद्याम् ।
विश्वस्य सृष्टिविलयस्थितिहेतुभूतां विद्येश्वरीं निगमवाङ्मनसातिदूराम् ।। 4 ।।
प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरीति ।
श्री शांभवीति जगतां जननी परेति वाग्देवतेति वचसा त्रिपुरेश्वरीति ।। 5 ।।
यः श्लोकपञ्चकमिदं ललिताम्बिकायाः सौभाग्यदंसुललितं पठति प्रभाते ।
तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना विद्यां श्रियं विमलसौख्यमनन्तकीर्तिम् ।। 6 ।।
।। श्रीललितापञ्चरत्नं संपूर्णम् ।।
राम राज्य .में पर्यावरण ..
'श्रीरामचरितमानस' में तुलसीदास जी ने इस बात पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के सिंहासन पर आसीन होते ही सर्वत्र हर्ष व्याप्त हो गया, सारे भय-शोक दूर हो गए एवं दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति मिल गई। इसका प्रमुख कारण यह है कि रामराज्य में किसी भी प्रकार का प्रदूषण नहीं था। इसीलिए कोई भी अल्पमृत्यु, रोग-पीड़ा से ग्रस्त नहीं था, सभी स्वस्थ, बुद्धिमान, साक्षर, गुणज्ञ, ज्ञानी तथा कृतज्ञ थे।
राम राज बैठे त्रैलोका।
हरषित भए गए सब सोका।।
बयस न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप विषमता खोई।।
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा।
सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी।
सब कृतज्ञ नहिं कपट सयानी।।
राम राज नभगेस सुनु
सचराचर जग माहिं।
काल कर्म सुभाव गुन कृत
दुख काहुहि नाहिं।।
(रा.च.मा. 7।20।7-8; 21।1, 5-6, 8; 21)
वाल्मीकि रामायण में श्रीभरत जी रामराज्य के विलक्षण प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहते हैं, "राघव! आपके राज्य पर अभिषिक्त हुए एक मास से अधिक समय हो गया। तब से सभी लोग निरोग दिखाई देते हैं। बूढ़े प्राणियों के पास भी मृत्यु नहीं फटकती है। स्त्रियाँ बिना कष्ट के प्रसव करती हैं। सभी मनुष्यों के शरीर हृष्ट-पुष्ट दिखाई देते हैं। राजन! पुरवासियों में बड़ा हर्ष छा रहा है। मेघ अमृत के समान जल गिराते हुए समय पर वर्षा करते हैं। हवा ऐसी चलती है कि इसका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है। राजन नगर तथा जनपद के लोग इस पुरी में कहते हैं कि हमारे लिए चिरकाल तक ऐसे ही प्रभावशाली राजा रहें।"
पाप से पापी की हानि ही नहीं होती अपितु वातावरण भी दूषित होता है, जिससे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। रामराज्य में पाप का अस्तित्व नहीं है, इसलिए दु:ख लेशमात्र भी नहीं है। पर्यावरण की शुद्धि तथा उसके प्रबंधन के लिए रामराज्य में सभी आवश्यक व्यवस्थाएँ की जाती रहीं। वृक्षारोपण, बाग-बगीचे, फल-फूलवाले पौधे तथा सुगंधित वाटिका लगाने में सब लोग रुचि लेते थे। नगर के भीतर तथा बाहर का दृश्य मनोहारी था -
सुमन बाटिका सबहिं लगाईं।
बिबिध भाँति करि जतन बनाईं।।
लता ललित बहु जाति सुहाई।
फूलहिं सदा बसंत कि नाईं।।
(रा.च.मा. 7।28।1-2)
बापीं तड़ाग अनूप कूद मनोहरायत सोहहीं।
सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं।।
बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं।
आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं।।
रमानाथ जहं राजा सो पुर बरनि कि जाइ।
अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ।।
(रा.च.मा. 7।29।छ.29)
अर्थात सभी लोगों ने विविध प्रकार के फूलों की वाटिकाएँ अनेक प्रकार के यत्न करके लगा रखीं हैं। बहुत प्रकार की सुहावनी ललित बेलें सदा वसंत की भाँति फूला करती हैं। नगर की शोभा का जहाँ वर्णन नहीं किया जा सकता, वहाँ बाहर चारों ओर का दृश्य भी अत्यंत रमणीय है। रामराज्य में बावलियाँ और कूप जल से भरे रहते थे, जलस्तर भी काफ़ी ऊपर था। तालाब तथा कुओं की सीढ़ियाँ भी सुंदर और सुविधाजनक थीं। जल निर्मल था। अवधपुरी में सूर्य-कुंड, विद्या-कुंड, सीता-कुंड, हनुमान-कुंड, वसिष्ठ-कुंड, चक्रतीर्थ आदि तालाब थे, जो प्रदुषण से पूर्णत: मुक्त थे। नगर के बाहर- अशोक, संतानक, मंदार, पारिजात, चंदन, चंपक, प्रमोद, आम्र, पनस, कदंब एवं ताल-वृक्षों से संपन्न अनेक वन थे।
'गीतावली' में भी सुंदर वनों-उपवनों के मनोहारी दृश्यों का वर्णन मिलता है -
बन उपवन नव किसलय,
कुसुमित नाना रंग।
बोलत मधुर मुखर खग
पिकबर, गुंजत भृंग।।
(गीतावली उत्तरकांड 21।3)
अर्थात अयोध्या के वन-उपवनों में नवीन पत्ते और कई रंग के पुष्प खिलते रहते थे, चहचहाते हुए पपीहा और सुंदर कोकिल सुमधुर बोली बोलते हैं और भौरें गुंजार करते रहते थे।
रामराज्य में जल अत्यंत निर्मल एवं शुद्ध रहता था, दोषयुक्त नहीं। स्थान-स्थान पर पृथक-पृथक घाट बँधे हुए थे। कीचड़ कहीं भी नहीं होता था। पशुओं के उपयोग हेतु घाट नगर से दूर बने हुए थे और पानी भरने के घाट अलग थे, जहाँ कोई भी व्यक्ति स्नान नहीं करता था। नहाने के लिए राजघाट अलग से थे, जहाँ चारों वर्णों के लोग स्नान करते थे -
उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर।
बांधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर।।
दूरि फराक रुचिर सो घाटा।
जहं जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।।
पनिघट परम मनोहर नाना।
तहां न पुरुष करहिं अस्नाना।।
(रा.च.मा. 7।28; 29।1-2)
रामराज्य में शीतल, मंद तथा सुगंधित वायु सदैव बहती रहती थी -
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर।
मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर।।
(रा.च.मा. 7।28।3)
पक्षी-प्रेम रामराज्य में अद्वितीय था। पक्षी के पैदा होते ही उसका पालन-पोषण किया जाता था। बचपन से ही पालन करने से दोनों ओर प्रेम रहता था। बड़े होने पर पक्षी उड़ते तो थे किंतु कहीं जाते नहीं थे। पक्षियों को रामराज्य में पढ़ाया और सुसंस्कारित किया जाता था।
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक।
कहहु राम रघुपति जनपालक।।
(रा.च.मा. 7।28।7)
रामराज्य की बाजार-व्यवस्था भी अतुलनीय थी। राजद्वार, गली, चौराहे और बाजार स्वच्छ, आकर्षक तथा दीप्तिमान रहते थे। विभिन्न वस्तुओं का व्यापार करनेवाले कुबेर के समान संपन्न थे। रामराज्य में वस्तुओं का मोलभाव नहीं होता था। सभी दुकानदार सत्यवादी एवं ईमानदार थे -
बाज़ार स्र्चिर न बनइ बरनत
बस्तु बिनु गथ पाइए।
(रा.च.मा. 7।28)
रामराज्य में तो यहाँ तक ध्यान रखा जाता था कि जो पौधे चरित्र-निर्माण में सहायक हैं, उनका रोपण अधिक किया जाना चाहिए। पर्यावरण-विशेषज्ञों तथा आयुर्वेदशास्त्र की मान्यता है कि तुलसी का पौधा जहाँ सभी प्रकार से स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है वहाँ चरित्र-निर्माण में भी सहायक है। यही कारण है कि रामराज्य में ऋषि-मुनि नदियों के तथा तालाबों के किनारे तुलसी के पौधे लगाते थे -
तीर तीर तुलसिका सुहाई।
बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई।।
(रा.च.मा. 7।29।6)
रामराज्य में सब लोग सत्साहित्य का अनुशीलन करते थे। चरित्रवान और संस्कारवान थे। सबके घरों में सुखद वातावरण था और सभी लोग शासन से संतुष्ट थे। जहाँ राजा अपनी प्रजा का पालन पुत्रवत करता हो वहाँ का समाज निश्चित ही सदा प्रसन्न एवं समृद्ध रहता है। उन अवधपुरवासियों की सुख-संपदा का वर्णन हज़ार शेष जी भी नहीं कर सकते, जिनके राजा श्रीरामचंद्र जी हैं -
सब के गृह गृह होहिं पुराना।
रामचरित पावन बिधि नाना।
नर अस्र् नारि राम गुन गानहिं।
करहिं दिवस निसि जात न जानहिं।
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।
सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहं नृप राम बिराज।।
(रा.च.मा. 7।26।7-8; 26)
इस प्रकार रामराज्य में किसी भी प्रकार का दूषित परिवेश नहीं था। राजा तथा प्रजा में परस्पर अटूट स्नेह, सम्मान और सामंजस्य था। मनुष्यों में जहाँ वैरभाव नहीं रहता वहाँ पशु-पक्षी भी अपने सहज वैरभाव को त्याग देते हैं। हाथी और सिंह एक साथ रहते हैं - परस्पर प्रेम रखते हैं। वन में पक्षियों के अनेक झुंड निर्भय होकर विचरण करते हैं। उन्हें शिकारी का भय नहीं रहता। गौएँ कामधेनु की तरह मनचाहा दूध देती हैं।
रामराज्य में पृथ्वी सदा खेती से हरी-भरी रहती थी। चंद्रमा उतनी ही शीतलता और सूर्य उतना ही ताप देते थे जितनी ज़रूरत होती थी। पर्वतों ने अनेक प्रकार की मणियों की खानें प्रकट कर दी थीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल, स्वादिष्ट और सुख देनेवाला जल बहाती थीं। जब जितनी ज़रूरत होती थी, मेघ उतना ही जल बरसाते थे -
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन।
रहहिं एक संग गज पंचानन।।
खग मृग सहज बयरु बिसराई।
सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।।
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा।
अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।।
लता बिटप मागें मधु चवहिं।
मनभावतो धेनु पय स्रवहीं।।
बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।
मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज।।
(रा.च.मा. 7।23।१1-3, 5; 23)
रामराज्य का वर्णन करते हुए गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने सूत्ररूप में यह संकेत दिया है कि पर्यावरण-संतुलन तथा पर्यावरण-प्रबंधन में शासक और प्रजा का संयुक्त उत्तरदायित्व होता है। दोनों के परस्पर सहयोग, स्नेह, सम्मान, सौहार्द तथा सामंजस्य से ही समाज एवं राष्ट्र को दोषमुक्त किया जा सकता है। पर्यावरण-चेतना का शासक और प्रजा दोनों में पर्याप्त विकास होना चाहिए। राज्य की व्यवस्था में प्रजा का पूर्ण सहयोग हो और प्रजा की सुख-सुविधा का शासक पूरा-पूरा ध्यान रखे - यही रामराज्य का संदेश है।
राम राज बैठे त्रैलोका।
हरषित भए गए सब सोका।।
बयस न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप विषमता खोई।।
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा।
सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी।
सब कृतज्ञ नहिं कपट सयानी।।
राम राज नभगेस सुनु
सचराचर जग माहिं।
काल कर्म सुभाव गुन कृत
दुख काहुहि नाहिं।।
(रा.च.मा. 7।20।7-8; 21।1, 5-6, 8; 21)
वाल्मीकि रामायण में श्रीभरत जी रामराज्य के विलक्षण प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहते हैं, "राघव! आपके राज्य पर अभिषिक्त हुए एक मास से अधिक समय हो गया। तब से सभी लोग निरोग दिखाई देते हैं। बूढ़े प्राणियों के पास भी मृत्यु नहीं फटकती है। स्त्रियाँ बिना कष्ट के प्रसव करती हैं। सभी मनुष्यों के शरीर हृष्ट-पुष्ट दिखाई देते हैं। राजन! पुरवासियों में बड़ा हर्ष छा रहा है। मेघ अमृत के समान जल गिराते हुए समय पर वर्षा करते हैं। हवा ऐसी चलती है कि इसका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है। राजन नगर तथा जनपद के लोग इस पुरी में कहते हैं कि हमारे लिए चिरकाल तक ऐसे ही प्रभावशाली राजा रहें।"
पाप से पापी की हानि ही नहीं होती अपितु वातावरण भी दूषित होता है, जिससे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। रामराज्य में पाप का अस्तित्व नहीं है, इसलिए दु:ख लेशमात्र भी नहीं है। पर्यावरण की शुद्धि तथा उसके प्रबंधन के लिए रामराज्य में सभी आवश्यक व्यवस्थाएँ की जाती रहीं। वृक्षारोपण, बाग-बगीचे, फल-फूलवाले पौधे तथा सुगंधित वाटिका लगाने में सब लोग रुचि लेते थे। नगर के भीतर तथा बाहर का दृश्य मनोहारी था -
सुमन बाटिका सबहिं लगाईं।
बिबिध भाँति करि जतन बनाईं।।
लता ललित बहु जाति सुहाई।
फूलहिं सदा बसंत कि नाईं।।
(रा.च.मा. 7।28।1-2)
बापीं तड़ाग अनूप कूद मनोहरायत सोहहीं।
सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं।।
बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं।
आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं।।
रमानाथ जहं राजा सो पुर बरनि कि जाइ।
अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ।।
(रा.च.मा. 7।29।छ.29)
अर्थात सभी लोगों ने विविध प्रकार के फूलों की वाटिकाएँ अनेक प्रकार के यत्न करके लगा रखीं हैं। बहुत प्रकार की सुहावनी ललित बेलें सदा वसंत की भाँति फूला करती हैं। नगर की शोभा का जहाँ वर्णन नहीं किया जा सकता, वहाँ बाहर चारों ओर का दृश्य भी अत्यंत रमणीय है। रामराज्य में बावलियाँ और कूप जल से भरे रहते थे, जलस्तर भी काफ़ी ऊपर था। तालाब तथा कुओं की सीढ़ियाँ भी सुंदर और सुविधाजनक थीं। जल निर्मल था। अवधपुरी में सूर्य-कुंड, विद्या-कुंड, सीता-कुंड, हनुमान-कुंड, वसिष्ठ-कुंड, चक्रतीर्थ आदि तालाब थे, जो प्रदुषण से पूर्णत: मुक्त थे। नगर के बाहर- अशोक, संतानक, मंदार, पारिजात, चंदन, चंपक, प्रमोद, आम्र, पनस, कदंब एवं ताल-वृक्षों से संपन्न अनेक वन थे।
'गीतावली' में भी सुंदर वनों-उपवनों के मनोहारी दृश्यों का वर्णन मिलता है -
बन उपवन नव किसलय,
कुसुमित नाना रंग।
बोलत मधुर मुखर खग
पिकबर, गुंजत भृंग।।
(गीतावली उत्तरकांड 21।3)
अर्थात अयोध्या के वन-उपवनों में नवीन पत्ते और कई रंग के पुष्प खिलते रहते थे, चहचहाते हुए पपीहा और सुंदर कोकिल सुमधुर बोली बोलते हैं और भौरें गुंजार करते रहते थे।
रामराज्य में जल अत्यंत निर्मल एवं शुद्ध रहता था, दोषयुक्त नहीं। स्थान-स्थान पर पृथक-पृथक घाट बँधे हुए थे। कीचड़ कहीं भी नहीं होता था। पशुओं के उपयोग हेतु घाट नगर से दूर बने हुए थे और पानी भरने के घाट अलग थे, जहाँ कोई भी व्यक्ति स्नान नहीं करता था। नहाने के लिए राजघाट अलग से थे, जहाँ चारों वर्णों के लोग स्नान करते थे -
उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर।
बांधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर।।
दूरि फराक रुचिर सो घाटा।
जहं जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।।
पनिघट परम मनोहर नाना।
तहां न पुरुष करहिं अस्नाना।।
(रा.च.मा. 7।28; 29।1-2)
रामराज्य में शीतल, मंद तथा सुगंधित वायु सदैव बहती रहती थी -
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर।
मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर।।
(रा.च.मा. 7।28।3)
पक्षी-प्रेम रामराज्य में अद्वितीय था। पक्षी के पैदा होते ही उसका पालन-पोषण किया जाता था। बचपन से ही पालन करने से दोनों ओर प्रेम रहता था। बड़े होने पर पक्षी उड़ते तो थे किंतु कहीं जाते नहीं थे। पक्षियों को रामराज्य में पढ़ाया और सुसंस्कारित किया जाता था।
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक।
कहहु राम रघुपति जनपालक।।
(रा.च.मा. 7।28।7)
रामराज्य की बाजार-व्यवस्था भी अतुलनीय थी। राजद्वार, गली, चौराहे और बाजार स्वच्छ, आकर्षक तथा दीप्तिमान रहते थे। विभिन्न वस्तुओं का व्यापार करनेवाले कुबेर के समान संपन्न थे। रामराज्य में वस्तुओं का मोलभाव नहीं होता था। सभी दुकानदार सत्यवादी एवं ईमानदार थे -
बाज़ार स्र्चिर न बनइ बरनत
बस्तु बिनु गथ पाइए।
(रा.च.मा. 7।28)
रामराज्य में तो यहाँ तक ध्यान रखा जाता था कि जो पौधे चरित्र-निर्माण में सहायक हैं, उनका रोपण अधिक किया जाना चाहिए। पर्यावरण-विशेषज्ञों तथा आयुर्वेदशास्त्र की मान्यता है कि तुलसी का पौधा जहाँ सभी प्रकार से स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है वहाँ चरित्र-निर्माण में भी सहायक है। यही कारण है कि रामराज्य में ऋषि-मुनि नदियों के तथा तालाबों के किनारे तुलसी के पौधे लगाते थे -
तीर तीर तुलसिका सुहाई।
बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई।।
(रा.च.मा. 7।29।6)
रामराज्य में सब लोग सत्साहित्य का अनुशीलन करते थे। चरित्रवान और संस्कारवान थे। सबके घरों में सुखद वातावरण था और सभी लोग शासन से संतुष्ट थे। जहाँ राजा अपनी प्रजा का पालन पुत्रवत करता हो वहाँ का समाज निश्चित ही सदा प्रसन्न एवं समृद्ध रहता है। उन अवधपुरवासियों की सुख-संपदा का वर्णन हज़ार शेष जी भी नहीं कर सकते, जिनके राजा श्रीरामचंद्र जी हैं -
सब के गृह गृह होहिं पुराना।
रामचरित पावन बिधि नाना।
नर अस्र् नारि राम गुन गानहिं।
करहिं दिवस निसि जात न जानहिं।
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।
सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहं नृप राम बिराज।।
(रा.च.मा. 7।26।7-8; 26)
इस प्रकार रामराज्य में किसी भी प्रकार का दूषित परिवेश नहीं था। राजा तथा प्रजा में परस्पर अटूट स्नेह, सम्मान और सामंजस्य था। मनुष्यों में जहाँ वैरभाव नहीं रहता वहाँ पशु-पक्षी भी अपने सहज वैरभाव को त्याग देते हैं। हाथी और सिंह एक साथ रहते हैं - परस्पर प्रेम रखते हैं। वन में पक्षियों के अनेक झुंड निर्भय होकर विचरण करते हैं। उन्हें शिकारी का भय नहीं रहता। गौएँ कामधेनु की तरह मनचाहा दूध देती हैं।
रामराज्य में पृथ्वी सदा खेती से हरी-भरी रहती थी। चंद्रमा उतनी ही शीतलता और सूर्य उतना ही ताप देते थे जितनी ज़रूरत होती थी। पर्वतों ने अनेक प्रकार की मणियों की खानें प्रकट कर दी थीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल, स्वादिष्ट और सुख देनेवाला जल बहाती थीं। जब जितनी ज़रूरत होती थी, मेघ उतना ही जल बरसाते थे -
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन।
रहहिं एक संग गज पंचानन।।
खग मृग सहज बयरु बिसराई।
सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।।
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा।
अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।।
लता बिटप मागें मधु चवहिं।
मनभावतो धेनु पय स्रवहीं।।
बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।
मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज।।
(रा.च.मा. 7।23।१1-3, 5; 23)
रामराज्य का वर्णन करते हुए गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने सूत्ररूप में यह संकेत दिया है कि पर्यावरण-संतुलन तथा पर्यावरण-प्रबंधन में शासक और प्रजा का संयुक्त उत्तरदायित्व होता है। दोनों के परस्पर सहयोग, स्नेह, सम्मान, सौहार्द तथा सामंजस्य से ही समाज एवं राष्ट्र को दोषमुक्त किया जा सकता है। पर्यावरण-चेतना का शासक और प्रजा दोनों में पर्याप्त विकास होना चाहिए। राज्य की व्यवस्था में प्रजा का पूर्ण सहयोग हो और प्रजा की सुख-सुविधा का शासक पूरा-पूरा ध्यान रखे - यही रामराज्य का संदेश है।
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